लाकडाउन में कच्चा महुआ खाकर बसर कर रही जीवन का अंतिम पड़ाव

लाकडाउन में कच्चा महुआ खाकर बसर कर रही जीवन का अंतिम पड़ाव

कौशांबी :- जीवन के अंतिम पड़ाव में अकेली जिंदगी काट रही 70 वर्षीय बेसहारा वृद्धा सूरजकली भूमिहीन है। उसको किसी प्रकार की सरकारी सहायता नही मिल रही है, यहां तक उसके घर मे खाना बनाने के लिए चूल्हा तक नही है। उम्र के इस पड़ाव में दूसरे के खेतो से बेसहारा मवेशियों हाक कर फसल

कौशांबी :- जीवन के अंतिम पड़ाव में अकेली जिंदगी काट रही 70 वर्षीय बेसहारा वृद्धा सूरजकली भूमिहीन है। उसको किसी प्रकार की सरकारी सहायता नही मिल रही है, यहां तक उसके घर मे खाना बनाने के लिए चूल्हा तक नही है। उम्र के इस पड़ाव में दूसरे के खेतो से बेसहारा मवेशियों हाक कर फसल रखवाली करने पर दो जून की रोटी दे देता है तो ठीक है, अन्यथा कच्चा महुआ खाने के बाद पानी पीकर रह जाती है।
विकास खंड नेवादा के जलालपुर जवाहरगंज की रहने वाली बेसहारा वृद्धा सूरजकली के परिवार में कोई नही है। उसके पति बाबूलाल की करीब 25 वर्ष पहले ही मौत हो चुकी है। चार बेटों और एक बेटी में दो बेटों जुग्गु और कल्लू की बीमारी के चलते 20 वर्ष पहले मृत्यु हो चुकी है। करीब पांच साल पहले तीसरे नंबर का बेटा मल्हू मौर्या चित्रकूट के मऊ बहन के गांव गया तो वहीं का रह गया। चौथे नंबर का बसंत भी डेढ़ साल पहले बूढ़ी मां को अकेला छोड़ कही बाहर काम करने गया तो दुबारा मुड़कर नही देखा। वृद्ध सूरजकली दूसरों के खेतों में बेसहारा मवेशियों को हाकने पर रोटी मिल गई तो ठीक है, अन्यथा पानी पीकर जीवन गुजर बसर कर रही है। घर मे अन्न न होने से घर मे खाना पकाने का चूल्हा भी नही है। जिस घर मे वह रहती है वह भी दूसरे का है। सूरजकली के पास ओढ़ने बिछाने के साथ साथ अन्य जरूरत के सामानों का भी अभाव है। इधर बीच कोरोना वायरस के संक्रमण के कारण लाकडाउन के चलते वृद्धा को कोई काम नही मिल रहा। किसानों की फसल भी कट चुकी है, घर मे अन्न का एक दाना न होने से दो जून की रोटी के लाले पड़ गए है, अब तो वह दूसरों के रहमोकरम पर जीवन जी रही है। किसी ने खाना दे दिया तो ठीक है अन्यथा कच्चा महुआ खाने के बाद पानी पीकर जीवन का अंतिम पड़ाव जी रही है।

कभी नही मिली सरकारी सहायता

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शासन से गरीबो के लिए कई योजनाएं चल रही है, हैरत की बात यह है कि सूराजकली को कभी सरकारी सहायता नही मिली। उसके पास राशन कार्ड तक नही है और न ही उसे वृद्धा पेंशन मिलता है और तो और उसके पास आधार कार्ड तक नही है। यही कारण है कि उसे कोई सरकारी सहायता नही मिल रही है। बेसहारा वृद्ब महिला को यदि कोई पड़ोसी अथवा ग्रामीण उसपर रहम कर उसको खाना दे देता है, तो ठीक है अन्यथा यूं ही पानी पीकर रह जाती है।

लॉक डाउन में वृद्ध दंपति भी तरस रहा दो जून की रोटी के लिए

  गांव के अनुसूचित बस्ती के तंग गली में रहने वाले 80 वर्षीय दक्खिनी और उसकी पत्नी रामकली की कहानी भी सूराजकली से इतर नही है। इनके पास राशन कार्ड तो है, लेकिन महीने भर से लाकडाउन के चलते घर मे सूखे राशन के अलावा कुछ भी नही है। 12 दिन पहले तपेदिक की बीमारी का प्रयागराज के तेजबहादुर सप्रू अस्पताल से इलाज करवा कर गांव पहुंचे बेटे मुन्ना ने प्राथमिक विद्यालय में अपने आपको क्वारंटीन कर लिया है। रामकली कोटे के मील राशन और जरूरत की चीजें पड़ोसियों की मांग रूखा सूखा खाना बना देती है, जिसे दक्खिनी और उसका स्कूल में क्वारंटाइन बेटा मुन्ना खाकर जीवन का गुजर बसर कर रहे है।

इनका कहना है

आधार कार्ड की उपलब्धता न होने से सूरजकली को सरकारी योजनाओं का लाभ नही मिल पा रहा है। फिलहाल कोटेदार को राशन देने का निर्देश दे दिया गया है। आधार कार्ड बनने के बाद पात्रता के आधार पर इनको सभी योजनाओं का लाभ दिया जाएगा।

रिपोर्ट श्रीकान्त यादव

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