मेरे उर से आनन्द-निर्झरी झरती है और डॉ. बलदेव प्रसाद मिश्र

मेरे उर से आनन्द-निर्झरी झरती है और डॉ. बलदेव प्रसाद मिश्र

हाल ही में आभा तिवारी द्वारा डॉ0 बलदेव प्रसाद मिश्र पर लिखित दो पुस्तकें इंक पब्लिकेशन प्रयागराज से प्रकाशित हुई है - डॉ0 बलदेव प्रसाद मिश्र एवं मेरे उर से आनंद निर्झरी झरती है। 

प्रथम पुस्तक में डॉ0 बलदेव प्रसाद मिश्र के बहुआयामी व्यक्तित्व का सूक्ष्म अंकन किया गया है। डॉ0 मिश्र छत्तीसगढ़ के ही नहीं वरन् देश में तुलसी के मानस दर्शन के मौलिक प्रस्तोता के रूप में ख्यातिलब्ध साहित्यकार थे। उन्होंने सन् 1939 में ‘तुलसी दर्शन’ जैसा गवेषणात्मक शोध प्रबन्ध लिखकर नागपुर विश्वविद्यालय से डी लिट की उपाधि प्राप्त की। इस शोध प्रबन्ध की विशेषता यह है कि यह अंग्रेजी के स्थान पर हिन्दी में लिखा प्रथम शोध प्रबन्ध है। इस प्रबंध में प्रथम बार तुलसी के सिद्धांतों का मौलिक एवं स्वतंत्र स्वरूप स्पष्ट करने के साथ मानस के भक्ति तत्व को विवेचित करने का प्रयास किया गया है। मिश्र जी साहित्यकार होने के साथ ही कुशल प्रशासक, समाज सेवक एवं विधायक भी थे। मिश्र जी के व्यक्तित्व एवं साहित्य के सम्बन्ध में उनके विचारों को समझने के लिए यह पुस्तक बहुत उपयोगी है।

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‘मेरे उर से आनंद निर्झरी झरती है’ में मिश्र जी के काव्य साहित्य का विवेचन है। इस निर्झरी में एक ओर भक्त के हृदय का प्रबल आग्रह सुनाई देता है तो दूसरी ओर जीवन को उसके सम्पूर्ण स्वरूप के साथ ग्रहण करने का साहस एवं विश्वास भी दिखाई देता है। इस निर्झरी में जीवन के विविध भाव, विविध रूपों में समाहित हैं। मिश्र जी का काव्य सामाजिक हित एवं सहज मानवीयता के संघर्ष को मूर्त करता है। काव्य में उन्होंने ‘उदात्त’ नामक एक रस की उद्भावना की है। उनकी नवीनतम काव्य कृतियाँ उनकी इस उद्भावना को प्रमाणित करती हैं। आज जब हमारा काव्य नयेपन की होड़ में औदात्य का नितान्त बहिष्कार कर चुका है, मिश्र जी की कवितायें जीवन का अत्यंत, गुरु गंभीर रसात्मक खोज प्रस्तुत करती हैं। यह पुस्तक जीवन को एक नये दृष्टिकोण से समझने में उपयोगी है।

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