तिरुवनंतपुरम। केरल में मलयालम वर्णमाला के 51 अक्षरों के नामों पर आधारित 51 देवियों का मंदिर बनाया गया है जिसे नवरात्र में प्राणप्रतिष्ठा के उपरांत जनता के दर्शन के लिए खोला जाएगा।

तिरुवनंतपुरम जिले के विझिन्जम के निकट पूर्णामिकावु मंदिर के लिए इन 51 देवियों की प्रतिमाएं तमिलनाडु के तंजावुर के निकट मइलाडी गांव में उकेरा गया है जो मूर्तिकला के प्रसिद्ध दूसरा सबसे बड़ा स्थान है। नवरात्र की पूर्व संध्या पर इन प्रतिमाओं को तिरुवनंतपुरम लाया गया। पूर्णामिकावु मंदिर केवल पूर्णिमा के दिन खुलता है।

देवी प्रतिमाओं की स्थापना एवं प्राणप्रतिष्ठा की योजना प्रमुख मंदिरों के मुख्य पुरोहितों द्वारा निर्धारित की गयी है जिनमें श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर के पुरोहित पुष्पांजलि स्वामीयार, मित्रन नंबूदरी, मल्लियूर शंकरन नंबूदरी एवं जाने माने संगीतज्ञ कैथाप्राम दामोदरन नंबूदरी शामिल हैं।
इसकी जानकारी देते हुए मंदिर के न्यासी एम. एस. भुवनचंद्रन ने यूनीवार्ता से कहा कि भाषा कोई भी हो, वेदों के अनुसार अक्षरों में विशेष शक्ति होती है। अक्षरों की इन्हीं शक्तियों को अनुभव करके ऋग्वेद, शिव संहिता, देवी भागवत, हरिनाम कीर्तनम् एवं आदिशंकर की रचनाओं में प्रत्येक मलयालम अक्षर की देवियों की पहचान की गयी। देवियों की अंतिम पहचान निर्धारित करने से पहले दशक भर तक शोध एवं विचार मंथन किया गया। ऐसे प्रमाण मौजूद हैं जिनमें बताया गया है कि प्राचीन काल में वैज्ञानिक एवं ऋषियों ने अक्षरों एवं शब्दों की शक्ति को पहचाना था और भावी पीढ़ी के कल्याण के लिए उसे दर्ज भी किया था।

श्री भुवनचंद्रन के अनुसार पहली चुनौती यह थी कि इस पूरे ज्ञान को वैज्ञानिक रीति से कूटबद्ध किया जाये और प्रतिमाओं के स्वरूप का निर्धारण किया जाये। उन्होंने कहा कि पश्चिमी देशों के आधुनिक शिक्षा केन्द्रों एवं सुविख्यात विश्वविद्यालयों में भी मंत्रों की शक्ति का अध्ययन एवं विश्लेषण किया गया है। मूर्तिकारों एवं शोधकर्ताओं ने इन अध्ययनों का गहनता से समझा और वेदों में वर्णित सामग्री से उसकी तुलना की। अध्ययन के परिणाम बहुत ही दिलचस्प रहे। उन्हें पता चला कि सभी अक्षरों के देव नारी रूप यानी देवी स्वरूप में हैं। उन्होंने 51 मलयालम अक्षरों के लिए 51 देवियों की पहचान की और फिर प्रतिमाओं के तीनों आयामों की तस्वीरें बनायीं गयीं और उसे मइलाडी के कुशल मूर्तिकारों ने बारीकी से पत्थर पर उकेरा। प्रत्येक मूर्ति के नीचे के भाग में उस
देवी को निरूपित करने वाला अक्षर भी आकर्षक ढंग से उकेरा गया है।

मुख्य पुरोहित पुष्पांजलि स्वामीयार ने कहा कि अक्षरों की देवियों का उल्लेख हरिनाम कीतर्नम् में श्लोक 14 से 16 में मलयालम भाषा के जनक एझुथाचन द्वारा किया गया है। हालांकि देवी सरस्वती को अक्षरों की देवी माना जाता है लेकिन वह केवल एक मलयालम अक्षर ‘त’ की देवी बताया गया है। उन्हें एक अन्य नाम तमस्या देवी के नाम से भी पुकारा गया है यानी जो अंधकारा का नाश करतीं हैं। उन्होंने कहा कि वेदों एवं पुराणों में देवी काली को 51 नरमुंडों की माला पहने दर्शाया गया है जो वेदों एवं पुराणों में प्रयुक्त 51 अक्षरों का प्रतिनिधित्व करते हैं।

इस परियोजना को मूर्तरूप देने वाले श्री भुवनचंद्रन ने कहा कि 12 साल तक चले प्रयासों के बाद इन प्रतिमाओं की स्थापना हो रही है। प्रत्येक मूर्ति अलग प्रकार के परिधान, आभूषण, शस्त्र एवं वाहन को धारण किये है। सुप्रशिक्षित मूर्तिकारों ने डिंडीगुल में नामक्कल से कृष्णशिला को मूर्तियां बनाने के लिए चुना। प्रत्येक पत्थर 15 फुट ऊंचा एवं 10 फुट चौड़ा था। इसे पांरपरिक कला परंपरा एवं ज्ञान के आधार पर तराशा। चूंकि मूर्तिकार तमिलनाडु के थे जिन्हें मलयालम का ज्ञान नहीं था। ये भी एक समस्या थी। तमिल वर्णमाला में 247 अक्षर हैं जबकि मलयालम में केवल 51। बाद में उन्हें मलयालम की वर्णमाला का ज्ञान कराया गया।

इतिहास के अनुसार पूर्णामी देवी की आराधना आयी वंश के शासक समर देवी (पद काली के पांच रूपों – बाल भद्र, सौम्य भद्र, वीर भद्र, शूर भद्र, संहार भद्र देवी) के रूप में करते थे। आयी वंश का शासन तमिलनाडु के पांड्य चोल वंश और केरल के चेर वंश के शासन क्षेत्र के बीच के क्षेत्र में था और विझिन्जम उनकी राजधानी हुआ करती थी।

वार्ता