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‘सामना’ से शिवसेना का BJP पर वार

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हाल ही में सत्ता पर आने वाली शिवसेना ने अपने मुखपत्र सामना के जरिए फिर एक बार भाजपा पर निशाना साधा है। अपने नुकीले और तीखे अंदाज में फिर एक बार शिवसेना ने सामना के माध्यम से फडनवीस द्वारा अजित पवार के साथ सरकार बनाने और बहुमत परिक्षण एवं विधानसभा स्पीकर के चुनाव के दौरान सभा से वाॅकआउट करने को लेकर भी तंज कसा है।

पढ़े सामना में प्रकाशित संपादकीय –

उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में सरकार ने विश्वासमत प्रस्ताव जीत लिया है। सरकार को मिला बहुमत औसत नहीं बल्कि अच्छा और धमाकेदार है। सरकार के साथ 170 विधायकों का बल है, ये हम पहले दिन से कह रहे थे। परंतु फडणवीस के चट्टे-बट्टों के चश्मे से ये आंकड़ा 130 के ऊपर जाने को तैयार नहीं था। विचारों की उड़ान भरने की क्षमता नहीं होगी तो कइयों को सह्याद्रि ‘टीले’ जैसा लगता है। ऐसा ही बहुमत के मामले में हुआ।

170 की संख्या देखकर फडणवीस के नेतृत्ववाला विपक्ष विधानसभा से भाग खड़ा हुआ। रविवार को विधानसभा अध्यक्ष पद पर नाना पटोले की नियुक्ति भी निर्विरोध हो गई। कदाचित शनिवार को ‘170’ का आंकड़ा भाजपावालों के आंख और दिमाग में घुस जाने का परिणाम ऐसा हुआ कि विधानसभा अध्यक्ष पद के चुनाव में उन्हें पीछे हटना पड़ा। अब अगले 5 साल उन्हें इसी तरह पीछे हटने की आदत डालनी पड़ेगी। मुख्यमंत्री की हैसियत से देवेंद्र फडणवीस ने जो गलतियां कीं वह विरोधी पक्ष नेता के रूप में तो उन्हें नहीं करनी चाहिए। विपक्ष के नेता पद की शान व प्रतिष्ठा बरकरार रहे, ऐसी हमारी इच्छा है।

दरअसल, यह भारतीय जनता पार्टी का अंदरूनी मामला है कि किसे विपक्ष का नेता बनाएं अथवा किसे और क्या बनाएं, परंतु राजस्थान में भारतीय जनता पार्टी की सरकार नहीं आई। वहां पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे विपक्ष की नेता की कुर्सी पर नहीं बैठीं। मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान की भाजपा सरकार पराजित हुई। वहां भी बलशाली माने जानेवाले शिवराज सिंह चौहान विपक्ष के नेता नहीं बने तथा पार्टी के अन्य नेता ने यह पद संभाला। जबकि महाराष्ट्र में दिल्लीवाले ‘फडणवीस ही फडणवीस’ कर रहे हैं। इसके पीछे का वास्तविक रहस्य क्या है यह समझना होगा। बहुमत के आसपास भी जाना संभव न होने के बावजूद दिल्ली ने फडणवीस को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई और उस सरकार के धराशायी होने के बाद अब विरोधी पक्ष के नेता पद पर भी पुन: फडणवीस की ही नियुक्ति कर दी गई।

असल में महाराष्ट्र की जनता को भाजपा के राज्य स्तरीय नेतृत्व में भी बदलाव चाहिए था तथा इसका प्रतिबिंब मतदान में दिखा था। इसके बावजूद भाजपा नेतृत्व ने विपक्ष के नेता पद पर फडणवीस को ही बैठाया। अर्थात यह उनका अंदरूनी मामला होने के कारण हम इस पर ज्यादा बोलेंगे नहीं। परंतु विश्वासमत प्रस्ताव के मौके पर नए विपक्षी नेता ने जो ‘ड्रामा’ किया वो कुछ ठीक नहीं था। ‘मैं नियम और कानून से चलनेवाला इंसान हूं’ ऐसी हास्यास्पद बातें उन्होंने कहीं। लेकिन उन्होंने विश्वासमत प्रस्ताव के दौरान जो सवाल खड़े किए वे किन नियमों पर आधारित थे? छत्रपति शिवराय के नाम पर मंत्रियों ने शपथ विधि में शपथ ली इस पर फडणवीस तमतमा गए। शिवराय का स्मरण गैरकानूनी ठहरानेवाले नियमों की बात करते हैं तथा 105 सीटें इस पर पीटी जाती हैं। बहुमत न होने के बाद भी महाराष्ट्र को अंधेरे में रखकर अवैध ढंग से शपथ लेनेवाले मुख्यमंत्री तथा विधानसभा का सामना किए बिना 80 घंटों में चले जानेवाले मुख्यमंत्री ऐसा आपका इतिहास में नाम दर्ज हो चुका है, इसे याद रखो। ये कलंक मिटाना होगा तो विपक्ष के नेता के रूप में वैध काम करें या कम-से-कम पार्टी में खडसे मास्टर से प्रशिक्षण लें। बहुजन समाज का चेहरा खो गया है तथा जनता उससे दूर चली गई है।

आज विपक्ष की हैसियत से जो संख्या उनके इर्द-गिर्द दिख रही है उसे बचाए रखना इसके आगे मुश्किल होगा, ऐसा माहौल है। विधानसभा अध्यक्ष पद का चुनाव गुप्त मतदान पद्धति से संपन्न कराया गया होता तो हम जो कहते हैं उस पर मोहर लग गई होती। १७० का बहुमत साधारण नहीं है और कल यह संख्या १८५ तक पहुंच गई तो हैरानी नहीं होनी चाहिए। महाराष्ट्र के राजनैतिक पटल पर जो हुआ है तथा होता देख रहे हैं यह पूरा मामला मतलब भाजपा का ‘कर्मफल’ है। महाराष्ट्र पर जोर-जबरदस्ती का अघोरी प्रयोग सफल नहीं हुआ। दिल्ली के उच्चाटन व मारण मंत्र का प्रभाव नहीं पड़ा। सत्ता में रहते हुए ‘बोल-बचनगीरी’ लोगों ने सह ली। अब ‘बाप दिखाओ अन्यथा श्राद्ध करो’ ऐसा भाजपा द्वारा पाले गए मीडियावाले ही शोर मचा रहे हैं। विधानसभा अध्यक्ष पद पर नाना पटोले की नियुक्ति तो सबसे बड़ा तमाचा है।

प्रधानमंत्री मोदी के विरोध में बगावत करके सांसद के पद से इस्तीफा देनेवाले पहले भाजपाई क्रांतिवीर के रूप में नाना पटोले का नाम दर्ज है। विधानसभा में भी वे जीत गए और अब विधानसभा के अध्यक्ष बन गए। मोदी किसी को बोलने नहीं देते, ऐसा पटोले का कहना था। अब विधानसभा में फडणवीस को बोलना है या नहीं यह नाना पटोले तय करेंगे। विपक्ष के नेता खुद अपनी पद व प्रतिष्ठा बचाए रखेंगे तो सब ठीक होगा।

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