आजादी आंदोलन के दौर की समझौतापरस्ती व नीतिविहीनता का गुनाह देश-विभाजन का कारण बना. अब हमारे व पश्चिम एशिया के बीच एक पाकिस्तान जैसा पहाड़ खड़ा हो गया था. भू-राजनीतिक समझ का तकाजा था कि यह पाकिस्तान हमारे लिए चुनौती न बन सके. लेकिन ठीक उल्टा हुआ. कारण ? आजादी के प्रारंभिक वर्षों में हमने कश्मीर सहित साम्प्रदायिक विवाद के प्रमुख बिंदुओं यथा अयोध्या काशी मथुरा आदि के त्वरित समाधान के रास्ते नहीं निकाले.

आबादी हस्तांतरण के तनावग्रस्त वातावरण में इन साम्प्रदायिक मुद्दों का समाधान सरल था. हम हर समस्या को बड़ा करते रहे. पाकिस्तान चुनौती बनता गया.अब कहीं जाकर अनुच्छेद 370/35 ए के समापन व केन्द्रशासित प्रदेश घोषित होने के बाद जम्मू-कश्मीर की स्थिति में गुणात्मक परिवर्तन आया है. लेकिन 01जनवरी 1949 को घोषित यु्द्धविराम ने तो सब कुछ अधर में लटका दिया था. सैन्य अभियान रोक कर संयुक्तराष्ट्र संघ का युद्धविराम लागू करना, महान गांधीवादी उदाहरण प्रस्तुत करने जैसा तो था, पर समाधान नहीं था.

कश्मीर समाधान से इसलिए भटक गया क्योंकि समाधान खोजा ही नहीं जा रहा था. गांधीवाद तो नैतिक मानव मूल्य व सामाजिक दायित्व की विचारधारा है. लेकिन राजनीति के हाथ में यह तुष्टीकरण का माध्यम बन जाता है. यहां एक तिहाई कश्मीर देकर नेहरू पाकिस्तान का तुष्टीकरण करने में लगे थे, पाकिस्तानी पूरा चाहते थे. फिर अचानक घटनाक्रम ने अनपेक्षित सा मोड़ ले लिया. विभाजन की हिंसा ने कांग्रेस की लोकप्रियता का ग्राफ गिरा दिया था. आजादी के अंतिम दिनों तक गांधी की राजनैतिक भूमिका महत्वहीन हो चुकी थी.

देश गांधीवादी खुमार से मुक्त हो रहा था कि 30 जनवरी को उनकी हत्या हो गई. इस पर हुई भीषण जनप्रतिक्रिया ने कांग्रेस को संजीवनी देते हुए गांधीवाद को पुनर्जीवित कर दिया.जीवित रहते हुए गांधीजी बंटवारे के भीषण नरसंहार के परिणामस्वरूप कांग्रेस नेतृत्व के विरुद्ध दक्षिणपंथी राजनैतिक उभार को रोक न पाते. संभव था कि 1957 अथवा 1962 के चुनावों के बाद हम सावरकर श्यामाप्रसाद मुखर्जी की राष्ट्रवादी वैचारिक शक्तियों को सत्ता में देखते. लेकिन गांधी जी की हत्या ने भविष्य का परिदृश्य ही बदल दिया. सावरकर को अभियुक्त बनाकर उनकी राजनैतिक संभावनाओं की हत्या कर दी गई जिससे वे कभी उबर नहीं सके.

1950 में सरदार पटेल के चले जाने के बाद नेहरू का मार्ग निष्कंटक हो गया. यदि गांधी जी की हत्या न हुई होती तो संभवतः राष्ट्रवादी शक्तियों को 2014 तक प्रतीक्षा न करनी पड़ती. राजनैतिक नेतृत्व द्वारा गांधीवाद की अहिंसक सोच का अविवेकपूर्ण प्रयोग राष्ट्रहित के विरोध में आ खड़ा होता है. बहरहाल गांधीवाद का प्रभाव सैन्य रणनीतियों व 1962 एवं 1965 के युद्धों पर भी पड़ा. सैन्य अधिकारी राजनैतिक दबाव में अपनी मूल वृत्तियां भूल कर सर्कस के शेर हो गये थे. अपने सैन्य दायित्व का निर्वहन न करने का सवाल उनसे भी बनता है.

हमने देखा है कि 1962 में बेसिक युद्धनीति के विरुद्ध जाकर सेनाओं से ‘फारवर्ड पालिसी’ जैसी गांधीगीरी कराई गयी जिससे बड़े पैमाने पर शहादतें हुईं.1957 तक सैन्य अधिकारियों को पता नहीं था कि हमारी भारत-तिब्बत सीमारेखा कहां से गुजरती है ? किसने रोका कि पेट्रोलिंग पार्टियां न भेजी जाएं ? आपके पास एयरफोटो रिकानेसेंस के लिए कैनबरा बाम्बर्स का स्क्वाड्रन था. सीमाक्षेत्रों की नियमित फोटोग्राफी कराने में क्या समस्या थी ?? ‘एक इंच भी भूमि न छोड़ना’, तो राजनैतिक जुमला होता है नीति नहीं. सेना तो रणनीति से चलेगी. आपने क्यों सैनिकों को पुलिस के सिपाहियों की तरह सीमाओं पर ऐसे लगा दिया जहां उन्हें निरूद्देश्य मरना ही मरना था ? एयरफोर्स बढ़ रहे चीनियों पर हमले नहीं कर रही है, सैनिक शहीद हो रहे हैं.

आपने ऐसी स्थिति में मजबूती से दबाव देकर नेताओं से एयर सपोर्ट की मांग क्यों नहीं की ? 1962 में नेहरू, कृष्णा मेनन का नाकारापन तो जगजाहिर है लेकिन माहौल ऐसा अहिंसक था कि सैन्य अधिकारी भी रणनीतियों के अनुरूप निर्णय ले पाने में सक्षम नहीं रह गये थे. 1965 के युद्ध ने हमें कश्मीर समस्या के समाधान का आदर्श अवसर दिया था. पाकिस्तान ने कश्मीर घुसपैठ फिर छंब-जौड़ियां में टैंकों से हमला किया था. शास्त्री जी ने लाहौर स्यालकोट पर नया मोर्चा खोल कर पाकिस्तान के आक्रमण को कुंद तो कर दिया पर लाहौर के निकट पंहुच कर हमारे कमांडर नर्वस हो गये. लाहौर कब्जे में नहीं लिया. उधर कश्मीर में हाजीपीर पास के अलावा बालतिस्तान में स्कर्दू गिलगिट की दिशा में कोई सैन्य लक्ष्य नियत ही नहीं किया गया.

1965 का युद्ध एक रणनीतिविहीन युद्ध होकर रह गया. हमें कश्मीर मुक्त कराना था. लेकिन फिर वही गांधीगीरी, जो जीता भी गया था वह भी हाजीपीर सहित वापस कर दिया गया. 1971 तो आजादी के बाद की सबसे बड़ी विजय व सबसे बड़ी रणनीतिक चूक भी थी.अय्यूब खान ने कहा था कि पाकिस्तान की असली जंग पश्चिमी मोर्चे पर होगी. बांग्लादेश तो आजाद हुआ, कश्मीर नहीं आया. हमें कश्मीर-पंजाब मोर्चे पर आक्रामक और पूर्वी मोर्चे पर पाक सेनाओं से परंपरागत युद्ध लड़ना था. हमारे पश्चिमी व कश्मीर मोर्चा फतह करते ही बांग्लादेश में स्वतः आत्मसमर्पण हो जाता. कश्मीर का सैन्य समाधान बांग्लादेश की आजादी ले आता. लेकिन हमने ठीक विपरीत किया. इंदिरा गांधी, निक्सन-कीसिंजर के इतने दबाव में आ गईं थीं कि जनरल मानेकशॉ के विरोध के बावजूद उन्हें कश्मीर में रक्षात्मक होना पड़ा.

13 दिनों में बांग्लादेश आजाद कराने की रेस लगाने का परिणाम यह हुआ कि पश्चिम के असली मोर्चे पर हमारी सेनाओं को समय ही नहीं मिला. दुनिया में हमारी प्रसंशा हो इसलिए ढाका-आत्मसमर्पण होते ही इंदिरा गांधी ने स्वतः युद्धविराम की घोषणा कर दी. तुष्टीकरण आधारित समझौते के बाद इस विजय का कोई अर्थ नहीं रहा. कश्मीर मुक्त हो जाता, अफगानिस्तान से हमारा सड़क सम्पर्क हो जाता, पाकिस्तान-चीन गठजोड़ जो 1963 से ही आकार ले रहा था, निष्प्रभावी हो जाता, पाकिस्तान अपनी औकात में आ कर मित्र हो जाता. यह सब तब होता जब हमारे राष्ट्रीय नेतृत्व में राष्ट्रहित की स्पष्ट समझ होती. जब 2014 आ गया तब कहीं जाकर इस देश को राष्ट्रहित की परिभाषा समझ में आई. गांधीवादी राजनीति व राष्ट्रहित का परस्पर विरोधाभास हमारी समस्याओं का मुख्य कारण रहा है. हमने पकिस्तान को आणविक शक्ति बनने दिया, चीन-पाकिस्तान गठजोड़ के मूकदर्शक रहे. परिणाम भी सामने हैं. समाधान के रास्ते भी उसी तरह विकट होते चले गये हैं.

  • आर. विक्रम सिंह ( पूर्व सैनिक, पूर्व प्रशासक)