“खुदा और विसाले सनम

“खुदा और विसाले सनम

पुस्तक के बारे में 
“साहित्य की अन्य विधाओं में सक्रिय रहने के बावजूद मैंने खुद को कथाकार ही माना । पिछले डेढ़ दशक में लिखी गयी कुछ चुनिंदा लम्बी कहानियों का संकलन है “खुदा और विसाले सनम “। ये कहानियां गांव और कस्बाई जीवन पर आधारित हैं जो कि अब पूरी तह हाशिये पर हैं  लेकिन इनमें महानगर की चमक -दमक के नीचे दबी हुई कराह और टीस भी है।कहते हैं  कि “कहानी सच को झूठ में लपेट कर कहने की कला है “ लेकिन ये रुमानियत अकहानी या नयी कहानी की मुहिम की थी जो कि पूरी कहन सामने नहीं ला पाती थी ।

मेरे लिये कथा लेखन का ब्रम्हवाक्य सुप्रसिद्ध कथाकार डॉ रमेश उपाध्याय की कही बात है कि  “बदलते हुए यथार्थ को देखो ,यथार्थ को बदलने के लिये लिखो “।

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ये कहानियां भारत के गांवों /कस्बों के बदलते हुए यथार्थ  के ना सिर्फ संग -संग चलती हैं बल्कि उनसे जूझती भी हैं ।  खुरदुरे यथार्थ की जमीन पर पनपीं मगर आखों में बदलाव का स्वप्न पालने को जूझ रही नायक/नायिकाओं  को ये कहानियां यथार्थ को कितना बदल पाएंगी ,ये निर्णय समय पर छोड़ना उचित होगा।


मैं सुधि पाठकों को ये पुस्तक अर्पित करता हूँ क्योंकि हर साहित्यकार की अग्नि परीक्षा पाठक ही लेते हैं। मैं इंक पब्लिकेशन, दिनेश कुशवाहा जी और पुस्तक से जुड़े सभी लोगों के प्रति कृतज्ञ हूँ जिन्होंने इस किताब को प्रकाशित किया।


सादर 
दिलीप कुमार 


लेखक के बारे में 
विज्ञान की पूरी तालीम करने तक साहित्य से ना तो नाता रहा और ना ही विशेष रुचि । बस कहीं से “भारत के गोर्की” कहे जाने वाले शैलेश मटियानी के अंतिम दिनों के संघर्ष और उनकी तकलीफों के बारे में पढ़ा। इस खबर ने इतना झकझोरा कि दिलो - दिमाग में विज्ञान के सूत्र के बजाय करुणा और संवेदना ने डेरा डाल दिया। वहीं से कहानियां पढ़नी और लिखनी शुरू कर दी। डेढ़ दशक के लेखन में सिने माध्यमों ,रेडियो , के लिये भी लिखा लेकिन रहा साहित्यक कथाकार ही ।


उपन्यास/लघुकथा/कथा -संग्रह/व्यंग्य संग्रह और पाठकों का प्यार यही जमा पूंजी है और यही सब विस्तारित करते जाना है ।
दिलीप कुमार

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