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सम्पादकीय : मोमबत्तियां बुझा दो…………

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दिल्ली का निर्भया कांड, कठुआ रेप कांड, हैदराबाद का प्रियंका रेड्डी काण्ड, टोंक में 6 साल की बच्ची के साथ दुष्कर्म के बाद हत्या, और यकीन मानिये ये सिर्फ 3-4 आंकड़े नहीं हैं | हर दो काण्ड के दरम्यान इतने काण्ड हो चुके होते हैं, जो कभी लाइमलाइट में आते नहीं है, और हम तब मोमबत्तियां लेके निकलते हैं जब कोई कांड हो चुकने के बाद इतना बड़ा बन चुका होता है कि उसकी भरपाई सम्भव नहीं होती है |

दरअसल हम उस समाज में रहते हैं या यूं कहा जाये कि हम खुद ही उस समाज का हिस्सा हैं जो इस ताक में रहता है कि कब कोई हादसा हो और उसकी नींद खुले | हम अपनी नींद तोड़ने के लिए हादसों का इंतज़ार करते रहते हैं |

डिजिटल इंडिया का ढिंढोरा पीट रहे हैं हम और महिलाओं को समाज में खुल कर बोलने, अपनी बात रखने, आपने काम करने तक की आजादी दे नहीं पा रहे हैं | महिलाओं से जुड़ा कोई भी मुद्दा हो, हम उस पर तब तक बोलने या बात करने को तैयार नहीं होते हैं, जब तक वो गले की फांस नहीं बन जाता है | सेक्स जैसे मुद्दे पर बात करना भी यहाँ अपराध समझा जाता है | गुड टच, बैड टच जैसे मुद्दों पर बात करना या समझाना तो दूर, इसके उलट लड़कियों को बताया ये जाता है कि, अगर फलानी जगह लड़के खड़े हों, तो उधर मत जाओ या दूर से निकल जाओ | ये समझाना अपने आप में एक वहशियत है और लड़की के मन में छोटे पर से ही एक डर बैठाने की शुरुआत |

क़ानून के खौफ का तो कहना ही क्या | हमे गर्व है ऐसे कानून पर जो, जुवेनाइल के नाम पर नाबालिग को ऐसे अपराध तक में छूट दे देता है जो किसी के लिए मरने तक का सबब बन जाये | आप अपराध करते समय जुवेनाइल नहीं हैं और सजा भुगतते समय आपको रियायत चाहिए, आखिर क्यों ?

निर्भया के दोषियों को आज तक सजा मिली नहीं और यही कानून तब सर के बल दौड़ने लगता है जब किसी माननीय या उसके रिश्तेदार को एक चींटी भी काट लेती है | आखिर कब तक हम मोमबत्तियां जलाते रहेंगे और अपने फ़र्ज़ के नाम पर खानापूर्ति करते हुए मोमबत्ती की लौ में फिर किसी अगले मरे हुए का चेहरा देखने का इंतज़ार करेंगे |

यकीन मानिये अगर समाज के इस सिस्टम को बदला नहीं गया तो वो दिन दूर नहीं जब औरत अपने अस्तित्व की लड़ाई के लिए किसी भी हद तक चली जाएगी लेकिन समाज फिर भी उसे ही कोसेगा क्यों कि उसकी अपनी आज़ाद और खुली छाया होगी |

मर्द होने के नाम पर छाती चौड़ी करने वालों को मोमबत्तियां बुझाकर अपने फ़र्ज़ को अंजाम देना चाहिए | नहीं तो बात कहने और सुनने में बुरी जरूर है मगर यही मोमबत्ती किसी दिन आपको अपने घर की किसी महिला के लिए भी जलानी पड़ सकती है, क्या उस दिन भी आप मोमबत्ती जलाना ही पसंद करेंगे ?

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