नौनिहालों के निवालों पर डाका

नौनिहालों के निवालों पर डाका

खेतासराय(जौनपुर):- केंद्र सरकार द्वारा विश्व बैंक के सहयोग से संचालित योजना आईसीडीएस के तहत 07 माह से 3 वर्ष तक के नौनिहालों व गर्भवती महिलाओं तथा निराश्रित महिलाओं के बीच बाल पुष्टाहार वितरित किया जाता है। विकास खण्ड शाहगंज सोंधी के सबरहद गांव में उक्त योजना के तहत बच्चों व गर्भवती महिलाओं के बीच वितरित

खेतासराय(जौनपुर):- केंद्र सरकार द्वारा विश्व बैंक के सहयोग से संचालित योजना आईसीडीएस के तहत 07 माह से 3 वर्ष तक के नौनिहालों व गर्भवती महिलाओं तथा निराश्रित महिलाओं के बीच बाल पुष्टाहार वितरित किया जाता है। विकास खण्ड शाहगंज सोंधी के सबरहद गांव में उक्त योजना के तहत बच्चों व गर्भवती महिलाओं के बीच वितरित होने वाला बाल पुष्टाहार वितरण होने के बजाय कालाबाज़ारी हो रही है।

बाल पुष्टाहार -पशुहार बन कर रह गया है। इस खेल में कार्यकत्री, सहायका व सुपरवाइजर भी शामिल है इनकी मिली भगत से बाल पुष्टाहार की खरीद फरोख्त के काम को धड़ल्ले से अंजाम दिया जा रहा है। आँगनवाड़ी सेन्टर का तो पूरे गांव में कहीं अता पता नही है मात्र कागजों पर ही चल रहा है। लेकिन बाल पुष्टाहार के रेट फिक्स हैं।पशुपालकों को 300 रुपया प्रति बोरी  बेच कर सभी कार्यकत्रियों और सहायका में बंदर बाँट होता है यही खेल हर महीना चलता है।

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आंगनवाड़ी केन्द्रों पर हाड़कुक्ड का भी है प्राविधान

हाड़कुक्ड भी इस योजना में शामिल है। जो नौनिहालों को केंद्रों पर सुबह में देना पड़ता है जिसमे पाठशाला में रजिस्टर्ड नौनिहालों को गरम भोजन दूध फल आदि दिया जाता है। उसके लिए अलग से प्रति छात्रों का पैसा सरकार द्वारा भुगतान होता है लेकिन रजिस्टर्ड छात्रों के नाम का तो विभाग से हाड़कुक्ड के नाम पर भुगतान तो हो जाता है।जबकि केंद्र मात्र कागजों पर ही संचालित है तो भुगतान प्रतिमाह कहाँ जाता है। सच्चाई से कोसो दूर है। कहीं छात्रों का पता नही होता है और न ही इसकी जानकारी ग्रामीणों को है।

खास बात यह है कि इस तरह का कुकर्म व्यक्ति विशेष की सह पर हो रहा है और इस तरह के भ्रष्टाचार को बल मिल रहा है। जिससे उक्त गांव मे नौनिहालों व गर्भवती महिलाओं के हित में सरकार द्वारा चलाई जा रही  योजनायें मात्र कागजों में ही दम तोड़ रही है। जिससे सरकार की मंशा पर सांठ-गांठ से पानी फेरा जा रहा है। बाल पुष्टाहार को गांव के पशुपालकों सहित दूधिया वालों को बेचा जा रहा है। जिससे मावेशियों के पेट का आहार बन रहा है। बिडम्बना यह है कि बच्चों की शिक्षा व उनके स्वास्थ्य से सीधे जुड़ी। इस योजना का क्रियान्वयन में पारदर्शिता लाने के लिए किसी भी स्तर पर कोई पहल नही की जाती है। यह करना तो दूर की बात है इस पर सोचना मुनासिब नहीं समझते है बल्कि योजनाओं में पलीता लगाने का केन्द्र संचालक काम कर रहे है।

एक नज़र सबरहद के आगनबाड़ी केंद्रों पर

सोंधी शाहगंज विकास खण्ड के सबरहद गांव में कुल 11 आगनबाड़ी केंद्र है। जहां 9 सहायका,10 कार्यकत्री एक मिनी कार्यकत्री है। एक कार्यकर्त्री पर एक सहायक होती है। जबकि इस गांव में अभी भी एक सहायका का पद रिक्त है। इसमें नियुक्त को लेकर भी बड़ा खेल होता है। बच्चों और गर्भवती महिलाओं के लिए बाल पुष्टाहार वितरण और देख-रेख के लिए सुपरवाइजर की नियुक्ति होती है। गांव में टीकाकरण के दौरान बूथ पर इनकी ड्यूटी लगती है। लेकिन व्यक्ति विशेष के सह पर किसी बूथ पर ड्यूटी नहीं कि जाती है और न ही पोषक आहार सेन्टर पर वितरित किया जाता है। इन कर्मियों का काम है नौनिहालों की पाठशाला का केंद्र पर संचालित करना लेकिन ये सभी कर्मी मात्र बाल पुष्टाहार बेच कर पैसा जमा करना ही अपने ड्यूटी समझती है।

प्रति बोरी की दर से होती है वसूली

कुपोषण से बचने के लिए नौनिहालों के लिए सरकार द्वारा पोषक आहार मुहैया कराया जा रहा है। लेकिन पशुओँ के लिए ज़्यादा मुफीद साबित हो रहा बाल पोषाहार उक्त गांव में
मावेशियों का आहार बन गया है। इसकी बिक्री धड़ल्ले से किया जा रही है। ग्रामीणों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि जानकारी न होने कारण कार्यकत्री, सहायकाओं द्वारा मिल बांट कर मनमाने तरीके से बेच दिया जाता है। यह ज्यादातर पशुपालकों यानी दूधिया वालों के हाथों लगभग 300 से 350 रुपये की दर से प्रति बोरी बेच दी जाती है। ऐसे में नौनिहालों के निवालों पर डांका डालकर बाल पुष्टाहार विभाग को भी कुपोषित कर दे रहे है? बिक्री के बाद एकत्र हुए पैसों का आपस मे बन्दर बाट होता है। यह कार्य प्रति माह किया जाता है।

जिम्मेदार मुद्दे पर साधे है चुप्पी

बाल पुष्टाहार मासूम बच्चों व गर्भवती, निराश्रित महिलाओं को हर माह मिल रहा है। इन्ही लोगों के बीच वितरण होना है लेकिन बिना किसी लाग लपेट के बराबर कार्यकत्रियों सहित सहायकों द्वारा बेचा जा रहा है। सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा है। लेकिन ज़रा ठहरिए! ये सब महज़ फाइलों के कागजो पर सुशोभित हो रहा है। फाइलों को देख साहब खुश जाते है। लेकिन इसकी जमीनी हकीकत क्या है कभी उन गरीबों से पूछिए जिनके बच्चे कुपोषण का शिकार हो चुके है। या फिर जो गर्भवती महिला है। क्या उसको कुपोषण से बचने के लिए कभी पुष्टाहार मिला।

कुल मिलाकर कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा। इस कालाबाजारी के खिलाफ पूरी जिम्मेदार पूरी तरह से चुप्पी साधकर दुम दबाएं बैठे है। सब कुछ जानकर अनजान बनकर अपने आपको स्पटिक की तरह शुद्ध और शानदार छवि का मिसाल पेश कर रहे है। साथ ही साथ ढोल भी पीटा और काम लिप्त लोगों से पिटवाया जा रहा है। इस कार्य से विकास खण्ड शाहगंज सोंधी के साफ सुथरी छवियों पर एक बदनुमा दाग से कम नहीं है। लेकिन प्रशासन कभी भौतिक सत्यापन न करके चीर निंद्रा में सोने का काम कर रहा है।

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