मर कर भी अमर है आजाद

मर कर भी अमर है आजाद

श्रावस्ती :- क्रांतिकारी ही नही बल्कि क्रांतिकारियों का नायक बनने के लिए ऊँची शिक्षा — दीक्षा कि जरूरत नही है , बल्कि उसके लिए क्रान्ति के प्रति अगाध विश्वास के साथ अदम्य साहस और अभूतपूर्व त्याग बलिदान कि जरूरत है शिक्षा व ज्ञान में पहुंच रखने वाले क्रान्तिकारियो साथियो से सिद्धांत व ज्ञान को सीखते

श्रावस्ती :- क्रांतिकारी ही नही बल्कि क्रांतिकारियों का नायक बनने के लिए ऊँची शिक्षा — दीक्षा कि जरूरत नही है , बल्कि उसके लिए क्रान्ति के प्रति अगाध विश्वास के साथ अदम्य साहस और अभूतपूर्व त्याग बलिदान कि जरूरत है शिक्षा व ज्ञान में पहुंच रखने वाले क्रान्तिकारियो साथियो से सिद्धांत व ज्ञान को सीखते रहने की जरूरत है |

इसका सबसे बड़ा सबूत महान राष्ट्र भक्त क्रांतिकारी चन्द्रशेखर आजाद है | शिक्षा ज्ञान कि कमी के वावजूद वे
हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन पार्टी व आर्मी के नायक बने रहे | गरीबी में जन्मे और गरीबी में पले– बढे आजाद ने अपनी निजं कि गरीबी दूर करने की जगह राष्ट्र को परतंत्रता से मुक्ति दिलाने का व्रत लिया | किशोरावस्था से ही इस रास्ते पर आगे बढे |

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अदम्य साहस और त्याग के साथ आगे बढे | आजाद का जीवन उन सभी के लिए स्मरणीय है जो आज भी राष्ट्र कि उस क्रांतिकारी आजादी का सपना सजोये है , जिसे हिन्दुस्तान सोशलिस्ट पार्टी के सदस्यों ने देखा था |
23 जुलाई के दिन पैदा हुए चन्द्रशेखर आजाद , इसी दिन पैदा ही लोकमान्य तिलक से 50 वर्ष छोटे थे |

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में क्रांतिकारी संघर्ष के सेनानायको में चन्द्रशेखर आजाद का नाम अग्रणी है | वे उत्कट देशभक्त असीम त्याग , अपरिमित शौर्य , अदभुत साहस और अनुभवी सैन्य — नेतृत्त्व की साकार प्रतिमा थे | पण्डित चन्द्रशेखर आजाद का जन्म उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के बदरका गाँव में 23 जुलाई सन् 1906 को हुआ था।अलीराजपुर जिले मध्य प्रदेश के भावरा नामक ग्राम मे रहने का भी गौरव प्राप्त हुआ |

भावरा ग्राम मध्य प्रदेश के आदिवासी मूल झाबुआ जिले में है | सीताराम तिवारी गाँव की सीमा पर एक झोपड़ी में रहते थे | आजीविका के लिए एक बाग़ में रखवाली करते थे| वे अत्यंत निर्धन थे | चन्द्रशेखर उनकी पांचवी संतान थे | तीन संताने अल्पायु रही | इस पांचवी संतान का पालन — पोषण उनकी माता ने अत्यंत कष्ट से निर्धनता में किया | निर्भीकता चन्द्रशेखर के स्वाभाव में जन्मजात थी |


एक दिन वे घर से अचानक बिना किसी को बताये बनारस जा पहुचे | संस्कृत सीखने की अपनी इच्छा अपने साथियो पर प्राय: व्यक्त किया करते थे | अत: बनारस पहुचकर एक मठ में संस्कृत का अध्ययन करने लगे घर की दयनीय आर्थिक स्थिति और संस्कृत पढने की अभिलाषा ही उन्हें बनारस खीच लायी थी |
देश में सर्वत्र असहयोग आन्दोलन का वातावरण था | विदेशी कपड़ो का बहिष्कार की भारत — भर में धूम थी | 1921 में च्न्र्शेख्र 14 वर्ष के किशोर थे |

इस किशोर अवस्था में वे स्वेदेशी आन्दोलन में आ गये | भावरा की कठिन परिस्थितियों में संघर्ष करने वाला बना दिया था | इसी वर्ष के अन्त में ब्रिटेन के युवराज दयक आफ विद्स्र भारत यात्रा पर आये | कांग्रेस ने उनके आगमन का विरोध किया सर्वत्र हड़ताल रखी गयी |
सरकार ने अपना दमन चक्र प्राम्भ किया | गांधी को छ: महीने का कारावास मिला |चन्द्रशेखर ने बनारस के सरकारी विद्यालय पर धरना दिया | इसी अपराध में इस किशोर पर मुकदमा चला | सुनवाई के दौरान चन्द्रशेखर ने जो उत्तर दिया वे इतिहास की धरोहर है | न्यायाधीश ने पूछा तुम्हारा नाम ? आजाद ,पिता का नाम


नाम ? स्वतंत्र ,तुम्हारा निवास ? जेलखाना | चन्द्रशेखर के इन निर्भीक उत्तरों से न्यायाधीश क्रुद्ध हो उठे | उन्होंने इस बालक को 15 कोड़ो की सजा सुनाई गयी | उनके साथियो को जिले के कारागृह में भेजा गया | वह सिपाही नगे
बदन पर कोड़े बरसा रहे थे और वे ” वन्देमातरम ” के नारे लगा रहे थे | अन्त में मूर्क्षित होकर गिर पड़े | काशी के इतिहास में वह एक अविस्मरनीय घटना है | सारी काशी नगरी आततायी सरकार से टक्कर लेने वाले उस किशोर को देखने व उसका प्रेम से अभिवादन करने के लिए उमड़ पड़ी |

अनेको भाषण हुए आजाद को मंच पर लाया गया | छोटे से आजाद को मेज पर खड़ा किया गया उनका सारा शरीर फूलो के हारो से ढक गया | उस दिन चन्द्रशेखर तिवारी से चन्द्रशेखर आजाद हो गये | चौरी — चौरा काण्ड के कारण असहयोग आन्दोलन स्थगित हो गया और महात्मा गांधी के अहिसंक मार्ग से उनकी आस्था डिगने लगी | इसी समय प्रख्यात शचीन्द्रनाथ सान्याल


संयुक्त प्रांत में क्रान्तिकारियो को संगठित कर रहे थे | श्री सान्याल ” हिदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन नामक एक दल तैयार किया | प्रणवेश चटर्जी इस सभा के सदस्य थे | उनका ध्यान चन्द्रशेखर आजाद की ओर गया | चन्द्रशेखर आजाद विद्यापीठ की पढ़ाई छोडकर पुन: संस्कृत पढने लगे थे | संभवत: मठ में स्वतंत्रता संघर्ष के अनुकूल वातावरण रहा होगा |, चटर्जी ने मंथननाथ गुप्त को आजाद इस सभा सदस्य बनाने का काम सौपा गया| आजाद सदस्य बनना स्वीकार करलिए | शीघ्र ही वे अपनी योगता के कारण अन्तरंग समिति के सदस्य भी बना लिए गये


चंदशेखर आजाद ने इस संस्था में नए कार्यकर्ताओं को जोड़ा | इस संस्था काउद्देश्य न केवल स्वतंत्रता प्राप्त करना था , अपितु शोषण रहित प्रजातंत्रकी स्थापना करना भी था | संगठन का विस्तार हो रहा था पर धन की कमी का संकट बढ़ता जा रहा था | संगठन के सारे खर्च थोड़े — से चंदे के भरोसे कैसे चलते | इस लिए डकैती आवश्यक लगने लगी | 1925 में दल के नेताओं की बैठक में राम प्रसाद बिस्मिल ने लखनऊ जाने वाले पैसेंजर ट्रेन में रक्खे सरकारी खजाने को लुटने का प्रस्ताव रखा |

9 अगस्त 1925 को योजना को मूर्त रूप देने का निश्चय हुआ | गाडी को लखनऊ से पहले काकोरी स्टेशन के समीप रोककर लुटने की योजना बनी | योजनानुसार राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी व शचीन्द्रनाथ बख्शी ने द्दितीय श्रेणी व चन्द्रशेखर आजाद , केशव चक्रवर्ती , मुरैलाल , मुकुंदीलाल , बनवारी लाल , रामप्रसाद बिस्मिल व मंथन नाथ गुप्त ने तृतीय श्रेणी के टिकट लिए | राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी व शचीन्द्रनाथ बख्शी काकोरी स्टेशन से चदे | गाडी छूटते ही उन्होंने जंजीर खीचकर गाडी रोक दी | क्रान्तिकारियो ने 20 — 25 मिनट में गाडी में रखा खजाना लूट लिया | रामप्रसाद बिस्मिल , अशफाकउल्ला खा और चन्द्रशेखर आजाद समेत कुल 10 लोगो ने इसमें भागीदारी की |


सरकार ने सुरागो के जरिये क्रान्तिकारियो को पकड़ना शुरू किया | फिर कई लोगो के मुखबिर हो जाने से सरकार का काम आसान हो गया | 25 क्रान्तिकारियो पर मुकदमा चला | इसमें चन्द्रशेखर आजाद का नाम था | पर चन्द्रशेखर आजाद काकोरी केस के अकेले ऐसे क्रांतिकारी थे , जो अन्त तक पकडे नही जा सके फरवरी 1931 में अंतिम सहादत से पहले कभी पुलिस उनकी छाया तक नही छू पाई |

उन्होंने कोर्ट ले जाते समय पुलिस की सशस्त्र व सज्जित गाडी पर आक्रमण करने जैसी साहसी योजनाये बनाई | परन्तु दुर्भाग्य से वे सफल नही हो सके |संगठन को काकोरी काण्ड की धर — पकड से जबर्दस्त झटका लगा | आजाद काफी समय अज्ञात वास में रहे | झांसी और ओरछा रियासत के जंगलो में भटकते रहे | अब वे हरीशंकर ब्रम्हचारी थे |

झांसी में उन्होंने क्रान्ति दल की एक शाखा भी स्थापित की| भगत सिंह , सुखदेव , राजगुरु , भगवानदास माहौर , सदाशिव राव मलकापुरकर विश्वनाथ राव , शिव वर्मा , जयदेव कपूर , प्रो. नंदकिशोर निगम , विजय कुमार सिन्हा , यशपाल , कुंदन लाल , काशीराम , राजेन्द्रपाल , सुरेन्द्र पाण्डेय , भगवती चरण बोहरा , दुर्गा भाभी , शुशीला दीदी , डाक्टर गया प्रसाद हंसराज वायरलेस सुखदवराज प्रकाशवती महावीर सिंह , बटुकेश्वरदत्त विमल प्रसाद जैन आदि अनेक इस नव गठित क्रांतिकारी दल के सदस्य थे |

अब इस दल का नाम हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशंन एंड आर्मी रखा गया | दल की 7 सदस्यी केन्द्रीय समिति के प्रमुख चन्द्रशेखर आजाद थे | वही इस आर्मी ( सेना ) के सेनापति थे | उन्होंने अनेक स्थानों पर अपनी सेना के केंद्र स्थापित किए | साइमन कमिशन के विरोध में पूरे प्रदर्शन के अवसर पर लाला लाजपत राय की पुलिस की मार के कारण मृत्यु हो गयी | जिसके प्रतिशोध के लिए सांडर्स की हत्या की योजना रची गयी | इस योजना का नेतृत्त्व चन्द्रशेखर के हाथो में था | सांडर्स हेड कांस्टेबल चानन सिंह के साथ मोटरसाइकिल पर पुलिस थाने से निकला |

निकलते ही दो क्रान्त्रिकारियो ने गोली चलाकर उसे नीचे गिरा दिया | चानन सिंह ने भागते हुए सायकिल सवारों का पीछा किया | वे दयानंद आर्ट्स कालेज हास्टल के दरवाजे से अंदर घुसे | उन्होंने चानन सिंह से पीछा न करने की प्रार्थना की | उसके न मानने पर चन्द्रशेखर ने उसे गोली से उड़ा दिया | जिस समय भगत सिंह और राजगुरु पुलिस थाने पर हमला कर रहे थे | चन्द्रशेखर भी थोड़ी दूरी पर खड़े थे | पुलिस ने छात्रावास को चारो तरफ से घेर लिया |

सम्पूर्ण लाहौर में गुप्तचर फैला दिया | रेलवे स्टेशन पर पुलिस का गुप्तचरों का जाल बिछा हुआ था इतने सख्त बन्दोबस्त के वावजूद दूसरे दिन लाहौर शहर में स्थान — स्थान पर दीवारों पर पर्चे चिपके हुए थे | जिन पर लाल स्याही से लिखा हुआ था की ”सांडर्स मारा गया ” ” लाला जी का बदला ले लिया गया ” क्रान्ति चिरायु हो | सांडर्स — वध के लिए अंग्रेजी शासन किसी को भी नही पकड सका | भगत सिंह और राजगुरु दुर्गा भाभी के साथ लाहौर से निकलकर कलकत्ता पहुच गये | आजाद भी लाहौर से बाहर आ गये |


9 अप्रैल 1929 को केन्द्रीय विधान सभा में बम — विस्फोट की ऐतिहासिक घटना घटित हुई | यह साहसी कार्य सरदार भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने किया था | बम — विस्फोट के विषय में दल में पूर्ण विचार – विमर्श हुआ था | दल का प्रत्येक व्यक्ति जानता था की दोनों पकडे जायेंगे और उन्हें फांसी होगी |


भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने स्वंय गिरफ्तारी दी | क्योंकि वे न्यायालय को क्रान्ति के प्रचार माध्यम बनाना चाहते थे | इस संदर्भ में सरकार चन्द्रशेखर आजाद को पकड़ने का पूर्ण प्रयत्न किया परन्तु आजाद व यशपाल तथा अन्य 7 साथी फरार ही रहे |क्रान्तिकारियो द्वारा 23 दिसम्बर 1929 को गवर्नर इरविन की विशेष गाडी के नीचे बम विस्फोट किया गया | गांधी ने ” कल्ट आफ द बम ” नामक लेख लिखकर इसका विरोध किया |

जिसके उत्तर में 26 जनवरी 1930 को ” फिलासफी आफ द बम ” पर्चा बाटा गया इसके लेखक यशपाल व भगवती चरण बोहरा थे | परन्तु सारी व्यवस्था चन्द्रशेखर आजाद की थी | जीवन के आखरी दिनों में उनका मन कुछ बेचैन — सा रहने लगा था | उनके मित्र गिरफ्तार हो गये थे और जो शेष थे , वे विशवास पात्र नही रहे | उनके ऐसे ही मित्रो में एक थे वीरभद्र तिवारी जिनके विश्वासघात से 27 फरवरी 1931 का दिन भारत के क्रांतिकारी आन्दोलन के लिए काला दिन बनकर आया |

उसी दिन इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में ब्रिटिश साम्राज्यशाही से सशत्र टक्कर लेते हुए अजेय सेनानी आजाद ने अपनी प्राण आहुति दी |27 फरवरी को इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में आजाद की मौजूदगी की सूचना क्रांतिकारी से पुलिस मुखबिर बने वीरभद्र ने पुलिस को दी पुलिस अधीक्षक नाट बाबर ने पुलिस दल के साथ पार्क के चारो ओर से घेरा डाल दिया दोनों तरफ से जबर्दस्त गोली चली आजाद का निशाना अचूक था |

इन्ही की गोली से डी. एस . पी . विशेश्वर सिंह का जबड़ा भी टूट गया | आजाद पर चारो ओर से गोली की बौछार होने लगी | तब भी लगभग 20 मिनट तक वे साहस से लड़ते रहे |
इतने सिपाही और इतना असलहा होने के वावजूद वे उन्हें पकड नही सके | अनेक गोलिया उनके शरीर में घुस चूकि थी और वे जमीन पर गिर पड़े | तब उन्होंने स्वंय एक गोली अपने सीने में दाग ल़ी | ” आजाद हमेशा कहा करते थे ” मैं जीते — जी अंग्रेजी हुकूमत के हाथ नही लगूंगा |

और उन्होंने अपनी यह प्रतिज्ञा पूर्ण की | शहादत के बाद शोक सभा में पुरुषोत्तम दास , कमला नेहरु मंगलदेव सिंह , शिव बिनायक मिश्र , श्रीमती प्रतिभा शचीन्द्रनाथ सान्याल आदि के भाषण हुए | अमर क्रान्ति कारी शचीन्द्रनाथ सान्याल की पत्नी श्रीमती प्रतिभा ने भाषण में कहा ” खुदीराम बोस की भस्म लोगो ने तावीज में रखकर अपने बच्चो को पहना दी थी |

उसी भावना से मैं आजाद की भस्म लेने आई हूँ
जनता का आदर और उत्साह देखकर सरकार ने शहीद स्थल के उस वृक्ष को काट डाला स्वतंत्रता के पश्चात बाबा राघवदास ने उसी जगह पुन: पेड़ लगा दिया | डा. भगवानदास माहौर लिखते है — हमारे दल में कुछ लोग प्रेमगीत लिखा और गाया करते थे | उस पर चिडकर आजाद ने कहा , इस जीवन में कहा है प्रेम — वेम ? मेरी कविता सुनो ।
दुश्मन की गोलियों का
हम सामना करंगे |
आजाद ही रहे है ,
आजाद ही रहेंगे |
और सचमुच वे जीवन भर आजाद ही रहे आजाद रहकर उन्होंने देश की आजादी का मार्ग प्रशस्त किया।


रिपोर्ट अंकुर मिश्रा

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