मुखिया जी जरा इधर भी ध्यान दीजिए आपके राज में पीड़ित की FIR नही लिखी जा रही

मुखिया जी जरा इधर भी ध्यान दीजिए आपके राज में पीड़ित की FIR नही लिखी जा रही

इटावा :- कृपया अब आप ही मात्र 8 दिन की नन्ही अनामिका और उसकी मृतक माँ प्रियंका को न्याय दीजिये। #जरा पढिये अपने सूबे के एक आम आदमी की व्यथा *शहर में देवदूत बने यमदूत,गर्भवती महिला की अस्पताल में इलाज में लापरवाही के दौरान हुई मौत**प्रशिक्षित सर्जन डॉक्टर की जगह एक एएनएम ने ही कर

इटावा :- कृपया अब आप ही मात्र 8 दिन की नन्ही अनामिका और उसकी मृतक माँ प्रियंका को न्याय दीजिये।

#जरा पढिये अपने सूबे के एक आम आदमी की व्यथा

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*शहर में देवदूत बने यमदूत,गर्भवती महिला की अस्पताल में इलाज में लापरवाही के दौरान हुई मौत*
*प्रशिक्षित सर्जन डॉक्टर की जगह एक एएनएम ने ही कर दिया ऑपरेशन*

*शहर के एक निजी अस्पताल ने  ले ली गर्भवती महिला प्रियंका की जान, पति रिपोर्ट दर्ज कराने के लिये पिछले एक सप्ताह से काट रहा सम्बंधित थाने व अधिकारियों के चक्कर,अब तमाशा देखिये साहब उल्टे उस व्यक्ति को कार्यवाही के नाम पर मिली यह बेतुकी नसीहत, कहा गया कि, गये ही क्यों थे तुम उस अस्पताल में इलाज कराने?*

मामला है शहर के वाह अड्डा क्षेत्र स्थित एक निजी अस्पताल का जहाँ भर्थना क्षेत्र में नियुक्त एक एएनएम महिला डॉक्टर बनकर गर्भवती महिलाओं को अपने निजी अस्पताल में भर्ती कर मोटी रकम लेकर उनका इलाज करने के बाद मामला बिगड़ने पर बिना रिफर लेटर के ही एम्बुलेंस बुलाकर सैफई रिफर कर देती है ।
आखिर यह कैसा अस्पताल चल रहा है जनपद इटावा के शहर में ? जिसमे शायद अस्पताल की पोल खुलने के डर से मरीज को कोई रिफर लेटर नही दिया जाता है । जिसमे पीड़ित को जन्म या मृत्यु प्रमाण का कोई कागज नही दिया जा रहा है। पीड़ित से ऑपरेशन के नाम पर 65000 ₹ जमा कराये गये व ऑपरेशन के समय खून की कमी के नाम पर 24000 ₹ 4 यूनिट का मूल्य जमा कराया गया।
जिसके बाद भी मृतका प्रियंका की जान नही बचाई जा सकी ।
*पीड़ित सुवेन्द्र कुमार ने अपनी शिकायत को लेकर जिलाधिकारी महोदय के नाम एक प्रार्थना पत्र लिखा है अब देखना यह है कि प्रार्थना पत्र के बाद इस मामले पर क्या कार्यवाही होती है ।*
अब आप जरा सोचिए माँ की मौत के बाद उस पैदा हुई बच्ची पर क्या गुजर रही होगी जिस नवजात के सर से किसी और की गलती से माँ का साया उसके पैदा होते ही हमेशा के लिये उठ गया हो। उस अबोध बेटी से माँ का आँचल ही छिन गया जिसकी 6 महीने तक उसे बेहद ही जरूरत थी।
जरा उस अभागे पिता से पूछिये जिसकी बेटी को पाल पोस कर बड़ा करने के बाद किन्ही यमदूतों द्वारा उसे गर्भवती होने की सजा दी गई हो ।और उसकी प्यारी लाड़ प्यार से पाली हुई रो रो कर अपने घर के दरवाजे से विदा की हुई बेटी को किसी की लापरवाही ने इस दुनियाँ से हमेशा के लिये विदा कर दिया हो । जरा उस पति से भी पूछिये जिसका बसा बसाया घर किन्ही यमदूतों की वजह से उजड़ गया हो। उस नवजात बच्ची से पूछिये जो अब अपनी माँ को अब दोबारा इस दुनियां में कभी नही देख पायेगी । अब कभी न लौटकर आने वाली उस स्व0 मां से पूछिये जो नौ महीने दुख सहकर दर्द सहकर अपनी कोख में दिन रात रखकर उसे बड़ा करने वाली उसके जन्म को लेकर कई सपने बुनने वाली दुर्भाग्य से यमदूतों की भेंट चढ़ गई हो । वह अभागी माँ अपनी कोख से निकली बच्ची को देख भी न पाई न जी भर के उसे प्यार कर पाई । और तो और जब इस लॉक डाउन में  हर मध्यम वर्गीय परिवार की मोटी रकम जाने से कमर ही टूट गई हो तब ऐसे में अनाप शनाप पैसे वसूल कर हालत बिगड़ने पर उसकी पत्नी को कहीं और ले जाने के लिये कह देना किसी भी अस्पताल वालो को कितना आसान सा लगता होगा । और जब उसकी पत्नी बीच रास्ते मे ही मर जाती है तब जरा सोचिये उस व्यक्ति पर क्या गुजरती होगी जब एक तरफ उसकी छोटी सी नवजात बच्ची गोद मे हो जेब मे पैसे न हो और लॉक डाउन में पत्नी की लाश सामने पड़ी हो ।अरे जनाब किसी के भी होश उड़ाने और दिन में तारे दिखाने के लिये यह दृश्य ही काफी है। अब जरा एक और तमाशा देखिये की ऐसा हालात का मारा व्यक्ति जब शिकायत का अपना प्रार्थना पत्र लेकर बड़े पुलिस अधिकारियों के पास जाता है तो उसकी शिकायत पर कोई कार्यवाही नही होती बल्कि उसे उल्टे ही मुफ्त में एक नसीहत दे दी जाती है कि तुम  गये ही क्यों थे उस अस्पताल में ? अब यह बात उस दुखी व्यक्ति का सीना छलनी करने के लिये काफी है । बड़ा सवाल यह है कि, क्या योगी राज मे आम आदमी की कोई सुनवाई नही होगी ।या फिर मृतक महिला प्रियंका यादव के प्रति इटावा की मित्र पुलिस की सभी मानवीय संवेदनाएं शून्य हो गई है ।
में पूछना चाहता हूँ ऐसे बेतुके सामाजिक सिस्टम से कि,क्या उस महिला को न्याय नही मिलना चाहिये ?
में पूछना चाहता हूं उन जिम्मेदार पुलिस अधिकारियों से भी जिन्होंने पीड़ित से रिपोर्ट दर्ज न करने की जगह नसीहत देकर यह कहा कि आप गये ही क्यों थे वहॉं इलाज कराने ? क्या यही आपका न्याय पूर्ण सिस्टम है ? क्या पीड़ित व्यक्ति को अपनी रिपोर्ट लिखवाने के लिये अब लखनऊ पुलिस मुख्यालय जाना पड़ेगा ?
में पूछना चाहता हूँ उस मेडिकल सिस्टम से भी जिसने एक एएनएम को शहर में डॉक्टर बनकर किसी की की भी जिंदगी से खेलने का खुला लायसेंस दे रखा है । माननीय मुख्यमन्त्री जी यह एक गम्भीर जाँच का विषय है? शहर के आस पास ऐसे कई अस्पताल जगह जगह बरसाती कुकुरमुत्तों की तरह उग आये है कृपया इनके द्वारा मोटी रकम बसूल कर आम आदमी को दी जा रही सुविधाओ, साफ सफाई व कार्यरत प्रशिक्षित स्टाफ की डिग्री की भी कड़ी जांच की जाये की वे किसी का भी ऑपरेशन करने लायक है भी या नही या जनपद में ऐसा काला धंधा बदस्तूर जारी है। इसकी पहल इसलिये भी हो ताकि कोई और प्रियंका ऐसे दर्द से कराहते हुये या आंखों में आंसू भरे सिसकते हुये किसी एम्बुलेंस में बीच रास्ते मे फिर कहीं दम न तोड़ दे।
महोदय 10 मई की वो सुबह मौत से बेखबर भोली भाली प्रियंका की आखिरी सुबह थी । उस काली सुबह एम्बुलेंस में बीच रास्ते मे अपनी नवजात बच्ची के सामने पति की गोद मे दम तोड़ती एक महिला  नही मरी बल्कि, एक बच्ची की प्यारी माँ मरी थी ,एक पिता की बेटी मरी थी एक पति की पत्नी मरी थी किसी भाई की बहन मरी थी ।
अब बड़ा सवाल यह है कि, मां के मरने के बाद कौन पालेगा उस नवजात छोटी सी 8 दिन की नन्ही परी अनामिका को कौन उसे लोरी सुनायेगा? अब किसके साथ वह अपना मदर्स डे मनायेगी।
किसी बेकसूर इंसान का पैसा भी गया पत्नी भी गई और अब सम्बंधित थाना में उसकी रिपोर्ट भी नही लिखी जा रही ,कहीं ये किसी जंगल राज की आहट तो नही है।
माननीय शायद यह सब पढ़कर या सोच कर शायद मेरी तरह आपके भी रोंगटे खड़े हो गये होंगे ।

रिपोर्ट शिवम दुबे

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