मालिक ने दलित श्रमिकों को बंदी बनाकर किया उत्पीड़न

मालिक ने दलित श्रमिकों को बंदी बनाकर किया उत्पीड़न

देश में कर्नाटक के एक कॉफी बागान के मालिक ने दलित श्रमिकों का उत्पीड़न किया है। इस तरह के मामले आज भी दलित श्रमिकों को बंदी बना कर रखना और उनके साथ मारपीट जैसा उत्पीड़न करना जारी है। 

 


कर्नाटक के चिकमंगलूर जिले में कॉफी के एक बागान के मालिक जगदीश गौड़ा पर आरोप लगे हैं कि जगदीश गौड़ा करीब 16 दलित श्रमिकों को कई दिनों तक बंदी बना कर रखा है और उनके साथ मारपीट की है। इन 16 श्रमिकों में से एक श्रमिक गर्भवती महिला थी। इस गर्भवती महिला पर गौड़ा ने मारपीट की जिससे गर्भवती महिला का गर्भपात हो गया है। गर्भवती महिला के रिपोर्ट लिखाने पर पुलिस ने गौड़ा और उनके बेटे तिलक को ढूढ़ने की बहुत कोशिश की है लेकिन अभी वो दोनों फरार हैं। ये सभी पीड़ित गौड़ा के बागान पर दिहाड़ी श्रमिकों के तौर पर काम कर रहे थे और बागान में ही श्रमिकों के लिए बनी कॉलोनी में रहते थे। बयान के मुताबिक उनमें से कुछ ने गौड़ा से नौ लाख रुपये उधार लिए थे। इसी आधार पर गौड़ा और उसके बेटे ने उधार की भरपाई के लिए सभी श्रमिकों को बंदी बना लिया था। भारत में पुरानी परंपरा से ही मजदूरों पर मालिक शोषण करते आये हैं। इन सबको देखते हुए पुलिस प्रशासन इस मुद्दे पर कड़ाई से पालन कर रही है। 

 

 

एक सर्च द्वारा 2016 में भारत में करीब 80 लाख लोग आधुनिक गुलामी में रह रहे  थे। लेकिन इन्ही कुछ कारणों के कारण ऐसा लगता है की इन सभी की असली संख्या इससे ज्यादा है। फिर चाहें कपड़े बनाने की फैक्टरियां हों या ईंट बनाने की भट्ठी, कई पेशे हैं जिनमें लोग अपने-अपने घरों से दूर जाकर काम करते हैं और वहां कम वेतन और अमानवीय हालात में फंसे रह जाते हैं। इन श्रमिकों की आय इतनी नहीं होती कि इसमें आराम से गुजर बसर हो सके और अक्सर इन्हें मालिकों से कर्ज लेना पड़ता है. मालिक अक्सर कर्ज इतनी ऊंची ब्याज दर पर देते हैं कि उसे लेने के बाद श्रमिक कर्ज चुकाने के एक लंबे संघर्ष में फंस जाते हैं और यहीं से उनकी गुलामी की शुरुआत होती है। इन सब में विशेष रूप से दलितों की हालत विशेष रूप से खराब है। दलितों की दशा का मुख्य कारण भेदभाव की वजह भी है जहाँ दलितों को आर्थिक और सामाजिक उत्थान के अवसरों से वंचित रखा जाता है। इस प्रकार दलितों का शोषण सबसे ज्यादा होता है। भारत में हर तीसरा गरीब के श्रेणी में आता है लेकिन अब वक्त और हालात बदल रहे हैं। 

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