पुस्तक समीक्षा, काव्य संग्रह – कुछ पृष्ठ अभी तक खाली हैं

by News Desk
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मौत खड़ी है द्वारे पर
तब जीने का मन करता है
कुछ पृष्ठ अभी तक खाली हैं
कुछ लिखने को मन करता है

जिंदगी के खाली पृष्ठ पर कुछ शब्द उकेरने की इच्छा ही किसी व्यक्ति को रचनाकार बनाती है, कुछ ऐसे शब्द जो जीवित रहें उसके बाद भी। इस कहने और लिखने की जद्दोजहद का नाम है ‘कुछ पृष्ठ अभी तक खाली है’।

ललिता नारायणी जी अपने अंतर्मन में बह रही स्याही से शब्दों को रंग कर काग़ज़ पर इस प्रकार उतरती हैं कि लगता है कि वो अपनी नहीं, सभी रचनाकारों की बात कर रही हैं।

कितना है कठिन समझ पाना
अनकहे शब्द की भाषा का
अनसुने शब्द को कह पाना
अनपढेे ग्रंथ को लिख पाना

मिल गए हैं शून्य को कीमती कुछ अंक
बोलो क्या लिखूं?

हो गए हैं सब फूल ही गगुलकंद
बोलो क्या लिखूं?

लेकिन साथ ही कुछ पृष्ठ रंग कर खुद को अहंकार में महाकवि समझने से बचने की सलाह देती हैं

ढाई आखर लिखकर खुद को
कालिदास समझ बैठे
तरु की शाखा काट काटकर
शीतल छांव गवाँ बैठे

आज के समय में जब कन्या रूप में जन्म लेने के साथ ही सामाजिक भेद भाव प्रारंभ हो जाता है और बड़ी होने के साथ ही हर लड़की को गुजारना पड़ता है डर से, इन परिस्थितियों को बखूबी बयां करती हैं ललिता जी की पंक्तियां

नन्ही मुट्ठी पांव दबाती
जुएं खोजती पीठ खुजाती
सर सहलाती तेल लगाती
छोटे-छोटे कौर खिलाती
जबरन दुनिया में आने का
अपना पूरा फर्ज निभाती

बालाओं को निगल रहे जो
उनके जलते शमशान कहां हैं?

हर गली में कर रहा है
कंस वध एक बालिका का
तुम में से किसी एक को
कृष्ण तो बनना पड़ेगा

एक स्त्री के मन और उसकी व्यथा, विरह के दर्द और जीवन से उसकी जादोजेहद की कहानी कहती हैं उनकी ये पंक्तियां

परिणीता का तिरस्कार कर
गणिका सजती कंगन में

भर नैनो में काजल पत्नी
टूटा दर्पण अक्स निहारे
टूटी कंघी के दांतों से
लंबे काले केश संवारे
भरे रूप का करे आकलन
होठों पर मुस्कान बिखेरे

कितने रूप सजाने होंगे
दर्पण को बहलाने में

प्रेम और उम्मीद ज़िंदगी की धुरी है जिस पर सारी दुनिया टिकी है। उस पर ललिता जी कहती हैं

तुम सरहद पर दिया जलाते
ड्योढ़ी पर उजियारा होता

यूँ बारिश की चोटों पर से
घर खंडहर में बदल गया है
जिस छत के नीचे तुम रहती थी
उस छत को अभी बचा रखा है
उन टूटी हुई दीवारों में
अब कुछ भी साबुत नहीं बचा
एक झरोखा यादों का है
मैंने उसे सजा रखा है

दुनिया में अच्छा बुरा सब घटता रहता है परंतु जब कोई चीज दिल को छू जाती है तो वह कागज पर उतर आती है

देखने से लग रहा है
भूमि का जो भाग समतल
दरसल उसके पटल पर
है भयानक सा रसातल

दुख के झोले भर जाते हैं
सुख कजरौटा में रहता है

दुख के दस्तावेज नहीं
होते खुशियों के खाते हैं

सर्पराज से घूमा करते
सुधा लिए आलिंगन में
गरल भरी फुंकारी छोड़ें
लिपटे रहते चंदन में

समाज और विभिन्न सामाजिक स्थिति पर ललिता जी की कविताएँ कटाक्ष करती हैं। ललिता जी की ये पंक्तियां हमें समाज के कई अछुये पहलुओं से रूबरू करवाती हैं

बच्चों को गिरवी रख लेते
फिर भी बड़े महान हुए

पाठ पढ़ाते आजादी का
घर में रहते कठपुतली

देवों के विग्रह बिक जाते
मदिरालय के आंगन में

कुछ अपने ही ले गए थे
मदिरालय की चौखट पर
सांसो की अंतिम बेला में
क्या देवालय पहुंचाओगे

जलाओ दीप मंदिर में
चढ़ाओ चूड़ियां बिंदी
किसी वैधव्य का भी तो
कोई शृंगार करवाओ

इन सबके अलावा ललिता नारायणी जी की कविताओं में से मेरी कुछ पसंदीदा पंक्तियां साझा कर रही हूँ

एक नीड़ में कई घरों का
मेल कराती गौरैया

कोई तो चिता बनी होगी
गम को जीवित दफनाने की
ये सत्य जानने की कोशिश ने भी
कोशिश की भरमाने की

बर्फीले अंगारों पर चल
अपने पांव गवाँ बैठे
शहर की मीठी मुकरियों में
अपना गांव गवाँ बैठे

ऐसी अद्भुत सी पंक्तियां रचने वाली कवयित्री श्रीमती ललिता नारायणी जी को इस खूबसूरत काव्य संग्रह ‘कुछ पृष्ठ अभी तक खाली हैं’ के लिए बहुत-बहुत शुभकामनाएं।

कवयित्री – ललिता नारायणी
समीक्षक- डॉ. मोनिका शर्मा

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