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राजनीति और रस्साकसी

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जब राजनितिक नेतृत्व,निक्कमा साबित होता है?तो धार्मिक ठेकेदारों का राजतंत्र में हस्तक्षेप बढ़ता है,और जब दोनों निक्कमे साबित हो जाये तो अदालतों का महत्व बढ़ जाता है,यह सिस्टम भी फेल हो जाये?तो जनक्रांति ही अंतिम विकल्प होता है जनता के पास !

भारत में राजनितिक विफताओ ने धार्मिक ठेकेदारों को मजबूत्त बनाया, अब धार्मिक ठेकेदार भी अय्यास,निक्कमे साबित हो गए है तो जनक्रांति के तीसरे चरण में है देश की व्यवस्था,यानि न्यायपालिका पर,यह व्यवस्था भी दम तोड़ने की स्थिति में होगी?तब कोई नही रोक सकता है जनक्रांति ! यही वजह है कि राजनितिक नेतृत्व से ज्यादा सक्रिय है धर्म ठेकेदार,धर्म ठेकेदारों के निककमेपन की वजह से धार्मिक मामले गये है अदालतों में,यदि राजनितिक,धार्मिक नेतृत्व की तरह अदालते भी उदासीनता का रुख अपनाती तो स्थिति बहुत भयानक होती?वर्तमान परिदृश्य में यह अनदेखा बिलकुल नही किया जाना चाहिए कि मोदी के नेतृत्व में एक विशेष वर्ग कुछ हद तक न केवल शांत हुआ है बल्कि यह महसूस भी किया है मोदी आपके धार्मिक कट्टरता के दबाव में सत्ता के लिए उस तरह ब्लैकमेल नही होगा,जैसे कांग्रेस इन कथित धर्म गुरुओं के प्रति न केवल घुटने टेकती रही है बल्कि शासनः का अधिकांश फंड एक विशेष वर्ग को देती रही थी ! और यह फंड जम्मू,कश्मीर में तो प्रतिमाह करोड़ो रु की अघोषित पेंशन की तरह जाता रहा है !

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जनता ने देखा होगा कि कांग्रेस शासनः की अपेक्षा,फतवो का दौर बहुत कम हुआ है,हिन्दू ठेकेदार भी देखो और इंतजार करो की स्थिति में दिखाई देते है,मोदी सरकार लगभग सभी धार्मिक मामलो में दखल न देने की नीति पर काम करते हुए,अदालतों पर छोड़ दिया है ! भावी जनक्रांति की अवधि कितनी दूर है,यह न्यायिक सक्रियता पर निर्भर है कि लोकतंत्र के अन्य सभी स्तम्भ ध्वंस्त होने पर जनता को न्याय दान करने में कितनी सक्षम है ?
अनुत्तरित प्रश्न के साथ अभी हमे बड़े बदलाव के लिए इंतजार करना ही होगा,क्योकि लोकतंत्र की आयु अभी बाकी है !

  • ब्लाॅग: पवन गोयल

उपरोक्त विचार के व्यक्तिगत विचार है, न्यूजक्रांति इन विचारों से किसी भी प्रकार की सहमति / असहमति व्यक्त नहीं करता है।

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