"पर्यावणीय नैतिकता और विकसित देशों की रवैया"

ये सही बात है कारण थोपना विश्व में सामान्य कारण है। भले ही वो धन से हो, रंग से हो, जाति से हो या नस्ल से हो।। वे हमेशा से अपने से छोटे को बताते है कि "you should do that"।। भले ही वो अपना इतिहास चरित्र इस समय तक आते आते भूल जाते।। 

विकसित देशों का भी यही हाल है वे "पर्यावणीय असुंतलन" के दोषों को विकाशील देशों या फिर अपने से छोटे देशों जैसे भारत और चीन देशों को ज्ञान की बात बताते लेकिन अपना इतिहास भूल जाते।। कि कैसे उन्होंने पृथ्वी के अधिकांश "जैव विविधता"का इस कदर दोहन किया की अब उसका प्रायश्चित भी करना असफल प्रयास है।।

मामला ये की हाल ही में आई "अमिताभ घोष" की नई बुक "The Nutmeg's curse" "पर्यावणीय संवेदनशीलता" के बारे में तो कुछ कहती ही है साथ ही रुडियार्ड क्रिपलिंग के वाइट्स मैन बर्डेन थ्योरी को कोसती भी है।।रूडियार्ड क्रिपलिंग वही हैं जो द जंगल बुक जैसे सुंदर किताब लिखे हैं लेकिन उनका किताब केवल की खूबसूरत है महाद्वीपीय लोगो के प्रति उनके विचार नहीं।।

खैर The Nutmeg's Curse" बुक बताती है कि इंडोनेशिया में जायफल कालीमिर्च और लौंग के व्यापार के लिए किस तरह से पुर्तगाली, डच और स्पेनिश व्यापारियों ने लाखो लोगो का नरसंहार किया,,फिर उनके जमीन कब्जाकर प्लांटेशन करना शुरू किया जिससे लगभग उस समय इंडोनेशिया का 76% जैव विविधता का ह्रास हुआ था।।

इतना ही नहीं वे दक्षिण अमेरिका के देशों में परोपकार के नाम पर स्माल पॉक्स टाइप महामारी का वायरस लगा कम्बल बांट देते जिसमे लगभग 60 से 70 लाख आबादी नष्ट हुई।। फिर उनके ज़मीन हड़पकर प्लांटेशन किया गया जिससे स्वाभाविक रूप से जैव विविधता का नुकसान हुआ होगा।। ऐसे ही कई उदाहरण हमे भारत और चीन में हुए औपनिवेशिक अत्याचार का भी याद दिलाते,, जिसमे जनजातियों का ज़मीन छीनना आदि शामिल हैं।। जिससे कुछ न कुछ तो जैव विविधता का ह्रास हुआ ही होगा।। चाइना का अफ़ीम की खेती प्लांटेशन पर ही टिकी हुई थी।।

लेखक अंतिम में यह कहना चाहते हैं की किसी पर कोई चीज थोपना आसान है जबकि चाहिए यह की वे दूसरों को सहयोग दे,, लड़ने के लिए।। लेकिन विकसित देश विकाशिल देश भारत और चीन पर आए दिन दबाव बनाते रहते जलवायु परिवर्तन को लेकर स्टेप्स उठाने के लिए,,लेकिन इतना तो तय है कि वें पिछले 15 वी से 18 वी सदी में किए गए अपने पर्यावरणीय संबंधी पाप के लिए उन्होंने कभी माफ़ी नहीं मांगी और न ही प्रायश्चित किया।।

अनुराग श्रीवास्तव

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