Home StateUttar PradeshHamirpur अपनो की गद्दारी से शहीद हुई रानी दुर्गावती

अपनो की गद्दारी से शहीद हुई रानी दुर्गावती

by vaibhav
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हमीरपुर । वर्णिता संस्था के तत्वावधान मैं विमर्श विविधा के अंतर्गत जिनका देश_ ऋणी है के तहत वीर भूमि की बहादुर बेटी रानी दुर्गावती की पुण्यतिथि पर पुष्पांजलि अर्पित करते हुए संस्था के अध्यक्ष डॉक्टर भवानीदीन ने कहा कि रानी दुर्गावती बुंदेल भूमि की बहादुर बेटी थी ,
रानी के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता है।हालांकि रानी के जन्म को लेकर मत भिन्नता है । रानी का जन्म 5 अक्टूबर 1524 को दुर्गा अष्टमी के दिन महोबा के चंदेल कीर्ति सिंह उर्फ शालिवाहन के घर हुआ था ।यही मत माना जाता है ।दूर्गाष्टमी में पैदा होने के कारण इनका नाम दुर्गावती रखा गया ।दुर्गावती में शूरता और सुंदरता का अद्भुत मिश्रण था ।दुर्गावती बचपन में ही तलवार, बंदूक चलाने और घुड़सवारी करने में चतुर थीं ।उन्हें शिकार का बहुत शौक था, दुर्गावती का जीवन बचपन और किशोर काल में खतरों से जूझता रहा ।दुर्गावती के किशोर जीवन में शिकार करते समय अकबर के सूबेदार आसफ खा से सामना हुआ, जिसमें दुर्गावती ने उसे सबक सिखाया था ।आसफ खा ने धोखा देकर उन्हें घोड़े पर बैठाने का असफल प्रयास किया । दुर्गावती का गोंडा के राजा दलपत शाह से 1542 में विवाह हुआ । विवाह के डेढ़ वर्ष बाद रानी ने एक पुत्र को जन्म दिया, जिसका वीर नारायण सिंह नाम रखा गया । इनके पति का गढ़ मंडला, देवगढ़ चंदा और खेरला नामक राज्यों में शासन था, शादी के लगभग 4 साल बाद दलपत शाह का निधन हो गया ।
उसके बाद रानी ने वीरनारायण को राज गद्दी पर आसीन कर स्वयं संरक्षिका बन गई । शासन संभालते ही रानी ने अनेक जन कल्याण कारी कार्य किए । रानी ने बाज बहादुर से मालवा का युद्ध जीता, मुगल सम्राट अकबर को गोंडवाना क्षेत्र खटकता था ।अकबर ने रानी से उसके प्रिय सफेद हाथी और दीवान आधार सिह की मांग की थी । जिसे रानी ने ठुकरा दिया । अकबर ने रानी को चरखा उपहार में भेजा ,जिसका अर्थ था कि महिलाएं घर का कामकाज करें, सूत काते ,राज्य ना चलाएं ।इस पर रानी ने अकबर को सोने का पिंजन भेजा, जिसका अर्थ था कि आप जुलाहे हैं ,आपका काम पीजन से रुई धुनना है। अकबर ने आसफ को भारी फोर्स के साथ गोंडवाना में आक्रमण के लिए भेजा ,रानी के साथ भितरघात हुआ ।एक साधु ने रानी के राज्य के सारे भेद बता दिए। रानी के साथ उनका वीर पुत्र वीर नारायण भी था ।रानी के सैनिक छापामार युद्ध में माहिर थे।आसफ के पास विशाल सेना थी ,साथ ही रानी के साथियों की दगाबाजी भी थी । अन्त में मुगल सेना की विजय हुई, रानी जब घायल हो गई तो उनका दृढ़ निश्चय था कि मेरे मृत शरीर को मुगल छू ना सके ।उन्होंने अपने दीवान से अपने जीवन को अन्त करने के लिए कहा । उसने मना कर दिया। अंत में रानी ने अपनी कटार से अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली। 24 जून 15 64 को वीरगति को प्राप्त हो गयी ।इस महान वीरांगना के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता है ।राधारमण, कल्लू चौरसिया,अमर ओमर, और अजय गुप्ता मौजूद रहे।

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