भारत नेपाल सीमा बन्द, आखिर कब तक ?

भारत नेपाल सीमा बन्द, आखिर कब तक ?

कोरोना संक्रमण के कारण बंद पड़े हुए भारत नेपाल सीमा को खोलने व न खोलने के विषय को लेकर इस समय सीमा के दोनों ओर जनमानस में तीव्र रूप से आपस मे चर्चा व तर्क वितर्क किया जा रहा है । नेपाली क्षेत्र में कुछ नेपाली व्यवसाई अपने व्यक्तिगत लाभ के दृष्टिकोण से सीमा के

कोरोना संक्रमण के कारण बंद पड़े हुए भारत नेपाल सीमा को खोलने व न खोलने के विषय को लेकर इस समय सीमा के दोनों ओर जनमानस में तीव्र रूप से आपस मे  चर्चा व तर्क वितर्क किया जा रहा  है । नेपाली क्षेत्र में कुछ नेपाली व्यवसाई अपने व्यक्तिगत लाभ के दृष्टिकोण से सीमा के निरंतर बंद रहने को ही सही बता रहे हैं वही कुछ लोग भारतीय बाजार में नेपाली उपभोक्ताओं की उपस्थिति देखकर उत्तेजित हो सीमा के बंद रहने की आवाज को बल दे रहे हैं पर वास्तविक और यथार्थ के धरातल की नजर से दीर्घकालीन सोच के साथ देखा जाए तो किसी तरफ से इस मुद्दे में गंभीरता नहीं दिखाई पड़ रही है ।

भारत नेपाल के बीच ये सीमा पूरी तरीके से सील करना दोनों देश के बीच ऐतिहासिक संबंध के हिसाब से भी ज्यादा सामाजिक परिवेश, स्रोत साधन और व्यवहारिक रूप से भी सम्भव नही दिखाई पड़ रहा है ।

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भारत और नेपाल के बीच 1751 किलोमीटर की लंबी खुली सीमा है जिसमें छोटे-बड़े कच्चे-पक्के सब को मिलाकर लगभग 500 से भी ज्यादा मार्ग भारत नेपाल की सीमा में आवागमन को जोड़ते है, जहां से दैनिक हजारों की संख्या में दोनों देश के नागरिकों का आवागमन होता आ रहा है

इस लंबी 1751 किलोमीटर की खुली सीमा में 6 प्रमुख नाका व डेढ़ दर्जन से भी ज्यादा छोटे-छोटे सीमा नाका है जहां से दोनों देशों के बीच आपसी व्यापार होता आया  है दोनों देशों के बीच जुड़े इन सीमा के बड़े रास्तों व छोटे छोटे पगडंडियों ने  व्यवसायिक ही नहीं अपितु सामाजिक, सांस्कृतिक संबंधों को भी उतनी ही गहरी महत्व के साथ एक दूसरे से जोड़ कर रखा है ।

नेपाली क्षेत्र से कुछ ब्यवसायियों द्वारा ब्यक्तिगत लाभ के लिए सीमा को सदा के लिए सील कर देने की चर्चा को हवा देने के बिषय को पहले तो सामर्थ्य और पूर्वाधार के हिसाब से भी देखा जाना चाहिए । भारत नेपाल के बीच सीमा बंद करने के विषय चर्चा को अचानक सुनते ही जितना आकर्षक लगता है अगर सामाजिक परिवेश को देखें तो यह उतना ही व्यवहारिक भी लगता है

विशेषकर तराई मधेश में देखें तो अभी भी सैकड़ों बस्ती ऐसे हैं जहां नेपाल की तरफ से एक घर में प्रवेश करने पर सीधे घर के अंदर से दूसरा छोर भारत की सीमा पर आकर निकालता है इन बस्तियों के बाशिन्दों के लिए नो मैंस लैंड का ब्यवहारिक रूप में कोई अर्थ नही है,  ऐसे सामाजिक परिवेश को देखते हुए नेपाली क्षेत्र से उठ रही भारत नेपाल सीमा पूरी तरीके से बंद कर कर देने की आवाज में कितनी व्यवहारिकता होगी यह अपने आप मे सोंचने का बिषय है।

*अब एक नजर मानवीय पक्ष पर ,,,,,,,*

भारत में कोरोना संक्रमण के बढ़ते हुए क्रम को देखते हुए भारतीय क्षेत्र में काम करने वाले नेपाली कामगारों द्वारा नेपाल प्रवेश करने पर  नेपाली क्षेत्र में भी कोरोना वायरस के प्रवेश करने को लेकर सीमा बंद करने की मांग को तीव्रता से उठते हुए नेपाल में देखा जा रहा है परंतु मानवीय पक्ष से देखा जाए तो क्या यह संभव है ? भारत और नेपाल के बीच व्यवसाय के साथ साथ संस्कृति का भी रिश्ता है जहां दोनों देशों के नागरिक आपस मे रोजगार के लिए तो आते जाते रहते ही है साथ ही नेपाल की बेटी भारत व भारतीय क्षेत्र की बेटी नेपाल में  ब्याही जाती रही है भारत में रोजगार के लिए हर वर्ष हजारों की संख्या में नेपाली नागरिक भारत के तमाम क्षेत्र में जाते रहे हैं जिसका लेखा जोखा ना तो नेपाल सरकार के पास है और ना ही भारत के पास है लेकिन यह संख्या हजारों में ना होकर लाखों में है जिसकी प्रमाणिकता के लिए किसी जांच के इंतजार की अव्यश्यक्ता नही है।

गत वर्ष  भारत से केवल तकरीबन 100 अरब रूपए रेमिटेंस नेपाल को प्राप्त हुआ है जो अपने आप में बहुत कुछ बताता व दर्शाता है, कोविड काल के पहले नेपाल से भारत के नई दिल्ली, मुंबई, चंडीगढ़, लुधियाना, अमृतसर, जयपुर, बेंगलुरु, चेन्नई, गोवा, शिमला, जम्मू कश्मीर व नैनीताल में  रोजगार के लिए जाने वाले नेपालियों के बृहद जन समूह की उपस्थिति देखी जाती रही है, जिनमे कुछ मौसमी रोजगार के लिए तो बाकी उद्योग कारखाने से लेकर रेस्टोरेंट, होटल में काम करने के लिए जाते रहे हैं यहां तक की कुछ ने अपना खुद का छोटा-मोटा व्यवसाय भी संचालन करके रखा हुआ है नेपाली।नजरिये से देखें तो कोरोना महामारी के इस कहर में इस समय सबसे ज्यादा असर इन्हीं नेपाली कामगारों पर पड़ता दिखाई दे रहा है 

जिसमे विशेष कर  मुंबई,बेंगलुरु, व दिल्ली है जहां पर आंशिक लॉक डाउन के कारण इनका रोजगार प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित हो गया है इन्ही मुख्य शहरों में नेपालियों की बृहद उपस्थिति भी मानी जाती है कोरोना महामारी के बीच रोजगार व व्यवसाय पूर्ण रूप से ध्वस्त हो जाने के कारण नेपालियों के अपने देश नेपाल आने के अतिरिक्त विकल्प ना होने के कारण वह नेपाल वापस लौट भी रहे हैं और साथ ही कोरोना कहर थमने के बाद पुनः अपने रोजगार पर वापस लौटने की प्रतीक्षा भी कर रहे है ।

भारत नेपाल सीमा के खुलते ही आम नेपाली उपभोक्ता दैनिक उपभोग का सामान खरीदने के लिए रुपईडीहा प्रवेश निश्चचित होने के कारण तत्काल भारत नेपाल सीमा को न खोलने के लिए नेपालगन्ज के व्यवसायियों द्वारा प्रशासन पर निरंतर दबाव डाला जा रहा है । नेपाल सरकार द्वारा बिगत 23 मार्च से देश मे लगाए गए लॉक डाउन को तकरीबन 4 महीने बाद खत्म कर बाजार खोलने के साथ सीमा को भी पुर्ण रूप से खोले जाने के भय से नेपालगन्ज के व्यवसायी ग्रसित दिखाई पड़ रहे है। नेपालगन्ज के व्यवसायियों का मानना है कि अगर सीमा पर आवागमन सामान्य कर दिया गया तो पूर्व की भांति ही रुपईडीहा बाजार में नेपाली उपभोक्ताओं की उपस्थिति बृहद होगी और नेपालगन्ज का बाजार सुनसान नजर आएगा।

वहीं एक नेपाली उपभोक्ता दीपक खनाल का कहना है कि नेपाल में लॉक डाउन खुलने के साथ ही भारत नेपाल सीमा पर भी आवागमन सामान्य कर देना चाहिए , अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने कहा कि कोई कितना भी आदर्शवादी बाते करे परन्तु भारतीय बाजार में नेपाली उपभोक्ता के प्रवेश किये बगैर नेपाली नागरिकों का काम आगे चलने वाला नही है । इसलिए नेपालगन्ज के व्यवसायियों को आदर्श की बाते नही करनी चाहिए, भारत नेपाल सीमा को खोल देना चाहिए वहीं उपभोक्ता को दैनिक सामग्री खरीद नेपालगन्ज में करना है या रुपईडीहा में ये उसकी इच्छा पर निर्भर है और वो इसके लिए स्वतंत्र है उसको जबरदस्ती नही रोका जा सकता । उन्होंने आगे बताते हुए कहा कि यदि सीमा को पूर्ण रुप से बंद ही करना है तो दो चार महीने के लिए नहीं बल्कि सदा के लिए बंद कर दिया जाए, नहीं तो यह दो चार महीने के लिए बंद करने का नाटक कर आम उपभोक्ता को भ्रमित करने का काम नहीं करना चाहिए क्योंकि आम उपभोक्ता सीमा के खुलते ही भारतीय बाजार प्रवेश छोड़ने वाले नहीं हैं ।

सीमा बन्द होने से अभी खेती के समय मे नेपाली किसानों को खाद के लिए तमाम मशक्कत व परेशानियों का सामना करते आसानी से देखा जा सकता है ।  बांके के कोहलपुर निवासी एक युवा रंजन के सी ने बताया कि भारत नेपाल सीमा बंद होने से नेपालगंज व कोहल पुर के व्यवसायियों को कोई असर नहीं पड़ने वाला परंतु यहां के उपभोक्ता, किसान व सर्वसाधारण नागरिकों के जीवन में सीमा के बंद होने का प्रत्यक्ष असर दिखाई पड़ने लगा है के सी ने आगे बताते हुए कहा कि अगर उपभोक्ताओं को भारतीय क्षेत्र में दैनिक सामान खरीदने हेतु जाने में रोक लगाने की मंशा नेपाल के व्यवसायियों की है तो यहां के बाजार में उपभोक्ता मैत्री होना जरूरी है साथ ही उन्होंने कहा कि पेट्रोलियम पदार्थ से लेकर सभी दैनिक उपभोग सामाग्री भारत से आयात में भी रोक लगाना चाहिए केवल आम नागरिकों को दैनिक खाद्य सामग्री खरीद के लिए सीमा उस पार न जा पाने के आशय से  सीमा बंद करने का दबाव दिया जा रहा है तो यह मानव जाति के लिए अमानवीय कार्य है।

कोरोना के कारण बने इस भयावह वातावरण में नेपाली नागरिकों को नेपाली भूभाग में ही  सुरक्षित रखा जाए यह सोचना उचित है परंतु इस वातावरण के आड़ में भारत नेपाल सीमा को तत्काल पूर्ण रूप से सील कर देने की मांग नेपाली व्यवसायियों द्वारा करना मानवीय व व्यवहारिक पक्ष दोनों नजरिये से संभव नही दिखाई पड़ रहा है ।
जो जिम्मेदार हैं उन्हें इस समस्या समाधान करने का प्रयास करें

  • रिपोर्टर – रईस अहमद

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