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समीक्षा : फिल्म 83 फ्लॉप क्यों हुई ?

फिल्म 83 में क्रिकेट के अलावा इतना कुछ है कि जिससे मन में ये सवाल तो उठता है कि कबीर खान का मकसद वर्ल्ड कप की जीत पर फिल्म बनाना था या फिर इसके बहाने किसी खास एजेंडे को प्रमोट करना..खैर पैसा उनका..फिल्म उनकी..

 

तो आखिरकार भारतीय क्रिकेट की सबसे बड़ी जीत पर बनी फिल्म फ्लॉप हो गई..वैसे ईमानदारी से कहूं मैंने जब फिल्म 83 का ट्रेलर देखा था..उसी दिन लग गया था कि इसका चलना मुश्किल है..क्योंकि ट्रेलर देखकर ही लग रहा था कि एक कपिल देव को छोड़कर बाकी सारे खिलाड़ी और इवेंट्स का कैरिकेचर बना दिया गया है..कपिल देव को छोड़कर सारे खिलाड़ी जोकर लग रहे थे..जिनसे खेल कम..कॉमेडी ज्यादा करवाने की कोशिश की गई है..अपनी टीम के ही नहीं बाकी टीमों के खिलाड़ियों (खासकर वेस्टइंडीज) का भी कैरिकेचर बनाया गया है..लेकिन फिल्म के बारे में अपनी आशंकाएं पहले इसलिए ज़ाहिर नहीं कि क्योंकि एक मूवी बनाने में बहुत मेहनत लगती है..2-3 साल का खून-पसीना लगा होता है..इसलिए निगेटिविटी फैलाने से बचना चाहिए..और वैसे भी इस फिल्म का हीरो मौजूदा दौर में मेरा फैवरेट रणवीर सिंह था और उसने अपने किरदार में जान फूंक दी..अब उसके लिए भी दुख हो रहा है कि मेहनत का अपेक्षित नतीजा नहीं मिला..

खैर अब आते हैं इस सवाल पर कि फिल्म क्यों नहीं चली ? पहली और मुख्य वजह तो यही है कि फिल्म को खिचड़ी बना दिया गया है..कबीर खान इस बात को लेकर क्लियर ही नहीं हैं कि वो दिखाना क्या चाहते हैं ? कपिल देव की कहानी या फिर टीम की जीत ? इस मामले में एक बेस्ट एक्जांपल धोनी पर बनी फिल्म है..जिसे क्रिटिकल और कमर्शियल दोनों तरह की सफलता मिली..वो भी सुशांत सिंह राजपूत के लीड रोल में होने के बावजूद..जो स्टारडम में रणवीर सिंह से कम ही हैं..लेकिन धोनी की फिल्म को लेकर फिल्मकार क्लियर था कि उसे धोनी का संघर्ष...उसकी क्रिकेटिंग यात्रा दिखानी है...लेकिन फिल्म 83 में कबीर खान ने कई इश्यूज का घालमेल कर दिया है...कपिल देव को भी दिखाना है..क्रिकेट भी दिखाना है..रंगभेद..नस्लवाद..भारत-पाकिस्तान...हिंदू-मुस्लिम का एजेंडा भी चलाना है..

क्या आप यकीन करेंगे कि फिल्म 83 में वेस्टइंडीज के खिलाड़ियों को भी बेड लाइट में दिखाया गया है..मतलब हद है...वेस्टइंडीज हमेशा से दुनियाभर के क्रिकेट फैंस की फैवरेट टीम रही है..अपने देश की टीम को छोड़ दिया जाए तो वेस्टइंडीज हमेशा से सेकेंड फैवरेट रही है...लेकिन 83 में भारतीय टीम की हीरोगीरी दिखाने के लिए वेस्टइंडीज की टीम का हास्यास्पद और फूहड़ चित्रण किया गया है..

अब आते हैं इस फिल्म के बहाने कबीर खान के असली एजेंडे पर..फिल्म में दिखाया गया है कि साल 1983 में भारत-पाकिस्तान के बीच क्रॉस बॉर्डर फायरिंग होती है..जबकि अगर ऑफिशियल तौर पर देखें तो भारत और पाकिस्तान के बीच कश्मीर में क्रॉस बॉर्डर फायरिंग की घटनाएं 1989 के बाद शुरू हुईं..आप गूगल में चेक कर सकते हैं..अब आप कहेंगे कि फिल्ममेकर को फिल्म इंट्रेस्टिंग बनाने के लिए कुछ आर्टिस्टिक लिबर्टीज लेने का हक है..तो इसके जवाब में ये कहूंगा कि पहले तो 83 वर्ल्ड कप की जीत इतनी बड़ी थी कि इसमें काल्पनिक घटनाएं घुसेड़ने की जरूरत नहीं थी..लेकिन आपने इसमें काल्पनिक घटनाएं डालीं और वो भी भारत-पाकिस्तान को लेकर...और पक्ष भी पाकिस्तान का दिखाया है..फायरिंग के दौरान भारतीय सेना मुंहतोड़ जवाब देने की बजाए बंकर में बैठकर रेडियो पर कॉमेंट्री सुनती है..फाइनल के दिन पाकिस्तानी सेना का अफसर फोन करके भारतीय सेना पर एहसान करता है औऱ कहता है कि आज फाइनल है...आप आराम से कॉमेंट्री सुनो..हम फायरिंग नहीं करेंगे..यही नहीं वर्ल्ड कप जीतने के बाद इमरान खान को कपिल देव को खुले दिल से बधाई देते हुए दिखाया गया है..ये वही इमरान खान हैं जिन्होंने पाकिस्तानी क्रिकेट टीम के कप्तान के तौर पर कहा था कि कश्मीर का फैसला क्रिकेट मैदान में होना चाहिए..जो मैच जीतेगा..कश्मीर उसका...लेकिन कबीर खान की 83 में पाकिस्तानी सेना और इमरान दोनों भलेमानस हैं..

अब आते हैं फिल्म में ली गई एक और काल्पनिक छूट में...भारत के किसी इलाके में हिंदू-मुस्लिम दंगे हो रहे हैं..कर्फ्यू लगा है..सुरक्षा बलों की गश्त है..एक गरीब मुसलमान के घर पर टीवी है..जिसका एंटीना खराब हो रखा है..(गौर करिए..गरीब मुसलमान के घर पर टीवी है..वो भी 1983 में..उस ज़माने ठीक-ठाक पैसे वालों के घर भी टीवी नहीं होती थी..कुछ-कुछ उसी तरह जैसे फिल्म शोले में ठाकुर के घर में तो लालटेन था..लेकिन अब्दुल चाचा की मस्जिद में लाउडस्पीकर लगा था..जो बिजली या बैटरी से ही चलता होगा)..

खैर गरीब मुसलमान के घर के टीवी का एंटिना खराब था..और मैच के दिन किसी तरह छुप-छुपाकर घर का जवान लड़का छत पर जाता है..एंटीना ठीक करता है..पूरा परिवार मैच देखता है..सुरक्षा बल के जवान भी मैच का स्कोर पूछने इन्हीं के घर आते हैं..और वर्ल्ड कप जीतने के बाद ये मुस्लिम परिवार जमकर जश्न मनाता है..तिरंगा लहराता है..आतिशबाजी करता है..जीत पर तिरंगा लहराने और आतिशबाजी करने में कुछ हैरानी की बात नहीं है..लेकिन एक खास पक्ष को ही दंगे का पीड़ित दिखाना और फिर उसी पक्ष का देश की जीत पर खास तरह का मानवीय चित्रण ये सवाल तो खड़े करता है कि फिल्मकार की मंशा क्या थी...

कुल मिलाकर फिल्म 83 में क्रिकेट के अलावा इतना कुछ है कि जिससे मन में ये सवाल तो उठता है कि कबीर खान का मकसद वर्ल्ड कप की जीत पर फिल्म बनाना था या फिर इसके बहाने किसी खास एजेंडे को प्रमोट करना..खैर पैसा उनका..फिल्म उनकी..लेकिन भारतीय क्रिकेट के सबसे सुनहरे पल को लेकर बनी फिल्म इससे बेहतर डिजर्व करती थी..

— दीपक जोशी ( वरिष्ठ पत्रकार )

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