पोस्ट का टाइटल पढ़कर भले ही आप हैरान हों लेकिन अगर पूरा पढ़ेंगे तो आप समझ जाएंगे कि मैं ऐसा क्यों कह रहा हूं ? अब ये बात तो आइने की तरह साफ हो गई है कि जब तक किसान आंदोलन को सिख लीड कर रहे थे तब तक इसे तोड़ना सरकार के लिए टेढ़ी खीर साबित हो रहा था..इसकी सबसे बड़ी वजह है सिख समुदाय का चरित्र, कम आबादी होने के बावजूद पॉपुलर कल्चर में इनका ज्यादा असर और विदेशों में जबरदस्त कनेक्शन…

सिख लॉबी विदेशों में इतनी ताकतवर है कि ना किसान आंदोलन को फंड की कमी होती..ना ही मानवाधिकार का मुद्दा बनाने वाले नेटवर्क की..सिखों के खिलाफ एक्शन लेने में एक दिक्कत ये भी है कि इस समुदाय के अंदर अब भी खालिस्तान और भिंडरावाले को लेकर भक्तिभाव है..खालिस्तान का सपना अब भी सिखों के एक बड़े वर्ग की आंखों में पलता है..यही वजह है कि लालकिले में सिख धार्मिक ध्वज फहराने के बावजूद ना तो अकाल तख्त और ना ही शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी ने इसकी आलोचना की…ना ही कैप्टन अमरिंदर सिंह को छोड़कर किसी और नेता ने…

सिखों की एक और खासियत है कि भले ही मुगलों के हाथों सिख गुरुओं का बेरहमी से कत्ल हुआ हो..भले ही चार साहिबजादे को शहीद कर दिया गया हो..भले ही पाकिस्तान और अफगानिस्तान में सिख समुदाय की लड़कियों को अगवा कर उनसे जबरदस्ती निकाह किया जा रहा हो..गुरुद्वारों को तोड़ाफोड़ा जा रहा हो लेकिन खालिस्तान के सपने के लिए सिखों का एक वर्ग मुगलों का समर्थन लेने से गुरेज नहीं करेगा…इसके अलावा मुगलवंश की तरह ही कई बार धर्म को देश से ऊपर रखने के मामले सामने आ चुके हैं..जैसे कि 1984 में ऑपरेशन ब्लू स्टार के वक्त बिहार, पूना में सिख रेजीमेंट के कुछ सिपाहियों ने बगावत कर दी थी..हालांकि इस तरह की इक्का-दुक्का घटनाएं ही हुई हैं लेकिन फिर ऐसा नहीं होगा इसकी कोई गारंटी नहीं..सरकार भी ये बात जानती है..

सिख और मुगलवंशियों का साथ आना घातक हो सकता था..इस बात की पूरी कोशिश हो भी रही थी/है..इसीलिए सरकार ने किसान आंदोलन में सिखों को लेकर बहुत आक्रामक रूख नहीं अपनाया..साम, दाम और भेद से इसे कमज़ोर करने की कोशिश की..26 जनवरी को दिल्ली में हिंसा और लालकिले में तिरंगे के अपमान के बाद सरकार सिखों के किसान आंदोलन को काफी हद तक कमज़ोर कर चुकी है..अब आते हैं राकेश टिकैत पर…जाट समुदाय पर..जाट हों या गुर्जर..ये लाख हंगामा और हिंसा कर लें…जैसा कि आरक्षण आंदोलन के दौरान कर चुके हैं लेकिन ये कभी भी ऐसा कदम नहीं उठाएंगे..या ऐसी मांग नहीं करेंगे जो देश के खिलाफ जाए..या जिससे देश की शान में गुस्ताखी हो..अगर देश पर मर मिटने वाली कौम की बात होगी तो शायद जाट और गुर्जर सबसे आगे होंगे…

अब आते हूं पोस्ट के मुख्य मुद्दे किसान आंदोलन पर…जैसा कि मैं ऊपर बता चुका हूं कि सिखों से निपटना क्यों मुश्किल था ? पहला तो ये कि सरकार के ना चाहते हुए भी किसान आंदोलन धर्म का सवाल बन गया था..क्षेत्रीय अस्मिता (पंजाब) का सवाल बन गया था..सिख और मुसलमान साथ आ रहे थे…और इन दोनों धर्मों के लोग बीजेपी के Natural Ally यानी कुदरती साथी नहीं हैं..लेकिन जाटों के साथ ऐसा नहीं है..जाट हिंदू हैं…कट्टर हिंदू हैं..परम्पराओं को मानने वाले…हिंदू संस्कृति का विश्वास करने वाले..खाप पंचायत वाले…उसी खाप पंचायत वाले जिसकी सेकुलर और लिबरल लोग हंसी उड़ाते थे और आज अपने स्वार्थ के लिए वाह-वाह कर रहे हैं..तो हिंदू होने की वजह से..

कट्टर हिंदू होने की वजह से..हिंदू संस्कृति पर भरोसा करने की वजह से…देश से गद्दारी नहीं करने की वजह से जाट समुदाय बीजेपी का Natural Ally है..आज भले ही तात्कालिक गुस्से की वजह से सरकार के खिलाफ खड़ा हो..लेकिन जाट जानते हैं कि जो लोग अपने स्वार्थ की वजह से आज उनकी वाह-वाह कर रहे हैं..उन्होंने मुज़फ्फरपुर दंगों के वक्त किस तरह उन्हें अकेला छोड़ दिया…वो ये भी जानते हैं कि मुज़फ्फरनगर दंगा किस वजह से हुआ…और जिस वजह से दंगा हुआ..वो वजह आज भी उनके घर के आसपास मौजूद हैं और उससे उन्हें बीजेपी ही बचा सकती है…

बीजेपी भी ये बात जानती है कि आज जाट भले ही उनसे नाराज़ हो..लेकिन जब धर्म की बात आएगी..जब जाटों की बहू-बेटियों की इज्ज़त की बात आएगी तो आखिरकार जाट लौटकर उनके पास ही आएंगे..इसलिए राकेश टिकैत का हीरो बनना बीजेपी सरकार के लिए मुफीद है…सरकार इस बात से खुश ही होगी कि अब किसान आंदोलन का फोकल प्वाइंट गाज़ीपुर बॉर्डर बन गया है..जाट बन गए हैं..राकेश टिकैत बन गए हैं..बीजेपी जानती है कि राकेश टिकैत की हिस्ट्री ऐसी है..उनका कारोबार ऐसा है कि उनपर दबाव बनाया जा सकता है..यही वजह है कि सिंघु बॉर्डर और टीकरी बॉर्डर पर भले ही हंगामा हो रहा हो..लेकिन गाज़ीपुर बॉर्डर पर सरकार ना कुछ करेगी..ना कुछ करवाएगी..सरकार यही चाहेगी कि अब किसान आंदोलन का नेतृत्व जाट ही करें..टिकैत की टिके रहें और पंजाब वालों का तंबू उखड़ जाए..फिलहाल तो ऐसा होता ही लग रहा है..और बीजेपी अंदर ही अंदर खुश हो रही होगी..क्योंकि जाटों को मनाना मुमकिन है..

  • Deepak Joshi ( TV Journalist )