उदारता, सहिष्णुता, मानवता ही बन गई है हिंदू समाज का मुख्य अपराध !

उदारता, सहिष्णुता, मानवता ही बन गई है हिंदू समाज का मुख्य अपराध !

 
 
नूपुर शर्मा इसलिए अपराधी है, क्योंकि मुस्लिम समुदाय उसे अपराधी मानने पर अडिग है। उसे अपराधी मानते हुए उसने देश भर में उग्र प्रदर्शन किए हैं और यहाँ तक कि अमरावती से लेकर उदयपुर तक कई लोगों की नृशंस हत्याएं भी कर दी हैं।
नूपुर शर्मा ने जिस तस्लीम रहमानी के वक्तव्यों से उद्वेलित होकर विवादित टिप्पणी की, वह अपराधी इसलिए नहीं है, क्योंकि हिंदू समुदाय उसे अपराधी की तरह नहीं देख रहा, न ही उसने उसके खिलाफ उग्र प्रदर्शन किये हैं, या किसी किस्म की कोई हिंसा की है।
और सारा विवाद काशी के जिस ज्ञानवापी ढांचे से शुरू हुआ, वहां लगभग साढ़े तीन सौ साल पहले एक मंदिर था। आज भी यह प्रत्यक्ष दिख रहा है कि उसी की दीवारों को तोड़कर उसी के ऊपर एक मस्जिदनुमा ढांचा बना दिया गया था, जिसे मुस्लिम समुदाय आज भी जबरन मस्जिद कहने पर आमादा है और भीड़ बनाकर वहां नमाज भी पढ़ता चला आ रहा है। देखा जाए तो यह भी हिंदुओं पर एक सतत आक्रमण है और वहां पर नमाज पढ़ने वाला हर शख्स इस सतत आक्रमण और हिंदू देवी-देवताओं के निरंतर अपमान का अपराधी है। वहां पर शिवलिंग मिल जाने के बाद तो यह अपराध और भी स्पष्ट हो गया है। इसके बावजूद इन लोगों को अपराधी इसलिए नहीं माना जा रहा है, क्योंकि हिंदू समुदाय इन्हें अपराधी की तरह नहीं देखता, न उसने इनके खिलाफ उग्र प्रदर्शन किये हैं, न कभी कोई हिंसा की है।
एक और उदाहरण से समझिए। फ्रांस में शार्ली हेब्दो के कार्टूनिस्ट ने मुसलमानों के विरुद्ध लगभग वही काम किया था, जो मकबूल फिदा हुसेन नाम का एक चित्रकार भारत में हिंदुओं के विरुद्ध किया करता था। लेकिन दुनिया भर के मुस्लिम समुदाय ने शार्ली हेब्दो के कार्टूनिस्ट के काम को अपराध माना, उसके दफ्तर पर हमला करके 12 लोगों की हत्या की और भारत सहित दुनिया भर में उसके विरुद्ध उग्र प्रदर्शन किए। इसके उलट भारत में हिंदुओं ने मकबूल फिदा हुसेन के काम को न तो अपराध माना, न उसके खिलाफ कोई उग्र प्रदर्शन किये, न कोई हिंसा की। नतीजा यह हुआ कि चंद लोगों ने जो मुकदमे मकबूल फिदा के खिलाफ दर्ज कराए भी, कोर्ट ने उन्हें सीरियसली नहीं लिया। और तो और, भारत की किसी सरकार ने भी आज तक नहीं कहा कि वह कोई चित्रकार नहीं, बल्कि फ्रिंज एलिमेंट था।
बॉलीवुड में पीके जैसी कितनी फिल्में बनीं, जिनमें हिंदू देवी-देवताओं का अपमानजनक चित्रण किया गया, लेकिन चूंकि हिंदू समुदाय ने उनके निर्माता-निर्देशकों, लेखकों-अभिनेताओं के खिलाफ कभी भी "सिर तन से जुदा" नारे के साथ उग्र प्रदर्शन नहीं किये, कभी किसी का सिर कलम नहीं किया, इसलिए उन लोगों को अपराधी नहीं माना गया। अगर हिंदू समुदाय ने भी ऐसे कृत्य किये होते, तो भारत सरकार ने उन्हें भी फ्रिंज एलिमेंट और सुप्रीम कोर्ट के माननीय जजों ने उन्हें भी अपराधी और देश की सुरक्षा के लिए खतरा मान लिया होता।
*** तो क्या उदारता, सहिष्णुता और मानवता ही बन गई है हिंदू समुदाय का मुख्य अपराध?
*** क्या हिंदू समुदाय को भी अपनी आस्थाओं को बुद्धि, विवेक और ज्ञान-विज्ञान से ऊपर रखना चाहिए और कट्टर होना चाहिए?
*** या फिर इस्लाम के नाम पर पाकिस्तान देने के बाद जिस देश को वे अपना समझ रहे हैं, क्या वहां भी उन्हें इस्लामी देशों के कानूनों को अघोषित रूप से लागू मान लेना चाहिए?
*** क्या देश की सुप्रीम अदालत भी यही कहना चाहती है कि भारत में धर्म से जुड़े मुद्दों पर कोई विचार-विमर्श, बहस-मुबाहिसे नहीं हो सकते?
*** क्या अब से हम भारत के लोग भी पाकिस्तान या मुस्लिम देशों जैसा बंद समाज झेलने के लिए तैयार हो जाएं, जहां हमारी अभिव्यक्ति, विचार-विमर्श, शोध-लेखन, पठन-पाठन इत्यादि की आज़ादी चंद कट्टरपंथियों की मोहताज हो जाएगी?
*** यह सवाल भी मुंह बाए खड़ा है कि अगर 14.2% आबादी पर मुस्लिम समुदाय का यह रवैया है, तो यदि वे 20-25% हो जाएंगे तो क्या होगा? अन्यथा यदि न्याय की बात करेंगे, तो नूपुर शर्मा ने कोई अपराध किया ही नहीं है। क्योंकि न तो उसने डिबेट की पहल करते हुए या स्वतंत्र रूप से वह विवादित टिप्पणी की थी, न ही उसने कोई मनगढ़ंत बात कही थी। उसने जो कहा, वह डिबेट के अंदर मुस्लिम पैनलिस्ट की प्रतिक्रिया में कहा और वही कहा जो इस्लामी हदीसों में लिखा हुआ है और ज़ाकिर नाइक जैसे इस्लामी स्कॉलरों ने जिसकी पुष्टि कर रखी है।
इसलिए यदि नूपुर शर्मा की टिप्पणी में कुछ गलत था, तो केवल टिप्पणी करने का लहजा। लेकिन यदि लहजे पर सज़ा देने लगेंगे, तो टीवी बहसों के उत्तेजनापूर्ण माहौल में ज़्यादातर प्रवक्ता और पैनलिस्ट गुनहगार सिद्ध हो जाएंगे। फिर बात वहीं पर आकर अटक जाएगी कि जो हिंसा करेगा, उसके पक्ष में मान लिया जाएगा कि उसके विरुद्ध कुछ गलत कहा गया है। और जो हिंसा नहीं करेगा, उसे न तो सरकार का समर्थन मिलेगा, न ही कोर्ट का।
तो सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या इस लोकतंत्र में अपना ज़ोर चलाने के लिए अब हिंसा ही एकमात्र विकल्प है? सुप्रीम कोर्ट के दो माननीय जजों की अवांछित टिप्पणियों के बाद एक बड़ी आबादी के मन-मस्तिष्क में यह सवाल और गहरा हो गया है।
ऐसे में यदि देश की संसद या सरकार ने भी इसका कुछ समाधान नहीं निकाला, तो आने वाले दिनों में विभिन्न समुदायों के बीच टकराव और बढ़ सकते हैं, जिसे एक ज़िम्मेदार लोकतंत्र में किसी भी दृष्टि से उचित नहीं ठहराया जा सकता।
 

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