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सभी शास्त्रो का सार है प्रेम-कृपा शंकर महाराज

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मध्यप्रदेश(पवई):- धार्मिक नगरी में माता कलेही मंदिर परिसर मे चल रही संगीतमय श्रीमद्भागवत कथा में दूसरे दिन कथा व्यास वेदविद धर्माचार्य कृपा शंकर जी महाराज ने कुन्ती भीष्म पितामह के चरित्र एवं सुखदेव जी के उपदेश का वर्णन किया गया ।

व्यास वेदविद धर्माचार्य कृपा शंकर जी महाराज श्री ने बताया

श्रीमद भागवत की कथा ही अमर कथा है । भगवान् शिव ने पार्वती अम्बा को अमर कथा सुनाई और भागवत में ऐसा लिखा है कि जिसने भागवत की कथा श्रद्धा से सुन ली वो माँ के गर्भ में दुबारा नहीं आएगा । यह शरीर छूटने के बाद वह वहाँ पहुँच जायेगा , जहाँ से दुबारा फिर जन्म नहीं लेना पड़ेगा , सदैव आनंद रहेगा । सुखदेव भगवान् भी यह कथा सुनने लगते हैं , पार्वती अम्बा सुनती जा रहीं हैं, भगवान् शंकर के नेत्र बंद थे , समाधि में योग में स्थित होकर सूना रहे हैं । पारवती अम्बा हूँ! हूँ! करती रहीं और दसवां स्कन्ध समाप्त हुआ तो नींद आ गयी उन्हें । सुखदेव भगवान् हूँ! हूँ! करते रहे और बारहवें स्कन्ध के बाद जब आँख खुली तो देखा पार्वती जी सो रहीं थीं । हूँ हूँ ! कौन कर रहा था ? पारवती जी से पूछा तो उन्होंने कहा प्रभु दशम स्कन्ध की समाप्ति तक, मैंने बहुत सावधान हो कर सुना, पता नहीं क्या आपकी माया थी कि मेरी आँख लग गई पर हूँ ! कौन कर रहा था, देखा तो सुखदेव जी तोते के रूप में हूँ! हूँ! कर रहे थे । भगवान् शंकर ने चाहा इसको मार दें ! जो खूफिया होते हैं, घुस पैठिये उनको तो मार डालना चाहते हैं, तो भगवान् शंकर ने त्रिशूल उठाया और चला दिया , सुखदेव जी वहां से भागे और वेद व्यास जी की पत्नी पिंगला के पेट में चले गए, वे बाल सूखा रहीं थीं , उसी समय उनको जम्हाई आई । पार्वती जी बाद में बोलीं भगवान् शंकर से .. “प्रभु, इसीलिए तो लोग आपको भोला शंकर कहते हैं, एक ओर तो आप कहते हो जो भागवत की कथा सुनले वो अमर हो जाता है और दूसरी ओर आप सुखदेव को मारना चाहते हो .. जब वो अमर कथा सुन ही चुका है तो मरेगा कैसे !

ऐसा मान लो कि भगवान् कृष्ण का ही संकल्प है । बारह वर्ष तक सुखदेव जी गर्भ में रहे, ऐसा शास्त्र कहते हैं, और वहीँ भगवत चिंतन, आत्म चिंतन करते रहे । व्यास जी ने प्रार्थना की, कि भाई कौन ऐसा योगी, पत्नी के गर्भ में आ गया जो बाहर आना ही नही चाहता । सुखदेव भगवान् ने कहा की मैं बाहर तब आउंगा जब मुझे ये वचन मिल जाये कि भगवान् की माया मुझपर हावी नहीं होगी । पैदा होने के बाद भगवान् की माया एक दम पकडती है ।

ये तीन इच्छाएं बड़ी जबरदस्त होती हैं , इन तीन इच्छाओं पर विजय पाना बहुत कठिन है वो तो ऊपर वाला कृपा करदे तो ठीक है, एक तो बेटे की इच्छा, दुसरे धन की इच्छाऔर तीसरे समाज में सम्मान पाने की जो इच्छा है , ये हर व्यक्ति में होती है । इश्वर की कृपा के बिना, प्रभु की माया पे विजय पाना बहुत कठिन है ।

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जब सुखदेव भगवान् प्रगट हुए और थोड़े समय के बाद वे जवान हुए, इतने सुंदर थे, भगवान् कृष्ण का चिंतन करते करते स्वयं कृष्ण स्वरूप ही होगये थे।
अभी जनेउ संस्कार हुआ नहीं, कि सुखदेव जी महाराज घर से निकल के चल पड़े तप करने, कहते हैं मैं घर में नहीं रहूँगा भजन करूँगा । सुखदेव जी घर से निकले, कि वेदव्यास के मन में ममता जाग उठी, कितना सुंदर पुत्र मिला, कुछ दिन और घर रह जाता तो अच्छा था। दुनिया को उपदेश दे रहे हैं कि भजन करना चाहिए,पुत्र जा रहा है, अपने को रोक नही पाए, उठ कर दौड़ पड़े … हा पुत्र ! हा पुत्र ! बेटाथोड़े दिन के लिए रुक जा !! जब मह्रिषी वेदव्यास ने हा पुत्रकहा, तो सुखदेवजी महाराज तो योगी थे, वृक्षों में समां गए।सुखदेव ने व्यास जी सेकहा, जैसे मेरे पीछे दौड़ रहे हो , ऐसे भगवान् के पीछे लग जाओ बेड़ा पार हो जायेगा, एक पुत्र के उपदेश से पिता को बोध हुआ .. व्यास जी वापस लौट आये; जिन्होंने परीक्षित जी को भगवत की कथा सुनाके बैकुंठ दिला दिया।

पूज्य महाराज श्री ने बताया कि महाभारत के अनुसार परीक्षित अर्जुन के पौत्र, अभिमन्यु और उत्तरा के पुत्र तथा जनमेजय के पिता थे। जब ये गर्भ में थे तब उत्तरा के पुकारने पर विष्णु ने अश्वत्थामा के ब्रह्मास्त्र से उनकी रक्षा की थी। इसलिए इनका नाम ‘विष्णुरात’ पड़ा। भागवत के अनुसार गर्भकाल में अपने रक्षक विष्णु को ढूँढ़ने के कारण उन्हें ‘परीक्षित, कहा गया।

जिस समय परीक्षित अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा के गर्भ में थे, द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा ने गर्भ में ही इनकी हत्या कर पांडुकुल का नाश करने के अभिप्राय से ऐषीक नाम के अस्त्र को उत्तरा के गर्भ में प्रेरित किया जिसका फल यह हुआ कि उत्तरा के गर्भ से परीक्षित का झुलसा हुआ मृत पिंड बाहर निकला। श्रीकृष्णने अपने योगबल से मृत भ्रूण को जीवित कर दिया।

उन्होंने बताया कि सभी शास्त्रो का सार है प्रेम और प्रेम से ही संसार का संचालन होता है बगैर प्रेम के परमात्मा की प्राप्त नही हो सकती आज समाज में लोग औपचारिकताओं तक सीमित हो गये भक्ति भाव और विश्वास के साथ ईश्वर की आराधना करने वालो को आज भी ईश्वर की प्राप्ति होती कथा पंडाल में दूसरे दिन श्रोताओं की काफी भीड रही।

खबर-कुलदीप कुमार गर्ग

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