विषम परिस्थितियों में भी अपने विवेक को स्थिर बनाए रखने वाले राष्ट्रकवि दिनकर की जयंती

by shubham

“समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध 
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध।”

इस पंक्ति को लिखने वाले रामधारी सिंह दिनकर जी की आज जयंती है। श्रद्धेय दिनकर जी को राष्ट्रकवि व लोककवि दोनों का प्रेम प्राप्त है। दिनकर जी जन-चेतना को जागृत करने में अग्रणी भूमिका निभाते हैं। बिहार की भूमि में अंकुरित हो कर वे महान वृक्ष बनके समग्र भारत भूमि को शक्ति और शांति देने का मार्ग निर्मित कर गये।

अपने प्रतिष्ठित व लोकप्रिय काव्य संग्रह रश्मिरथी में वे समय के मूल तत्व को अपनी रचना से अंकित करने में सफल हो जाते हैं। रश्मिरथी के कृष्ण की चेतावनी अध्याय में वे लिखते हैं-

“हरि ने भीषण हुंकार किया,अपना स्वरूप-विस्तार किया,डगमग-डगमग दिग्गज डोले,भगवान् कुपित होकर बोले- ‘जंजीर बढ़ा कर साध मुझे,हाँ, हाँ दुर्योधन! बाँध मुझे।
यह देख, गगन मुझमें लय है,यह देख, पवन मुझमें लय है,मुझमें विलीन झंकार सकल,मुझमें लय है संसार सकल।
अमरत्व फूलता है मुझमें,संहार झूलता है मुझमें।”

व्यक्ति के वास्तविक मनोवृतियों का पता तभी चलता है जब वह चहूंचोर समस्या से गिर जाए, जब विपदा चेतना पर भारी पड़ने लगे तब उसकी शुद्धता का उससे एकात्मकता व उसके संतुलन की स्थिति ही उसकी मनुष्यता का वास्तविक परिचय है।

दिनकर की प्रतिबद्धता

बीसवीं सदी के 40 का दशक जब चहूंओर अफरा-तफरी फैली थी, आसमान बम के काले गुब्बार से ढाका पड़ा था, भूमि रक्त से सनी हुई मिट्टी से नहा रही थी, उस वक्त जब हर जान या तो आक्रमक था या तो भयभीत! लोक जीवन के सार्वजनिकता में लिप्त चेहरे शंका से अनिश्चित हो चले थे, उस वक्त भी शुचिता से समझौता ना करना, सत्य के सातत्यता को विवेक से थामे रखने वाले गिनती के ही थे, महात्मा गांधी उन्ही में से एक थे जो उस वक्त भी सूर्य की भांति स्पष्ट रौशनी बिखेर रहे थे।

राष्ट्रकवि श्रद्धेय रामधारी सिंह दिनकर जी महात्मा गांधी पर काव्य-संग्रह प्रकाशित करते हैं, उस काव्य-संग्रह का नाम है- ‘बापू। दिनकरजी लिखते हैं –

यह तो बेचारा गांधी है

“देवालय सूना नहीं, देवता हैं, लेकिन, कुछ डरे हुए
दानव के गर्जन-तर्जन से कुछ भीति-भाव में भरे हुए।”
‘मानवता का मरमी सुजान आया तू भीति भगाने को।’ यह पंक्ति वे गांधी जी के लिए ही लिखते हैं। वे यह भी लिखते हैं- “तू चला, तो लोग कुछ चौंक पड़े, तूफान उठा या आंधी है ? ईसा की बोली रूह, अरे! यह तो बेचारा गांधी है।”

सच भी है, संत ही संकटहर्ता बनते हैं। मनुष्यता जब दुख से घिर जाती हैं, जब वह घुटनों के बल हांफने लगती है, जब उसे कोई मार्ग नजर नहीं आता, निराशा उस पर झपट्टा मारने लगती है तब वह संतो, योगियों व महात्माओं के पास ही जाती है, भारतवृंद तो इसे लंबे समय से अनुसरण करते आये हैं। दिनकर जी का विवेक उत्तम बना रहा तभी तो यह लिखते हैं –

“मानवता का इतिहास, युद्ध के दावानल से छला हुआ,
मानवता का इतिहास, मनुज की प्रखर बुद्धि से छला हुआ।
मानवता का इतिहास, मनुज की मेधा से घबराता सा,
मानवता का इतिहास, ज्ञान पर विस्मय-चिह्न बनाता सा।
मानवता का इतिहास विकल, हांफता हुआ, लहू-लुहान,
दौड़ा तुझसे मांगता हुआ, बापू! दुःखों से सपदि त्राण।”

जो करें पाप शशि-सूर्य, उन्हें टोको रे

‘गांधी की मृत्यु पर अघटन घटना, क्या समाधान’ में वे साहसपूर्ण लिखते हैं –

“कहने में जीभ सिहरती है, मूर्च्छित हो जाती कलम, हाय, हिन्दू ही था वह हत्यारा।’ अन्यत्र कहते हैं, ‘गोली से डाला मार उन्हें, उन्मत्त एक हत्यारे ने, जो हिन्दू था।’ एक स्थान पर फिर से पूछते हैं, ‘हिन्दू भी करने लगे अगर ऐसा अनर्थ, तो शेष रहा जर्जर भू का भवितव्य कौन?”

‘परशुराम की प्रतिक्षा’ में भारतवृंद को जागृत करने वे हेतु लिखते हैं-

“हो जहाँ कहीं भी अनय, उसे रोको रे!
जो करें पाप शशि-सूर्य, उन्हें टोको रे!”

श्रद्धेय दिनकर जी की आज जयंती है उन्हें आत्मा से प्रणाम हमें मार्गदर्शित करने हेतु साधुवाद। अतीत में कही गई बातें आज भी सत्य व प्रासंगिक हैं। समय अपनी लम्बी यात्रा में सब कुछ संकलित करता जाता है, रह जाता है तो केवल कर्म! कल्याणकारी क्रियाशीलता हेतु दिनकर जी लिखते हैं-

“बापू ने राह बना डाली, चलना चाहे संसार चले,
डगमग होते हों पांव अगर तो पकड़ प्रेम का तार चले।”

अभिषेक भारत : एसोसिएट एडिटर

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