बाबा रामदेव के साथ एक बड़ी समस्या यह हुई है कि उन्होंने अपना स्तर बरकरार नहीं रखा। योग और आयुर्वेद की बात करते-करते जीन्स और ब्रा भी बेचने लगे। अपने उत्पादों की गुणवत्ता का ध्यान भी नहीं रखा। ऊपर से थोड़े बड़बोले और हल्के भी हैं। पब्लिसिटी की भूख उनमें इतनी है कि सुना कि एक दौर में वे मेरी नज़र में टीवी इतिहास के सबसे घटिया और बीमार मानसिकता के लोगों द्वारा पसंद किये जाने वाले कार्यक्रम “बिग बॉस” में भी शामिल होने के लिए तैयार थे। टीवी चैनलों ने अपनी टीआरपी के लिए यदि उन्हें राखी सावंत से भी उलझा दिया, तो वे हंसी-ठट्ठा करने में बेधड़क उलझ गए।

रामदेव के व्यापार में शुरुआती धन कहाँ से आया, यह भी एक विषय है, जिसपर कुछ लोग कई तरह की बातें करते हैं, जिसकी पुष्टि के लिए अधिक प्रमाण की आवश्यकता है। इसलिए इस पर मैं कुछ नहीं कहूंगा। सार्वजनिक जीवन में रामदेव को हमने काला धन और बड़े नोटों का विरोध करते हुए ही देखा-सुना है।

बाकी, यह न रामदेव ने कहा, न रामदेव के किसी समर्थक या प्रसंशक ने आज तक कहा कि योग और आयुर्वेद उन्हीं से शुरू हुए और उन्हीं पर ख़तम हो जाएंगे। बाबा रामदेव ने अपनी संस्था और ब्रांड का नाम भी यदि महर्षि पतंजलि के नाम पर रखा है, तो स्पष्ट है कि खुद वे भी योग और आयुर्वेद को हज़ारों साल की ऋषि-परंपरा की निरंतरता में ही देखते हैं।

कुछ लोगों की रामदेव से नफ़रत के और भी कारण हैं। जैसे कि उन्होंने सोनिया-राहुल-मनमोहन वाली यूपीए सरकार के खिलाफ और मोदी-भाजपा-आरएसएस के पक्ष में जनमत तैयार करने में बड़ी भूमिका निभाई। इस कारण जितने भी मोदी-भाजपा-आरएसएस विरोधी हैं, वे चुपके से रामदेव की कोरोनिल भले फांक लें, लेकिन सार्वजनिक रूप से उनके प्रति नफ़रत का इज़हार करने से नहीं चूकते।

मैं किसी से नफ़रत नहीं करता, इसलिए गुण-दोषों पर बात करता हूँ। इसलिए यह कहने में मुझे कोई हिचक नहीं कि हाल के वर्षों में योग और आयुर्वेद को दुनिया भर में जो व्यापक स्वीकृति मिली है, उसमें रामदेव का बड़ा योगदान है। वरना योग और आयुर्वेद को हिंदुत्व के प्रतीक मानकर बीच में तो दबा ही दिया गया था। आयुर्वेद किचन के मसालों, कुछ पुराने वैद्यों और कुछ छोटी-मंझोली कंपनियों, जिनकी बाज़ार में हिस्सेदारी नाम मात्र की थी, तक सिमट गया था, जबकि योग की चर्चा मात्र से ही हिंदू मुस्लिम डिबेट शुरू हो जाती थी, संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा विश्व योग दिवस मनाने को स्वीकृति दिया जाना तो दूर की कौड़ी था।

इसलिए सबसे यह कहना चाहूंगा कि रामदेव से राइवलरी में यह असली सवाल मत भूल जाइए कि मेडिकल पेशे का धर्म क्या है और आज इसका कितना पालन हो रहा है? एलोपैथी साइंस के महत्व को दरकिनार न किया जाए और कोरोना-योद्धा डॉक्टरों का मनोबल न टूटने पाए, इसका ख्याल हमें ज़रूर रखना चाहिए, लेकिन इंडियन मेडिकल एसोसिएशन की दादागीरी के साथ कैसे खड़ा हुआ जा सकता है– यह मुझे समझ में नहीं आता।

एलोपैथी साइंस के महत्व को कौन खारिज करता है? जब हम लोग डॉक्टरों को धरती का भगवान कहते हैं, तो यह सम्मान तो ज़्यादातर एलोपैथी डॉक्टर ही ले जाते हैं। पर कई प्राइवेट अस्पतालों में जो पैसे की लूट, मोटा माल बनाने के लिए इलाज के नाम पर हत्याएं, दवाओं की दलाली, मानव-अंग व्यापार, अनर्गल बिलों के लिए लाशों को बंधक बनाने इत्यादि का खेल चल रहा है, उसके लिए  अगर आईएमए जैसी संस्थाओं को शर्म नहीं आती, तो वह हमारे समर्थन और सहानुभूति का हकदार कैसे हो सकता है?

अभी कोविड काल में भी माफिया संचालित कई अस्पतालों ने आपदा को अवसर समझते हुए अमानवीय होने की पराकाष्ठा को पार कर दिया। ये लोग स्वस्थ हो सकने वाले मरीजों को मारने का बिल दस-दस, बीस-बीस लाख रुपये बना रहे हैं। क्या इन्होंने मरते हुए लोगों के साथ दवाओं और ऑक्सीजन की कालाबाज़ारी नहीं की है? क्या इन्होंने ऑक्सीजन का कृत्रिम अभाव दिखाकर मरीजों के परिजनों को ब्लैक में ऑक्सीजन खरीदने के लिए मजबूर नहीं किया है? क्या बेशर्म आईएमए ने एक बार भी इन नरपिशाचों के खिलाफ कुछ कहा है? या भारत सरकार या राज्य सरकारों पर उनके खिलाफ कार्रवाई करने का दबाव बनाया है?

चाहे रामदेव का कोरोनिल किट कोरोना का इलाज हो या न हो (इलाज तो अभी एलोपैथी की कोई दवा भी नहीं है), पर कम से कम रामदेव ने इसे ब्लैक तो नहीं किया!  कम से कम रामदेव ने इसे ब्लैक में बेच रहे अमेज़न, फ्लिपकार्ट जैसी ऑनलाइन कंपनियों और अन्य कालाबाज़ारियों के खिलाफ आवाज़ तो उठाई! कम से कम रामदेव ने अनर्गल बिलों के लिए आज तक किसी मानव लाश को बंधक तो नहीं बनाया! इसलिए रामदेव की कई बातों से असहमत होने के बावजूद मैं लगभग एक मेडिकल माफिया गिरोह में तब्दील हो चुके आईएमए और मानव-लाशों के सौदागर अस्पतालों के साथ तो खड़ा नहीं हो सकता!

बाकी, हर चिकित्सा विधा की अपनी-अपनी शक्ति और सीमा है। एलोपैथी अगर हार्ट अटैक आ जाने के बाद आपको बचा सकती है, तो इसके ज्ञान का दुरुपयोग करते हुए कई जल्लाद हार्ट पर बिना खतरे के ही आपको डराकर उसमें स्टेंट भी घुसा सकते हैं। आयुर्वेद अगर मरने के स्टेज में आपको बचा नहीं सकता है, तो उससे पहले की कई छोटी और मध्यम बीमारियों में एलोपैथी की तुलना में आपको सस्ता, सुलभ, टिकाऊ इलाज तो दे ही सकता है।

मैं तो खुद भुक्तभोगी हूँ। मेरी छाती और पेट के संधिस्थल पर बीच में दर्द होता था, लेकिन PSRI और Apollo अस्पताल हज़ारों रुपये डकारने, महीनों इलाज करने और मुझे बेहोश करके मेरी इंडोस्कोपी, कोलोनोस्कोपी आदि जांच कराने के बावजूद उसे ठीक नहीं कर पाए। महज 30 साल की उम्र में मैं हताश हो गया कि जब देश के बड़े-बड़े अस्पताल मुझे ठीक नहीं कर पा रहे तो इसका मतलब है कि मुझे कोई गंभीर बीमारी हो गई है। इसके बाद वैद्य वृहस्पति देव त्रिगुणा के पास गया। आज के किसी सेकुलर बुद्धिजीवी के चक्कर में पड़ गया होता तो उनके पास भी न जाता, क्योंकि वे निज़ामुद्दीन के त्रिगुणेश्वर महादेव मंदिर में बैठकर इलाज करते थे, जहां केवल हिंदू ही नहीं, मुसलमान और सिख भी उनसे इलाज कराने आते थे। खैर, महज 15 सेकेंड नाड़ी देखी उन्होंने, मुझे तो सिर उठाकर देखा ही नहीं। मैंने जो 30 सेकेंड में कहा वह भी सुना कि नहीं, यह वही जानते होंगे। महज एक मिनट में मुझे चलता कर दिया, 125 रुपये की एक सप्ताह की दवाई लिखकर। उनसे मिलकर मैं और ज़्यादा फ्रस्ट्रेटेड हो गया कि ऐसे भी भला इलाज होता है क्या? न मरीज को देखा, न सुना, बस कोड वर्ड में कुछ लिख दिया और एक मिनट के अंदर चलता कर दिया। लेकिन मेरे पास विकल्प ही क्या था? सो दवा ली, और ली तो एक ही सप्ताह में ठीक भी हो गया। वो दिन है और आज का दिन है। मेरे लिए तो वैद्य वृहस्पति देव त्रिगुणा ही धरती के भगवान थे।

आज भी मुझे PSRI के उस लुटेरे डॉक्टर (नाम नहीं लूंगा, किसी को बदनाम क्या करना, भगवान उनका भला करें) का दिया हुआ निरर्थक ज्ञान याद आता है– “पॉजिटिव रहो तो अपने आप ठीक महसूस करने लगोगे।” इसपर मैंने कहा था– “डॉक्टर साहब, मुझे थोड़ा सा ठीक कर दीजिए, तो मैं अपने आप पॉजिटिव महसूस करने लगूंगा।”

जब मैं उन लुटेरे डॉक्टर के पास गया था, तो पॉजिटिव ही था, लेकिन मुझे नेगेटिव बनाया था उनके घटिया इलाज ने। जब मैं पद्म विभूषण वृहस्पति देव त्रिगुणा जी के पास गया तो मैं नेगेटिव था, लेकिन उनके सस्ते और कारगर इलाज ने बिना पॉजिटिविटी की मांग किए ही मुझे पॉजिटिव बना दिया। अब वे नहीं हैं, फिर भी उनके बेटे देवेंद्र त्रिगुणा जी के यहां अक्सर आता-जाता रहता हूँ।

एक वाकया मेरी माताजी के साथ हुआ। मामूली बुखार में मूलचंद अस्पताल ने आइसीयू में भर्ती कर लिया और तरह-तरह की जांच और दवाइयों के सहारे 10 दिन तक बुखार उतरने ही नहीं दिया। उस वक़्त एनडीटीवी में नौकरी करता था, इसलिए समस्या यह भी खड़ी हो गई कि कब तक ऑफिस से छुट्टी लेकर अस्पताल में माताजी की देख-रेख करूँ? ऑफिस से काम पर लौटने का दबाव बढ़ता जा रहा था। आखिरकार बेगूसराय से भैया को दिल्ली बुलवाना पड़ा। फ्रस्ट्रेशन अलग था कि इतने ख़र्च के बावजूद माताजी ठीक क्यों नहीं हो रहीं? माताजी ने भी कहा कि– “बेटा, अब इस अस्पताल से मुझे ले चलो, वरना ये लोग मुझे मार डालेंगे। मेरा बुखार इनकी दवाइयों के कारण नहीं उतर रहा।” फिर मैंने डॉक्टर से सारी दवा बंद करने के लिए कहा। उन माफिया लोगों ने पहले आनाकानी की, लेकिन शायद मेरे मीडियाकर्मी होने के कारण दवा बंद कर दी। 24 घंटे के अंदर माताजी का बुखार उतर गया और अगले दिन उन्हें अस्पताल से डिस्चार्ज करा लिया।

एक वाकया मेरे पिताजी के साथ भी हो ही गया। दिल्ली आए तो मैंने कहा कि आप 60 साल से ज़्यादा के हो गए हैं, अब एक बार कंप्लीट हेल्थ चेकअप करा लीजिए। पता किया और अपोलो अस्पताल में चेकअप के लिए चले गए। अब वहां दूसरा ही खेल शुरू हो गया। पिताजी से कहा– “आपको पहले हार्ट अटैक आ चुका है।” पिताजी ने कहा– “नहीं, ऐसा तो है नहीं।” अपोलो ने कहा– “आपको पता नहीं चला होगा, साइलेंट हार्ट अटैक आ गया होगा। आपकी एंजियोग्राफी करनी पड़ेगी। स्टेंट लगवा लीजिए, तो सेफ हो जाएंगे।” सोचिए, ये जल्लाद लुटेरे राक्षस पापी नरपिशाच एक अच्छे-भले स्वस्थ आदमी का हार्ट अटैक करा दें। डॉक्टर के चैंबर में जो लोग थे, वे डॉक्टर कम, बाउंसर ज़्यादा लग रहे थे। मुझे खेल समझ में आ गया, इसलिए काउंटर पर आकर शिकायत की। उन लोगों को लगा कि मामला बिगड़ सकता है, तो मुझसे उस डॉक्टर की पर्ची देखने के बहाने वापस ले ली और उसे फाड़ दिया, कहा– “दूसरे डॉक्टर से आपको दिखवा देते हैं।” मैंने कहा– “इतनी मेहरबानी के लिए आपका धन्यवाद। अब आप लूटने और मारने के लिए कोई दूसरा मरीज ढूंढ़िए।”

अब आप खुद सोच लीजिए कि इन बड़े अस्पतालों में क्या-क्या हो रहा है! लेकिन इन पापियों के खिलाफ तो आईएमए कभी नहीं बोलता। भारत का कोई मंत्री भी तो कभी सार्वजनिक रूप से इन पापियों को चिट्ठी नहीं लिखता कि माफी मांगो, पैसे वापस करो, या मरीजों को मारने का कारोबार करोगे, तो तुम भी बच नहीं पाओगे। क्या किसी मंत्री, किसी सरकार में है इतनी हिम्मत कि इन  माफिया अस्पतालों के खिलाफ कार्रवाई कर सकें या उनका लाइसेंस रद्द कर सकें?

इसलिए, फिर से कह रहा हूँ कि बात एलोपैथी या आयुर्वेद की है ही नहीं। बात डॉक्टरों को हतोत्साहित करने की भी नहीं है। बात है मेडिकल पेशे के धर्म की, जो माफिया संचालित अनेक अस्पतालों में सिरे से नदारद है। अगर देश की सरकारें इसे नहीं स्वीकार करना चाहतीं, तो न करें, क्योंकि वे सरकारें हैं, उन्हें तो हम जबरन अपनी बात मनवा नहीं सकते, लेकिन वे भी इस पब्लिक परसेप्शन का क्या कर लेंगी कि माफिया संचालित अनेक अस्पतालों में भगवान नहीं, राक्षस रहते हैं और कोरोना काल में भी बिना ठीक से इलाज किये महज लंबा-चौड़ा बिल बनाने और पैसा लूटने के लिए उन्होंने अनगिनत मरीजों को मार डाला है?

इसलिए इस देश में किसी को अगर मेडिकल पेशे की इज़्ज़त की चिंता है, तो सॉफ्ट टार्गेट व्यक्तियों को घेरकर राजनीति करना बंद कीजिए, बल्कि आम अवाम को मेडिकल माफिया के चंगुल से बचाइए।

अगर किसी दिन इस देश में मेरी सरकार बन जाती तो मैं स्वास्थ्य सुविधा को पूरी तरह मुफ्त कर देता और देश में केवल दो तरह के अस्पताल होते– एक सरकारी अस्पताल और दूसरे चैरिटेबल ट्रस्टों द्वारा चलाए जाने वाले अस्पताल। इनमें किसी भी इलाज के लिए किसी से भी पैसे लेने का अधिकार किसी को नहीं होता। इसके अलावा, एक ऐसा मेडिकल विजिलेंस नेटवर्क मैं गाँव-गाँव तक बनाता, जो नियमित रूप से घर-घर जाकर आपकी स्वास्थ्य जांच करता, हेल्थ और लाइफ स्टाइल सही रखने के लिए गाइडेन्स देता और सही डाइटरी सलाह देता, ताकि आप बीमार ही न पड़ें या पड़ें भी तो शुरू में ही आपका इलाज हो जाए।

लेकिन राजनीति जब माफिया की बंधक बन जाए तो क्या कहा जाए? शिक्षा और स्वास्थ्य– दोनों सबसे महत्वपूर्ण सेक्टरों का माफिया के हाथ चला जाना आज इस देश का सबसे बड़ा अभिशाप बन गया है!