Home Blog ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है !

ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है !

by shubham
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एक फ़िल्म आती है। इस फ़िल्म को व्हाइट हाउस में प्रदर्शित किया जाता है। अमेरिका के राष्ट्रपति वुडरो विल्सन इस फ़िल्म की तारीफ़ में इसे – “सफ़ेद बिजली से लिखा गया इतिहास” कहते हैं। हम बात कर रहे हैं – 1915 में ग्रिफिथ के निर्देशन में आई फ़िल्म “द बर्थ ऑफ द नेशन” की। यह फ़िल्म अमरीकी फ़िल्म इतिहास में एक क्रांति की तरह आई। बेहद सफल फ़िल्म। ख़ूब पैसा भी कमाया और ख़ूब नफ़रत भी फैलाई।

दरसअल इस फ़िल्म में अफ़्रीकी – अमेरिकी लोगों को अर्थात काले रंग वाले लोगों को एक हिंसक जानवर की तरह दिखाया गया था। इस फ़िल्म में काले लोगों को हत्यारा, व्हाइट महिलाओं की इज्ज़त लूटने वालों की तरह दिखाया गया। अब जिस फ़िल्म की तारीफ़ देश का राष्ट्रपति कर रहा हो तब आप समझ सकते हैं कि ये फ़िल्म कितनी प्रभावकारी रही होगी।

इस फ़िल्म के आने के बाद अमरीका में ब्लैक लोगों के प्रति हिंसा फ़िर से शुरू हो गई। इस फ़िल्म ने व्हाइट सुपरमेसी को फ़िर से हवा दे दी थी। जो चिंगारी ग्रिफिथ की फ़िल्म ने लगाई थी, वो चिंगारी अब आग की तरह अमरीका में फ़ैल रही है। आपको सिर्फ़ इसलिए जीने का हक नहीं है क्योंकि आपके शरीर का रंग काला है! आपको पुलिस गला दबाकर सिर्फ़ और सिर्फ़ इसलिए मार देती है क्योंकि आपका रंग काला है।

ब्लैक लोगों के प्रति हिंसा और नफ़रत का एक लंबा इतिहास रहा है अमेरिका में। ये कोई नई बात नहीं है। 2014 में एरिक गार्नर नाम के एक ब्लैक अमरीकी को न्यूयॉर्क पुलिस गर्दन दबाकर मार देती है, वो भी बिना किसी गुनाह के। अगर गुनाह किया भी तो उसके लिए भी न्यायालय है। जज है-कानून है। लोकतंत्र है। फ़िर भी पुलिस किसी ब्लैक नागरिक को गला दबाकर मार देती है | तो इस से पता चलता है ब्लैक लोगों के प्रति व्हाइट लोगों में कितनी नफ़रत भरी हुई है।

एरिक ने ग्यारह बार कहा था – “मुझे छोड़ दो वरना मैं मर जाऊंगा। आई कांट ब्रीद!” फ़िर उसकी सांसे रुक गई। वो मर गया। उसका गुनाह सिर्फ़ इतना ही था कि वो एक ब्लैक अमरीकी था!

अभी कुछ दिन पहले ब्लैक अमरीकी जॉर्ज फ्लोयड की हत्या भी पुलिस ने ठीक ऐसी ही की। गर्दन दबाकर। जॉर्ज फ्लोयड ने भी अपनी दलील में बस इतना ही कह सका – “आई कांट ब्रीद” । फ्लोयड का भी सिर्फ़ यही कसूर था कि वो ब्लैक था। एरिक गार्नर और फ्लोयड तक कुल पंद्रह अश्वेत अमरीकी पुलिस हाथों मारे जा चुके हैं।

सोचिए जब अमरीकी पुलिस तक इस नफ़रत में जल रही है, तब अमरीकी व्हाइट लोगों में कितनी नफ़रत होगी! कोई अश्वेत अमरीकी गर्लफ्रेंड के साथ था, उसे मार दिया। कोई अपने घर में सोया था, उसे घर में जाकर मार दिया। कोई फील्ड में खेल रहा था, उसे खेलते हुए मार दिया।

फ्लोयड की पुलिस के द्वारा हत्या के बाद इस हत्या और व्हाइट सुपरमेसी के विरोध में लोग सड़कों पर उतर आए हैं। लोगों ने व्हाइट हाउस को घेर लिया। अमरीकी व्हाइट राष्ट्रपति बंकर में छुप गया। बंकर से वो व्हाइट राष्ट्रपति इस विरोध प्रदर्शन के खिलाफ ट्वीट करता है कि लूट करोगे तो शूट कर देंगे! एक देश के राष्ट्रपति का इतना घटिया ट्वीट उनके दिल में भरी नफरतों को ही दिखाता है।

याद कीजिए जेएनयू और जामिया के छात्रों पर हुई दिल्ली पुलिस की बर्बर कार्रवाई। याद कीजिए अनुराग ठाकुर का नारा – देश के गद्दारों को गोली मारो सालों को! यह एक जनप्रतिनिधि का नारा था। जब पुलिस और जनप्रतिनिधि ही नफ़रत फ़ैलाने का काम करने लग जाती है तभी लोकतंत्र कमज़ोर हो जाता है। मानवीय मूल्य आज जीवन से एकदम से लुप्त हो चुके हैं और हम अपने अपने स्वार्थ व नफ़रत में लिप्त हो चुके हैं।

धर्म के नाम पर लोगों को मारते देखा। जात पात के नाम पर मरते और मारते देखा। लेकिन नफ़रत का ये वीभत्स रूप कि आपकी हत्या सिर्फ़ आपके ब्लैक होने के कारण हो जाती है! पूरी दुनिया में हर जगह नफ़रत तेज़ी से पैर पसार रही है। एक हाथिनी को अनानास में बारूद डालकर खिला दिया जाता है। और गर्भवती हाथिनी की मौत हो जाती है। हम कौन सी दुनिया बनाने निकले थे और कौन सी दुनिया बना ली! हम सिर्फ़ एक इंसान बनकर भी जी नहीं सकते क्या? नफ़रत इतनी ताकतवर हो गई कि अब हम इससे जीत नहीं सकते!

हमने मनुष्यता का अपमान किया है। हमने ईश्वर का अपमान किया है। ईश्वर कभी माफ़ नहीं करेगा! ईश्वर हम शर्मिंदा हैं। हमें बिलकुल भी माफ़ नहीं करना।

दीपक सिंह

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