मदनमोहन जैसा कोई संगीतकार न हुआ, न होगा

मदनमोहन जैसा  कोई संगीतकार न हुआ, न होगा

एक फौजी आदमी। फिर रेडियो की नौकरी। उस्तादों की सोहबत। बेगम अख़्तर का साथ। और नामी गिरामी बेहद सफल संगीतकारों के बीच कितना चमकता हुआ , कितना अलग, कितना अनोखा संगीत। मदनमोहन के कमतर गीतों को खोजना भी एक मुश्किल काम है।
लता मंगेशकर हर संगीतकार के साथ उसकी तरह की लता हैं। पर मदनमोहन के साथ तो वे अपने भी सीमांत को छू लेती हैं। लता - मदनमोहन के गीत और ग़ज़लें हिंदी फ़िल्म संगीत में अलग से अपने सुरों का नूर बिखेरते नज़र आते हैं।
कितने अफ़सोस की बात है कि ऐसा नायाब कलाकार इतनी जल्दी दुनिया से चला गया ।
पता नहीं ऐसा मुझे ही लगता है या क्या है, सत्तर की दहाई में मदनमोहन की रेकॉर्डिंग्स की क्वालिटी भी बहुत बेहतर है। यह बात तो अलग है ही कि इस दौर में उनका संगीत, उनका ऑर्केस्ट्रेशन भी बहुत आधुनिक है। समय से भी ज़्यादा। इसीलिए बरसों बाद बनने वाली 'वीर ज़ारा' में उनकी धुनें उतनी ही ताज़ा लगती हैं जितनी बनाए जाने के वक़्त रही होंगी।
गुज़रते वक़्त के साथ हम इस सुरीले सुरसाधक को और मिस करते हैं। जितना ख़ूबसरत आदमी , उतना ही सुरीला संगीतकार।
मदनमोहन का ज़िक्र आते ही उनकी कुछ मशहूर ग़ज़लें, लग जा गले, आपकी नज़रों ने समझा और नैना बरसे या वीरज़ारा के गीत उनके काम पर छा जाते हैं। यह हर कलाकार के साथ होता है। कुछ श्रेष्ठ इतना प्रसिध्द हो जाता है कि अन्य श्रेष्ठ को हमेशा उसकी छाया में चुपचाप रहना पड़ता है।
लेकिन मदनमोहन में अच्छे काम की बहुत निरन्तरता है। और यह अच्छा काम विविधता में है। किशोरकुमार ने उनके साथ कम गाया है मगर 'ऐ हसीनों नाज़नीनों मैं दिल हथेली पे लेके आ गया हूँ ' या 'सिमटी सी शरमाई सी इस दुनिया में तुम आई हो' जैसे गीत उनके लिए किशोर ने गाए हैं।
मदनमोहन में न सिर्फ़ तेज़ी से बदलते संगीत संयोजन की पकड़ थी, वे प्रयोग करने में भी पीछे नहीं थे। 'दस्तक' में रफ़ी से ' तुमसे कहूँ इक बात परों से हल्की हल्की' में जो सरगोशियों वाला सेंसुअल पिच है और इंटरल्यूड्स में सड़क पर गुज़रते तांगे के ध्वनि प्रभाव हैं, वे आपको और कहीं नहीं मिलेंगे। इसके मूड का जोड़ीदार गीत उन्हीं के यहाँ है। इस बार युगल गीत : 'मेरी दुनिया में तुम आई क्या क्या अपने साथ लिए'। लता रफ़ी यहॉं साथ में हैं।
'ये दुनिया ये महफ़िल मेरे काम की नहीं' में इंटरल्यूड की कम्पोज़िशन देखिए। उदासी और आकुलता , मंदिर की घण्टियों का क़व्वाली के संगीत के साथ ओवरलैपिंग, मदनमोहन का यह अविस्मरणीय शाहकार है। 'तुम जो मिल गए हो तो ये लगता है कि जहाँ मिल गया' जैसा काम उनके अलावा कहाँ है? यह तो ऐसा नायाब गीत है कि इस पर अलग से पूरा आलेख लिखना पड़े। विलम्बित से द्रुत में जाती रूमान की लय। क्या ब्रिलियंट इंटरल्यूड्स। वायलिन की तेज़ होती रफ्तार जैसे कोई पहाड़ी घुमावदार सड़क पर स्टीयरिंग घुमाता गाड़ी चला रहा हो। और बीच में इको के साथ लता की मीठी बरछी जैसी आवाज़ में गीत का सिर्फ़ मुखड़ा, जिसके पार्श्व में समुद्र की लहरें चट्टान से टकराती हैं। यह गाना कानों की अक्षय ट्रीट है।
आर डी बर्मन के सदा के आशिक़ गुलज़ार ने दो फ़िल्मों : 'कोशिश' और 'मौसम' में मदनमोहन का संगीत लिया। 'कोशिश' में तो रफ़ी की आवाज़ में एक लोरी भर है, 'मौसम' में 'दिल ढूंढता है' के दोनों वर्शन कमाल के हैं। जैसे गुलज़ार के शब्दों को एक नई धड़कन मिलती है। स्मृति के रेखांकन के लिए जिस ट्रांज़िशनल इफ़ेक्ट की ज़रुरत है, ठीक वही इस गीत के आर्केस्ट्रेशन में मिलता है।
खुद आर डी बर्मन मदनमोहन के असर से बच नहीं पाए। 'शर्म आती है मगर आज ये कहना होगा' शुरुआती नोट से आखिर तक मदनमोहन की शैली की याद जगाता है।
फ़िल्म न चली हो, मदनमोहन का संगीत अक्सर चला। लेकिन फिर भी मदनमोहन बड़े निर्माता निर्देशकों के चहेते नहीं बन पाए। राज खोसला की 'मेरा साया' में उनकी वर्स्टेलिटी देखने क़ाबिल है। वे रफ़ी की आवाज़ में 'आपके पहलू में आकर रो दिए' जैसा अनमोल उदास गीत रचते हैं; आशा भोसले की खनकदार आवाज़ में लोकसंगीत का आधार लेकर 'झुमका गिरा रे' और लता के स्वर में भीमपलासी की सुगंध लिए 'नैनों में बदरा छाए '।शीर्षक गीत की तो मैं बात ही नहीं कर रहा। 'चिराग़' का 'तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रखा क्या है' बहुत मक़बूल है मगर 'भोर होते कागा पुकारे काहे नाम' की मधुरता और शोख़ी भी भुलाने की चीज़ नहीं है।
श्रेष्ठ ही नहीं, लोकप्रिय भी और श्रेष्ठता की क़ीमत पर लोकप्रिय कभी नहीं : यह मदनमोहन के संगीतजीवन का सूत्रवाक्य जैसा लगता है। तब आखिर क्या वजह रही होगी कि मदनमोहन ए ग्रेड फ़िल्मकारों के पसंदीदा कभी नहीं बन पाए। उनकी मृत्यु के बहुत बाद उनकी बनाई धुनों को 'वीरज़ारा' में इस्तेमाल करने वाले यश चोपड़ा ने जब अपने बैनर की शुरुआत की, तो लक्ष्मी प्यारे को लिया। मदनमोहन अपने पूरे करियर में कभी दिग्गजों से तो कभी चतुर संगीतव्यवसायियों से ओवरशैडो रहे। हमारे यहाँ गुणी मगर खुद को बेचने के हुनर से महरूम लोग हमेशा इसी तरह हाशिए पर रहते आए हैं। खुद राज खोसला अपनी दो सस्पेंस फ़िल्मों के कामयाबतरीन संगीत के बाद भी कथित 'मेनस्ट्रीम', 'चलने वाले' संगीतकारों के पास ही गए। ऐसे में गुलज़ार जैसे कद्रदान निर्देशक का 'मौसम' के लिए उनके पास आना उनकी ख़ुशी का सबब रहा होगा। मगर तब तक उम्र की मोहलत बीत चुकी थी।
कम ही सही, है बहुत खूब। क्या पता बहुत व्यावसायिक सफलता इतनी गुणवत्ता को इस तरह अक्षत न रहने देती। जो है और जितना है उसे हम कृतज्ञ अनुराग से याद करते हैं, करते रहेंगे।
 
- शोध व लेख: आशुतोष दुबे

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