logo
अपने बूढ़े कबूतर का दिया ज्ञान भूलकर कांग्रेस के जाल में फंसने को आतुर हैं भाजपाई कबूतर!
 

क्या यह महज संयोग है कि इधर राहुल गांधी ने हिंदू और हिंदुत्ववाद की एक अजब जलेबी बनाई, जिसमें हिंदू (आगे से) और हिंदुत्ववादी (पीछे से) दोनों को छुरा मारने वाला बताया; और उधर ढेर सारे हिंदू धर्म के नाम पर मरने-मारने, मास किलिंग करने और गाली-गलौज करते हुए दिखाई देने लगे?

कथित संघी-भाजपाई साम्प्रदायिक उन्माद के इस दौर में भी आज तक किसी ने तो यह कभी नहीं कहा था कि 20  करोड़ मुसलमानों को मार डालेंगे? लेकिन राहुल गांधी द्वारा हिंदुओं को छुरा-मारक के तौर पर चिह्नित किये जाने के फौरन बाद ये कौन से कथित हिंदू, संत, संन्यासी, बाबा, धर्मगुरु हैं, जो फौरन ही मुसलमानों के संहार की बात करने लगे?

फिर कई लोग ऐसे भी ज़रूर थे, जो गांधी की भी आलोचनाएं करते थे, लेकिन आज तक किसी ने उन्हें गाली तो नहीं दी थी! यहां तक कि जिसने उन्हें गोली मार दी, उसने भी उन्हें गाली नहीं दी, प्रणाम ही किया। फिर ये कौन-से हिंदू हैं, जो राहुल गांधी के छुरा-मारक बयान के बाद पहली बार गांधी को भी गालियां देते नज़र आ गए?

दरअसल, कांग्रेस ने एक वक़्त में खेल खेला था इस्लामिक आतंकवाद के समानांतर भगवा आतंकवाद की थ्योरी स्थापित करने का। इसके बाद ही चिदंबरम से लेकर अंतुले तक और दिग्विजय से लेकर ख़ुर्शीद तक इस थ्योरी को सत्य सिद्ध करने में जुट गए। इस चक्कर में बेगुनाहों को आतंकवादी और आतंकवादियों को बेगुनाह साबित करने से भी गुरेज नहीं किया गया।
अब एंटोनी कमेटी की रिपोर्ट और उसके बाद की परिस्थितियों में जब यह सत्य आईने की तरह साफ हो गया कि कांग्रेस के व्यवहार से हिंदुओं की भावनाएं अत्यंत आहत हैं, तो राहुल गांधी ने खुद को हिंदू साबित करने के लिए उन तमाम हिंदुओं को कथित हिंदुत्ववादी साबित करने का एक खेल खेला है, जो उनसे सहमत नहीं हैं। अब इसके लिए उन्हें इस कथित हिंदुत्ववादी जमात को "पीछे से छाती में छुरा मारने वाला" साबित करना है।

इसी राजनीतिक पृष्ठभूमि में हरिद्वार और रायपुर दो जगहों पर कथित धर्म संसदों का आयोजन होता है और दोनों जगहों पर वह होता है, जो आज तक हिंदुओं की किसी भी धर्म संसद में कभी नहीं हुआ। और यह सब कई कांग्रेसी आयोजकों के आयोजन से होता है। धर्म का नाम लेकर चारा कुछ भाजपाइयों और संघियों को भी फेंक दिया जाता है कि धर्म की रक्षा करनी है, इसलिए तुम लोग भी आओ।

मज़े की बात है कि कांग्रेस को भी भाजपाइयों की कमज़ोरी का पता चल चुका है, जैसे भाजपा को भी कांग्रेस की कमज़ोर नस का भली-भांति ज्ञान है। हिंदू, गोडसे, गांधी इत्यादि का चारा फेंक दो, तो अनेक भाजपाई चिरैये चहचहाते हुए उसमें आसानी से फंस ही जाते हैं। ...तो लोकल लेवल के अनेक मूढ़ भाजपाई इन कार्यक्रमों में बिना समझे-बूझे न केवल शरीक हो गए, बल्कि हिंदू, गांधी, गोडसे इत्यादि के ललचौवे चारे देखकर ये बेचारे अपनी चोंच भी बंद नहीं कर पा रहे हैं। कहीं का मंतरी, कहीं का संतरी – अनेक लोग चोंच फाड़कर चांव-चांव करने में लगे हैं।

मज़ेदार यह भी है कि गांधी-नेहरू को पैगम्बर मानकर भारत में भी पाकिस्तान जैसा ईशनिंदा कानून बनाये जाने की पैरोकार प्रतीत होने वाली कांग्रेस खुद भी सोशल मीडिया पर अपने लोगों से गांधी को खूब गालियां दिलवा रही है और गोडसे को महान कहलवा रही है, ताकि चारों तरफ से हिंदुओं के छुरा-मारक होने का इतना शोर मचे कि राहुल गांधी की थ्योरी स्थापित हो जाए; जैसे भगवा आतंकवाद के शोर में एक दौर में अनेक हिंदू भी यह मानने ही लगे थे कि हां, भगवा आतंकवाद भी आ गया है। 

बड़ी संख्या में भाजपाई-संघी सोशल मीडिया यूजर भी कांग्रेस के इस खेल में फंस गए हैं और कांग्रेसी ट्रोलरों के साथ ही वे भी गांधी को गरियाने और गोडसे का गुणगान करने में जुटे पड़े हैं।
शायद दोनों पक्षों को लग रहा हो कि यूपी-उत्तराखंड के चुनावों में यह काम आएगा। सच भी है कि किसी न किसी के काम तो यह ज़रूर आएगा, क्योंकि चुनावों में यही सब काम आता है, लेकिन हिंदुओं की छवि क्या बन रही है? वास्तव में वे जो हैं, या जो राहुल गांधी साबित करना चाह रहे हैं?

गौर करने की बात यह भी है कि एक तरफ जहां आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत पिछले तीन-चार साल से मुखर होकर मुसलमानों को हिंदुओं से अभिन्न, समान डीएनए वाला और वापस गले लगाए जाने का पात्र बता रहे हैं, लोगों को समझा रहे हैं कि मुसलमानों के बिना अब हिंदुस्तान की संरचना संभव नहीं है, वहीं राहुल गांधी ने ऐसा चारा फेंका कि उनके अनेक कबूतर उनका दिया ज्ञान भूलकर गांधी, गोडसे, हिंदू रक्षा के जाल में फंसने को बेताब हो उठे हैं।
बचपन में पढ़ी पंचतंत्र की एक कहानी याद आ रही है। बूढ़ा कबूतर समझाता है– "शिकारी आएगा, जाल बिछाएगा, दाने डालेगा, पर दाने के लोभ में तुम उसमें फंसना नहीं।" सारे बच्चे और जवान कबूतर मुंडियां हिलाते हैं कि हां, हम समझ गए हैं। लेकिन जैसे ही शिकारी आता है और दाने डालता है, सारे कबूतर बूढ़े कबूतर का दिया हुआ ज्ञान भूलकर जाल की परवाह न करते हुए दाने चुगने को आतुर हो उठते हैं।

अंत में, अपनी ही कही एक पुरानी बात फिर से याद दिलाऊंगा कि लोकतंत्र के तो केवल चार स्तंभ हैं, लेकिन कांग्रेस के चालीस स्तंभ हैं। न जाने कौन कब कहाँ कैसा बवाल खड़ा कर दे! 
अभी कांग्रेस ने इन चालीस स्तंभों में से अपने उन स्तंभों का इस्तेमाल किया है, जो भगवा रंग में रंगे हुए और भाजपाइयों-संघियों के खून में हिदुत्व के हिलकोरे पैदा करने में कामयाब दिखाई दे रहे हैं।  

— अभिरंजन कुमार ( वरिष्ठ पत्रकार )

Hindi News ( हिंदी समाचार ) के अपडेट के लिए हमें गूगल न्यूज़ पर फॉलो करें व टेलीग्राम ग्रुप को जॉइन करने के लिए  यहां क्लिक करें।