पच्चीस-पच्चीस गज की कच्ची झोपड़ी में
ये जिंदगी भी कैसे कटती है?
मेरे प्यारे सम्माननीय देश के चौकीदार बताइए
महामारी की इस सामाजिक दूरी में जिंदगी भी कैसे कटती है?

महामारी में रोना भी अमीर लोगों की ही बात है
गजों-गज में फैले घरों में ही तो होती हैं जागरूकता की बातें
जहाँ की सड़कें भी आधा गज की भी नहीं ,
वहाँ कौन सा रोग और काहे का रोना…?
अरे…काहे का करोना?

चालीस फीट की सड़कें भी अब सूनी-सूनी रहती हैं
सरकार को डर है कि महामारी इन रास्तों से ही आती है
कोई भी कह पाने की स्थिति में क्यों नहीं कि सरकार को भी बताया जाए
पच्चीस गज में उन्हें भी तीन-तीन परिवार के साथ रखवाया जाए ?

छोड़ो! जो बुनियादी सुविधाओं से भी इनको वंचित रखे
उनसे बात भी क्या की जाए
जिन्हें वैक्सीन के नाम पर तारीख पर तारीख दिए जा रहे हैं
उनसे किस उम्मीद पर भरोसा भी रखा जाए?.

नीतू झा
नीतू झा