NEWS KRANTI
Latest News In Hindi

संपादकीय : गाँधी बनाम गोडसे

114

भोपाल से भाजपा सांसद साध्वी प्रज्ञा ठाकुर के लोकसभा में नाथूराम गोडसे को देशभक्त बताने पर पैदा हुआ विवाद उनके माफ़ी मांगने के बाद भी थमता नज़र नहीं आ रहा है | कांग्रेस के युवराज राहुल गाँधी ने मौका लपकते हुए प्रज्ञा ठाकुर और गोडसे दोनों को आतंकी करार दे दिया जिस पर भाजपा के बयानवीर गिरिराज सिंह ने राहुल बाबा के बयान को विशेषाधिकार हनन बताया, साथ ही प्रज्ञा ठाकुर ने भी राहुल के बयान पर आपत्ति दर्ज कराई | हालाँकि प्रज्ञा के बयान के बाद उनको सरकार की डिफेन्स कमेटी से बाहर कर दिया गया और सुनने में आया कि बीजेपी की अनुशासन समिति भी प्रज्ञा ठाकुर पर कोई बड़ी कार्रवाही कर सकती है, ख़ैर वो जब होगी तब होगी |

गाँधी और गोडसे के बीच उपजा ये विवाद कोई नया नहीं है, गांधी के काल से ही गाँधी के विचारों के प्रति दो धड़े रहे हैं, एक उन विचारो को मानने वाले और एक न मानने वाले | यहां तक कि विचारों का यह टकराव कई बार गांधी और शहीद-ए-आज़म भगत सिंह के बीच भी इतिहास के पन्नो में दर्ज है और 1948 में गाँधी की हत्या के बाद हिन्दू महासभा और आर एस एस पर गाँधी की हत्या के आरोप लगते रहे | कांग्रेस द्वारा संघ का विरोध अक्सर गाँधी की हत्या और गोडसे के समर्थक के रूप में होता आया है | तो ये लड़ाई तो पुरानी है मगर पिछले कुछ वर्षों से, जबसे सोशल मीडिया ज्यादा चलन में आया है, गाँधी का विरोध और गोडसे का महिमामंडन बहुत तेजी से सामने आया है | हालाँकि किसी के विचारों से सहमत होना या न होना किसी का भी निजी मामला है, लेकिन समस्या वहाँ खड़ी होती है जहां निजी विचारों को वोट बैंक के लिए समाज की नुमाइंदगी बना दिया जाता है|

गाँधी के विचारों से सहमत होना या न होना किसी का भी अपना निजी मामला हो सकता है मगर विश्व पटल पर गाँधी की प्रासंगिकता से आज भी इंकार नहीं किया जा सकता है | यही वजह है कि भाजपा का एक धड़ा पीछे भले ही गोडसे को नायक मानता हो मगर पब्लिक फोरम पर गाँधी को ही आगे रखता रहा है | खुद मोदी ही विश्व के तमाम मंचों से गाँधी की प्रासंगिकता बताते नज़र आये हैं|

गाँधी का ये विरोध दरअसल कट्टर वोट बैंक को लुभाने का एक तरीका भी है, जहाँ आप किसी को खुले आम गाली देकर हीरो बन सकते हैं | और सोशल मीडिया के इस युग में उन्मादी प्रवृत्ति अक्सर देखने को मिल ही जाती है | लेकिन जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों या जनता के नुमाइंदों से इस प्रकार की बयानबाजी, तब जबकि उनका संगठन ही उनका साथ नहीं देता, की उम्मीद नहीं की जा सकती |

गोडसे का समर्थन करने वालों को ये सोचना होगा कि गोडसे ने गाँधी को उनके विचारों से असहमत होने के कारण मारा | तो क्या गोडसे समर्थक इस बात से इत्तफ़ाक़ रखते हैं कि अगर कोई उनकी बात से सहमत नहीं है तो उनको गोली मार दे ? बहरहाल विश्व पटल पर गाँधी की प्रासंगिकता से इंकार नहीं किया जा सकता है, और उनके विचारों से सहमत होना या न होना किसी का भी निजी मामला है | इसके लिए उन्माद फ़ैलाने को या भड़काऊ तरीका अपनाने को जायज़ नहीं ठहराया जा सकता |

Loading...

Comments are closed, but trackbacks and pingbacks are open.