जातिगत जनगणना की मांग बिहार यूपी से उठी है. यहीं से उठती भी रहती है. क्योंकि यहां के पिछड़े वर्ग के जातीय दलों के नेताओं को जनगणना से उत्पन्न होने वाले विभाजन से और उसके साथ अल्पसंख्यक वोटों के सामंजस्य से एक स्थायी रूप से संभावित सत्ता का फार्मूला दिखता है. यह समस्या देश की नहीं है बल्कि मात्र तीन राज्यों की है यदि इसमें हम मध्यप्रदेश को भी जोड़ लें. इन जातीय दलों का लक्ष्य इन राज्यों की सवर्ण राजनीति को पूर्णतः समाप्त करना है. लेकिन देश यूपी, बिहार मध्यप्रदेश से बहुत बड़ा है.

सवर्णों के अपने संकट हैं. क्षत्रियों का पुराना जमींदार तालुकदार तबका या उनके चमचे गुजारेदार इतिहासजीवी राजपूत बने हुए बदल रहे जमाने की सच्चाइयों को स्वीकार करने से गुरेज करते हैं. वर्तमान में जो जमींदारी के हैंगओवर से मुक्त क्षत्रिय ठाकुर हैं उनकी भूमिका तो हर क्षेत्र में बढ़ रही है. समस्या उनकी है जो इतिहास का पागुर करते रहे हैं. इतिहास जानना ठीक है लेकिन अब कलम, कम्प्यूटर की महारत चाहिए. जरूरत पड़ने पर कुर्मी समाज की तरह फावड़ा उठाने की भी क्षमता चाहिए. खेत हैं तो खाली हैं, बटैया पर हैं. बिक रहे हैं. सामाजिक संकट, आर्थिक संकट खड़ा कर रहा है. वैदिक सनातन धर्म विश्व का एकमात्र धर्म है जिसने राष्ट्र समाज व धर्म की रक्षा के लिए एक पूरा वर्ण ही खड़ा कर दिया था. फिर भी हम सैकड़ों वर्षों के संघर्ष व बलिदानों के बाद भी अफगानिस्तान व पंजाब सिंध का इलाका विधर्मियों के हाथों में चले जाने से नहीं बचा सके. इतिहासजीवियों को इस सच्चाई पर आत्ममंथन करना बनता है.

वैश्य कायस्थ समाज के लिए कोई सामाजिक संकट नहीं है, न उन्हें कोई चुनौती देने वाला ही है. सरकारी से प्राइवेट सेवाओं में कोई समस्या नहीं है. शिक्षा का जमाना है, यही उनका क्षेत्र है. अर्थ के काल में वैश्य वर्ग के सामने कोई सामाजिक आर्थिक संकट नहीं है. वर्णव्यवस्था का सबसे सक्षम वर्ण वैश्य वर्ण ही है. यह हिंदू समाज की आर्थिक शक्ति का आधार है.

जहां तक शूद्र वर्ण की बात है, वह सरकारी सेवाओं में आरक्षण के जबरदस्त लाभ के बाद भी विक्टिम कार्ड खेलता ही रहेगा. जिनकी दो तीन पीढ़ियां भी सरकार सेवा में रह चुकीं तो भी उन्हें उस बैसाखी से मुक्त करने का कोई उपाय ही नहीं है. विक्टिम बने रहने के लिए व्यतीत इतिहास को दोहराते रहना इनकी मजबूरी है. क्रीमी लेयर में आकंठ डूब जाने बाद भी वह शंबूक की कथा दुहराता रहेगा. लेकिन जो असल में पीड़ित वनवासी वर्ग है उसकी आवाज ही नहीं उठती. उसे अपने प्रवक्ता तक नहीं मिलते. वह तो समाज से दूर जंगल में रहा है तो विक्टिम कार्ड कैसे खेले. इसलिए वह अपने पर हुए अत्याचार शोषण की पुरानी कथाएं नहीं कहता. कहे भी कैसे ? कोई कथाएं हैं ही नहीं. जो हैं भी, वे अंग्रेजों के काल की हैं.

अनुसूचित वर्ग का सरकारी सेवाओं में अनुपात बढ़ने के कारण क्रमशः वह नये कायस्थों के रूप में विकसित हो रहा है. यह बात मार्के की है कि कायस्थ व आरक्षित अनुसुचित वर्ग में अन्तरवर्णीय वैवाहिक सम्बंधों में भी वृद्धि हो रही है. यह सामाजिक उर्ध्वगामिता का एक उदाहरण है.

अब जो मण्डल कमीशन के फलस्वरूप जो नया पिछड़ा वर्ग क्षितिज पर उदय हुआ है वह एक प्रकार से वैश्य व शूद्र के मध्य में दोनों के गुणों को समाहित करता हुआ विकसित हो रहा एक नया वर्ण है. मनु महाराज ने चार वर्ण बनाए. कलियुग में राजा विश्वनाथ प्रताप सिंह उठे. उन्होंने यह पांचवा मध्यवर्ती वर्ण बना दिया. इस नवीन वर्ण के सामने इतिहास का कोई संकट नहीं है. लोकतंत्र है तो संख्याबल महत्वपूर्ण है. संख्याबल है तो राजनीति नियंत्रण में है और राजनीति नियंत्रण में है तो आरक्षण भी ले लिया जाएगा. वे सत्ता की आदर्श स्थिति में आते जा रहे हैं. उनका संकट सामाजिक स्वीकार्यता का है. वे जिन्हें हम पिछड़ा कहते हैं वे इस वर्णव्यवस्था में कहां हैं ? कुछ को तो आप अति पिछड़ा कह कर अनुसूचित वर्ग के साथ चिन्हित कर सकते हैं तो शेष कहां है ? वे कहीं नहीं हैं, बस हिंदू हैं. तत्कालीन पुजारी समाज में दक्षिणा दे सकने में अक्षम इस वर्ग को हिंदूओं में क्षत्रिय या वैश्य या कृषक वैश्य स्वीकार करने का कोई उत्साह नहीं था. इन्हें भी कोई परवाह नहीं थी. फलतः बहुत बड़ा हिंदू समाज वर्णविहीन रह गया. जो संकट शिवाजी महाराज के सम्मुख था वह इस समग्र विश्वनाथ वर्ण के सामने है. चितपवन ब्राह्मण उन्हें क्षत्रिय स्वीकार करने को तैयार ही नहीं थे. बाध्य होकर काशी से गागा भट्ट को बुलवा कर राजतिलक कराया गया. फिर भी मराठे क्षत्रिय नहीं माने गये. आज जाट कुर्मी गुर्जर ढढोर लोधी खत्री मराठा कन्नाडिगा लिंगायत वोक्कालिगा खोंडायत नायर चेट्टियार आदि आदि कहां, किस वर्ण में हैं ? ये शूद्र हैं नहीं, इन्हें क्षत्रिय या वैश्य आपने माना ही नहीं तो हिंदू समाज का यह 40% भाग आज भी वर्ण विहीन है. चूंकि इसे विश्वनाथ प्रताप सिंह जी ने पहचान दी है इसलिए उनको ऋषियों में स्थान देते हुए इंगित करने की सुविधा के लिए इस पिछड़े वर्ग को ‘विश्वनाथ वर्ण’ मान लेते हैं. यह राजनीति व समाज के सबसे सशक्त वर्ण के रूप में उभर रहा है. भविष्य इसी का है क्योंकि इसके सामने भविष्य के अतिरिक्त और कुछ नहीं है.

समस्या मूलतः ब्राम्हण वर्ण की है. पहले राजनैतिक नेतृत्व की भूमिका से बेदखल होने के पश्चात अब धार्मिक परिदृश्य पर भी वर्चस्व संकट में है. ललितादित्य महान् साम्राज्य निर्माता ब्राह्मण था लेकिन कोई ब्राह्मण उसे जानता ही नहीं. सिंध के ब्राम्हण शासक राजा दाहिर से आम ब्राह्मण का परिचय नहीं है. पुष्यमित्र शुंग और पेशवाओं को कुछ लोग जानते हैं. हां, महर्षि परशुरामजी से उत्तर भारत का ब्राह्मण समाज पूर्णतः परिचित है. समस्या यह आयी कि आजाद भारत की राजनीति में ब्राम्हण अपने को सही पोजीशन नहीं कर सका. दक्षिण भारत की वर्णविहीनता की गाज उस पर गिरी. पेरियार के ब्राह्मण विरोधी आंदोलन के फलस्वरूप वे नगरों फिर विदेशों की ओर रुख करने को बाध्य हुए.उत्तर भारत में वह ब्राह्मण बनाम क्षत्रिय का मुकदमा लड़ने लगा.

मैंने तो गोरखपुर पूर्वांचल की भीषण गैंगवार देखी है. अंततः परिणाम यह हुआ कि ये दोनों समाज राजनैतिक आकाक्षाओं के वशीभूत पिछड़े व दलित समाज के संख्या बल के सामने क्रमशः आत्मसमर्पण करते हुए हाशिये पर चले गये. आखिर बूथ कैप्चरिंग करके कितने वर्षों तक सत्ता बनाए रखी जा सकती है. वर्चस्व का प्रभाव प्रारंभ में तो रहा पर शीघ्र ही चुनौतियां मिलने लगी. जो सेवाओं प्रशासन पर वर्चस्व था भी वह विश्वनाथ प्रताप सिंह की मंडल राजनीति ने न्यूट्रलाइज कर दिया.

अब धर्म पर आयें. मठों मंदिरों की व्यवस्था किसी राष्ट्रीय धर्म परंपरा के अनुसार चलती नहीं दिख रही थी. आदि शंकराचार्य के द्वारा स्थापित चार पीठों की धार्मिक प्रशासन व्यवस्था को और आगे ले जाकर इसके अन्तर्गत सम्पूर्ण धर्मक्षेत्र व देश के समस्त मंदिरों गुरुकुलों को ले आने का कोई उपक्रम नहीं किया गया. मठों मंदिरों व अखाड़ों का कोई धार्मिक क्षेत्राधिकार भी नहीं विकसित हुआ. यह ऐतिहासिक गलती थी. इसका खामियाजा मात्र ब्राह्मण को ही नहीं समग्र हिंदू समाज को भोगना पड़ा है.

चूंकि मंदिरों व धर्माधीशों का धार्मिक क्षेत्राधिकार नहीं बना इसलिए कहीं कोई धार्मिक आघात की घटना जैसे पालघर की घटना हुई तो उसके विरुद्ध धार्मिक प्रतिक्रिया या प्रतिकार की व्यवस्था ही नहीं बन पाती. ऐसा लगता है कि आम ब्राह्मण पुजारी या मठाधीश की एक विस्तृत संगठन का भाग होने व क्षेत्राधिकार विकसित करने में रुचि नहीं थी. अन्यथा आज भारत का इतिहास ही दूसरा होता. आक्रांताओं के विरुद्ध पूरा देश खड़ा हो जाता. गोरी, गजनी का राज तो छोड़िये, अंग्रेजों को भी समाज एक दिन के लिए भी स्वीकार न कर पाता. आखिर अखाड़ों के गठन के माध्यम से आदिशंकराचार्य ने धर्मसेनाओं का ही तो गठन किया था. उन चार पीठों से आगे धर्मक्षेत्र परिक्षेत्र विकसित होने थे. लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ.

जब इस पर आप सवाल करेंगे तो इसे जाति विशेष को लक्षित करने का सवाल मान लिया जाता है. कुछ जातिरक्षक आकर खड़े हो जाते हैं. अरे भाई हमारा धर्म है, रसातल में जाने को है. जो जाति के मालिक बने बैठे हैं उनसे हम सवाल भी न पूंछें. एक साहब ने मुझसे पूंछा कि जब आप जिलाधिकारी थे तो आपने हिंदू समाज के लिए क्या किया ?जब आपने कुछ नहीं किया तो शंकराचार्यगण पर क्यों दोष दे रहे हैं. एक ने कहा कि आप बेचारे शंकराचार्यों पर अनायास लांछन लगा रहे है. अब इन जातिरक्षक मूर्खों को भला क्या जवाब दिया जा सकता है ?

इस तरह जब धर्माधीशों ने स्वयं को व अपने मंदिरों को पूजा पुजापा कर्मकांड तक सीमित कर लिया तो वे उन सामाजिक दायित्वों से मुक्त हो गये जो सांस्कृतिक सामाजिक समरसता के आधार थे. समाज में एक धार्मिक निर्वात भी बनने लगा. शूद्र समाज के लिए मंदिरों के दरवाजे बंद होने लगे. आम ब्राह्मण भी उन विशेष दायित्वों से तो मुक्त हो गया जो उसे धर्मग्रंथों ने दिये थे लेकिन जातीय श्रेष्ठता का भाव यथावत रहा . इस्लामिक काल में मंदिरों और ब्राह्मण पर बहुत बुरा बीता. काशी मथुरा में तो शायद ही कोई मंदिर साबुत बचा हो. समग्र समाज का विद्रोह संघर्ष चलता तो रहा किंतु वह संघर्ष विधर्मी आक्रांताओं के विरुद्ध एक धर्मयुद्ध का रूप नहीं ले सका. यह ब्राह्मण वर्ग के एक प्रेरक धार्मिक शक्ति से जाति में परिवर्तित हो जाने का परिणाम है. इसके साथ यह भी उतना ही सत्य है कि आज यदि हिंदू सनातन धर्म का अस्तित्व है तो वह भी हमारे ब्राह्मण वर्ण के ही कारण है.

जिस समय वर्ष 710 ई. में मीर कासिम सिंध में राजा दाहिर के राज्य पर आक्रमण कर रहा था, लगभग उसी समय अरब सेनाएं भूमध्यसागर को पार कर स्पेन में आगे बढ़ रही थीं. वहां भी ईसाइयों के चर्च ने विद्रोह किए. स्पेन में सात सौ वर्षों के इस्लामी शासन को चर्च ईसाई धर्मगुरुओं की प्रेरणा से क्रूसेड या धर्मयुद्ध के द्वारा मुक्त कराया गया. जब स्पेन मुक्त हो रहा था उस समय भारत दिल्ली में इब्राहिम लोदी का राज था. धर्मयुद्ध में अक्षम हम लोग विधर्मी आक्रांताओं को पराजित नहीं कर सके. इस्लामी शासन यहां सशक्त होता गया.

जो धर्म समाज विधर्मी आक्रांताओं के इतने वार झेल चुका वह जातिगत गणना के भ्रमजाल से भी निकल जाएगा. तुम्हारे हिंदू समाज को स्थायी रूप से खण्डित करने के ये छुद्र राजनैतिक प्रयास सफल न हो पाएंगे. समरसता, विभाजन नहीं मांगती. यह छुद्र सोच सवर्ण समाज को हाशिये पर धकेल देने का एक षड़यंत्र मात्र है. चलिए, ठीक है. कोई आपत्ति नहीं. यह भी करके देख लें. उनकी भी इच्छा पूर्ण हो जाए.

लेख लम्बा हो रहा है. अभी यहीं पर रोक देना उचित है. सुदृढ़ धार्मिक प्रशासनिक परंपरा के अभाव के कारण अंग्रेजों के काल में हमारे मंदिर सरकारी नियंत्रण में जाने लगे थे. ब्राह्मण पुजारी वर्ग में शक्तिहीनता असहायता घर करने लगी. वे अपने पूर्वजों द्वारा पैदा की गयी समस्याओं के बंधुआ थे. ब्राह्मणों का पराभव हमारी धर्म सभ्यता के सबसे बड़े संकट का जनक था. यह पराभव क्यों हुआ इस विशद विषय पर फिर कभी.

लेख : राघवेन्द्र विक्रम सिंह ( पूर्व सैनिक एवं प्रशासक )