क्या आपको पता है गोवर्धन पर्वत कैसे पहुंचा श्रीकृष्ण की लीला स्थली मथुरा

क्यों तिल-तिल घट रहा है गोवर्धन पर्वत

क्या आपको पता है गोवर्धन पर्वत कैसे पहुंचा श्रीकृष्ण की लीला स्थली मथुरा

गोवर्धन : दीपावली के दूसरे दिन या कहें कार्तिक शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को गोवर्धन और वह पूजा का विशेष महत्व माना जाता है। आज गोवर्धन पूजा का पावन पर्व है। इस उपलक्ष्य में हम आपको गोवर्धन पर्वत के बारे में यह जानकारी बता रहे हैं। श्रीकृष्ण की नगरी मथुरा में स्थित गोवर्धन पर्वत एक समय में दुनिया का सबसे बड़ा पर्वत था। गोवर्धन पर्वत को लेकर पौराणिक कथाओं में कहा गया है कि यह इतना बड़ा था कि सूर्य को भी ढ़क लेता था। इस पर्वत को भगवान श्रीकृष्ण ने द्वापर युग में अपनी उंगली पर उठाकर इंद्र के प्रकोप से ब्रज को लोगों की मदद की थी। गोवर्धन पर्वत को गिरिराज पर्वत भी कहा जाता है। इस पर्वत को लेकर धार्मिक मान्यता है कि यह पर्वत हर रोज तिल भर घटता जा रहा है। गोवर्धन पर्वत के तिल भर घटने की पीछे एक बेहद रोचक कहानी भी है।

आखिर क्यों तिल-तिल घट रहा है गोवर्धन

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भगवान श्री कृष्ण की लीला स्थली मथुरा में भगवान श्री कृष्ण के साथ-साथ गोवर्धन पर्वत की भी पूजा की जाती है। 21 किलोमीटर में फैले इस पर्वत का 7 किलोमीटर भाग राजस्थान में है जबकि बाकी हिस्सा उत्तर प्रदेश में है। कहा जाता है कि गोवर्धन पर्वत को श्राप है कि वह प्रतिदिन तिल तिल घटेगा। ऐसा पुराणों में ही नहीं बल्कि वैज्ञानिकों ने भी माना है। विशेषज्ञों ने भी बताया है कि 5 हजार साल पहले गोवर्धन पर्वत 30 हजार मीटर ऊंचा हुआ करता था और अब यह पर्वत केवल 30 मीटर ही रह गया है। भगवान श्रीकृष्ण ने ही ब्रज के लोगों को गोवर्धन पर्वत की पूजा करने के लिए प्रेरित किया था, तभी से इस पर्वत की पूजा और परिक्रमा की जा रही है। यहां पर सभी भक्तों की मनोकामना पूरी होती है और कोई खाली हाथ नहीं लौटता। साथ ही ना कोई भूखा रहता ऐसी भी मान्यता है।

गोवर्धन पर्वत को है ऋषि पुलस्त्य का श्राप 

गोवर्धन पर्वत के हर रोज घटने का कारण ऋषि पुलस्त्य का श्राप है। कथा के अनुसार, एक बार ऋषि पुलस्त्य गिरिराज पर्वत के पास से गुजर रहे थे, तभी उनको इसकी खूबसूरती इतनी पसंद आई की वे मंत्रमुग्ध हो गए। ऋषि पुलस्त्य ने द्रोणांचल पर्वत से निवेदन किया मैं काशी में रहता हूं आप अपने पुत्र गोवर्धन को मुझे दे दीजिए। मैं उसको काशी में स्थापित करूंगा और वहीं रहकर पूजा करूंगा। द्रोणांचल पुत्र मोह से दुखी हो रहे थे लेकिन गोवर्धन ने कहा कि हे महात्मा मैं आपके साथ चलूंगा लेकिन मेरी एक शर्त है। शर्त यह है कि आप मुझे सबसे पहले जहां भी रख देंगे, मैं वहीं स्थापित हो जाउंगा। पुलस्त्य ने गोवर्धन की शर्त को मान ली। तब गोवर्धन ने ऋषि से कहा कि मैं दो योजन ऊंचा और पांच योजन चौड़ा हूं, आप मुझे काशी कैसे लेकर जाएंगे। तब ऋषि ने कहा कि मैं अपने तपोबल के माध्यम से तुमको अपनी हथेली पर उठाकर ले जाउंगा। रास्ते में ब्रज आया, तब गोवर्धन पर्वत को याद आया कि यहां पर भगवान कृष्ण अपने बाल्यकाल में लीला कर रहे हैं। यह सोचकर गोवर्धन पर्वत ऋषि के हाथों में अपना भार बढ़ाने लगे, जिससे ऋषि ने आराम और साधना के लिए पर्वत को नीचे रख दिया। ऋषि पुलस्त्य यह बात भूल गए थे कि उन्हें गोवर्धन पर्वत को कहीं पर भी रखना नहीं है। साधना के बाद ऋषि ने पर्वत को उठाने की बहुत कोशिश की लेकिन पर्वत हिला तक नहीं। इससे ऋषि पुलस्त्य बहुत क्रोधित हो गए और उन्होंने श्राप दे दिया कि तुमने मेरे मनोरथ को पूर्ण नहीं होने दिया, इसलिए अब हर रोज तिल भर तुम्हारा क्षरण होता रहेगा। माना जाता है कि उसी समय से गिरिराज पर्वत हर रोज घट रहे हैं और कलयुग के अंत तक पूरी तरह विलीन हो जाएंगे।

 

 

 

 

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