धीरे धीरे गुम हो रही ढेढिया लोकनृत्य

by vaibhav

कौशाम्बी:- आज बहने भाइयों की मंगल कामना के लिए ढेड़िया उतारी है लोटे जैसे आकार खूबसूरत जालीदार सजा कर ढेड़ीया में दिया रखकर भाई की नजर उतारने के बाद उसे चौराहे या घर के बाहर फेंक दी जाती है पर्व के मद्देनजर ढेड़ीया तैयार करने में कुम्हारों का कुनबा इस मौके पर जुटा रहा उन्होंने कच्ची मिट्टी से बने गर्दन दार कलश को नहन्नी से झरोखे दार रूप देकर ढेड़िया तैयार किया जाता है इसी में दिया रखकर भाइयों की नजर उतारी जाती है बाजार में सादी रंगीन ढेड़िया बिकने के लिए सजी हुई थी साथ ही लाइ चना चूड़ा चीनी के खिलौने की दुकान भी लगी हुई है रात को बहनें अपने भाइयों के सिर पर चढ़े हुए शनिचर को ढेडीया उतार कर भगा देने का भरोसा जताती है ।

ग्रामीण अँचलों में ढेङीया लोकनृत्य में आठ-दस महिलाएं मध्यरात्रि एक साथ सिर पर मिट्टी के बने ढेड़ीया उतारने के बाद उसी रात नृत्य कला पर दीया रखकर गीत के लय पर नृत्य करती हैं। एक महिला बीच में और सभी महिलाएं उसके चारों ओर घूमकर नाचती हैं। कई बार तो सिर पर कई घड़े रखकर भी नाचती हैं। समय के मुताबिक , “डीजे और फिल्मों के आगे अब लोग गीत संगीत कलाकारों को तवज्जो ही नहीं देते हैं, लेकिन अभी भी कई ऐसे लोग हैं, जो इस पारम्पारिक त्योहार को पसंद करते हैं।

रिपोर्ट श्रीकान्त यादव

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