तो अब ये तय हो गया कि कुछ साल तक अफगानिस्तान में तालिबान का शासन रहेगा..लेकिन अफगानिस्तान में जो कुछ हुआ..जो कुछ हो रहा है और जो कुछ होगा..उससे हम क्या सबक सीख सकते हैं..ये सिर्फ भारत के लिए है..फिर भी मैंने अलग-अलग ब्रेकअप किया है..ताकि समझने में आसानी रहे…

1- मुस्लिम उम्माह…अरबी शब्द उम्माह का मतलब होता है एक समुदाय..अब तक ये माना जाता था कि दुनियाभर के मुस्लिम एक जैसा सोचते हैं..एक-दूसरे की मदद करते हैं क्योंकि उनका अल्लाह एक है..लेकिन अफगानिस्तान ने इस धारणा को भी तोड़ दिया..ये धारणा पहले भी गलत थी और अब एक बार फिर गलत साबित हो गई..

अफगानिस्तान में मरने वाले भी मुसलमान हैं और मारने वाले भी..लेकिन दुनियाभर के ज्यादातर मुसलमानों को मरने वालों की चिंता नहीं है..वो मारने वालों की जीत पर खुश हैं..इसे इस तरह समझिए..कोई भी मुस्लिम देश अफगानिस्तान के शरणार्थियों को शरण देने को तैयार नहीं है..फिर चाहे वो मुस्लिम उम्माह का अब्बा बनने की कोशिश करने वाला टर्की हो..खुद को सर्वश्रेष्ठ मुस्लिम राष्ट्र समझने वाला ईरान हो..मक्का मदीना वाला सऊदी अरब हो या फिर हमारे पड़ोस का बांग्लादेश..

खास बात ये है कि इन मुस्लिम देशों ने मुसलमानों को उनके हाल पर मरने के लिए पहली बार नहीं छोड़ा..चीन ने उइगर मुसलमानों की ऐसी-तैसी कर रखी है..लेकिन इनके मुंह से एक शब्द नहीं निकलता..चाहे अफ्रीकी और मिडिल ईस्ट के देशों के मुस्लिम शरणार्थी हों या फिर रोहिंग्या..मुस्लिम उम्माह ने उनकी खैरियत नहीं लेता..रोहिंग्या मुसलमान जब म्यांमार से भगाए गए तो बांग्लादेश ने उन्हें नहीं रखा..संयुक्त राष्ट्र ने बड़ी मान-मनोव्वल की..तब जाकर कुछ रोहिंग्या को रखने के लिए तैयार हुआ लेकिन उन्हें ऐसे जंगली इलाकों में रहने के लिए भेजा जहां दलदली जमीन और सांप-बिच्छू हों..

इसलिए सभी मुस्लिम शरणार्थियों को शरण या तो पश्चिमी देशों में चाहिए..या फिर भारत में..अफगानिस्तान में मर रहे मुसलमानों के लिए उम्माह उफ तक नहीं कर रहा..फ्रांस या फिलीस्तीन के मुसलमानों के लिए जो दर्द उमड़ता है वो उइगर या फिर अफगानिस्तान के पीड़ित मुसलमानों के लिए गायब है..

2- शरीया शासन – रिसर्च और सर्वे करने वाली एक अमेरिकन कंपनी है Pew Research Center..सर्वे कराने के लिए बहुत भरोसेमंद है..इस कंपनी ने कुछ साल पहले अफगानिस्तान समेत तमाम देशों में शरीया शासन को लेकर सर्वे किया था..जनता से पूछा था कि क्या वो शरीया शासन चाहते हैं..अफगानिस्तान की 99% जनता ने कहा कि हां वो शरीया शासन चाहते हैं…

जी हां आपने ठीक सुना..99% अफगानी शरीया शासन चाहते हैं..लेकिन अब जबकि शरीया शासन अपने Purest Form में अफगानिस्तान में आने वाला है तो बचाओ-बचाओ की अपील कर रहे हैं..ये शरीया शासन भी गज़ब की मृगतृष्णा या ख्वाब है..मुसलमानों की बड़ी आबादी शरीया शासन चाहती तो है लेकिन उस शासन व्यवस्था में रहना नहीं चाहती..

भारत में भी कई लोग होंगे जो शरीया शासन का ख्वाब देखते होंगे लेकिन उनसे पूछ लीजिए कि क्या वो अफगानिस्तान में रहना चाहेंगे ? शायद 1 परसेंट भी अफगानिस्तान जाने को तैयार ना हो..

3- मुगल शासन..कांग्रेस के राज और वामपंथी इतिहासकारों की वजह से मुगल काल के शासन को भी बहुत बढ़ा-चढ़ाकर बताया जाता रहा है..याद रखिए भारत में मुगल सेंट्रल एशिया से अफगानिस्तान होते हुए ही आए..वही अफगानिस्तान जहां एक बार फिर मुगल शासन दिख रहा है..अगर 21वीं सदी में भी मुगल शासन (तालिबान ) ऐसी बर्बरता दिखा सकता है तो 14वीं या 15वीं शताब्दी में क्या हुआ होगा ?

4- छद्मधर्मनिरपेक्षता…ये प्वाइंट सबसे इंट्रेस्टिंग है..कहीं पढ़ा था कि धर्मनिरपेक्षता और इस्लाम विलोम शब्द हैं..ये एक साथ नहीं रह सकते..अब ये बात कितनी सच है इसका फैसला तो आप लोग ही करें लेकिन ये तो सच है कि दुनिया में करीब 50-55 से ज्यादा मुस्लिम देश हैं..एक भी मुस्लिम देश शायद ऐसा नहीं है जो भारत जितना सेक्युलर हो..धर्मनिरपेक्षता सिर्फ वही है जहां कोई दूसरे धर्म (ईसाई, हिंदी या फिर बौद्ध) के लोग बहुसंख्यक हैं..

फिर भी खुद को सेक्युलर और लिबरल मानने वाले कई लोगों को ये शिकायत रहती है कि भारत में धर्मनिरपेक्षता खतरे में है..ये लोग जंतर-मंतर पर आपत्तिनजक नारे लगाने वाले कुछ लफंगों की तुलना सीधे तालिबान से कर देते हैं..I am ashamed as a Hindu टाइप की बातें करने लगते हैं..अफगानिस्तान में तालिबान के कब्जे और उस पर भारत में मनाए जा रहे जश्न ने इनकी आंखें भी खोल दी हैं..

तालिबान की आलोचना करने पर भारत में रह रहे तालिबानी उन पर टूट पड़े हैं..मज़े की बात ये है कि लाइक, रिट्वीट, शेयर और व्यू की वजह से I am ashamed as a Hindu टाइप की बातें करने वाले ये लोग तालिबान की आलोचना भी बड़ी बच-बचाकर कर रहे थे..तालिबान की आलोचना करने के साथ-साथ उसने कथित हिंदू फासीवाद से भी जोड़ रहे थे..ताकि बैलेंस कर सकें..लेकिन भारत में रह रहे तालिबानियों को इतना भी बर्दाश्त नहीं हुआ और वो इन पर टूट पड़े..

कुछ दिन पहले NDTV ने इसका स्वाद चखा था..ज़िंदगीभर NDTV कैसी पत्रकारिता करता रहा..सबको पता है..लेकिन एक बार ‘गलती’ ??? हो गई तो फोटो ही डिलीट करनी पड़ी…अब तालिबान की जीत और भारत में उसके जश्न से कुछ लोग चौंकन्ने तो हुए हैं लेकिन ये सावधानी कब तक रहती है..ये देखना होगा क्योंकि कई यूट्यूबर का रोजगार ही ‘हिंदू फासिज्म’ ???? को गाली देने और तालिबानी सोच को डिफेंड करने से ही चल रहा है..

सच और पैसे की लड़ाई में अभी तक तो पैसा ही जीत रहा है..

5- भारत…अफगानिस्तान पर तालिबान के कब्जे से भारत के लिए ये सबक है कि वसुधैव कटुम्बकम वाली बातें सिर्फ थ्योरी में ही अच्छी लगती हैं, प्रैक्टिकल में नहीं…जो आज शरण पाने के लिए पांव पकड़ रहे हैं…कल गला पकड़ेंगे..लेकिन लगता नहीं कि इतनी बार पीठ पर खंजर खाने के बावजूद भारत कुछ सीखेगा…मोदी जी तो जब तक शांति का नोबेल पुरस्कार नहीं पा लेते…वो रुकेंगे नहीं..