युवा कवि प्रवीण कुमार मिश्र “प्रीत” की प्रथम काव्य संग्रह “प्रीत तेरे संग” भावनाओं से परिपूर्ण काव्य संग्रह है जो किसी भी काव्य प्रेमी को अपने काव्याकर्षण में बांध सकने में सक्षम है। प्रवीण की काव्य भाषा में आपको शुद्ध हिन्दी काव्य के साथ ही हिन्दी- उर्दू मिश्रित काव्य का भी समावेश मिलेगा जो उनकी काव्य रचना में चार चांँद लगाते हैं। भावना,संवेदना के साथ ही भाषा पर इनकी मजबूत पकड़ इनके काव्य संग्रह का आकर्षण है। इनकी कविताओं में प्रेम, विरह और सामाजिक परिस्थितियों का उल्लेख किया गया है।
प्रेम में असमंजस की परिस्थिति को व्यक्त करती पंक्तियां निम्न हैं-


मधुर है तेरे मधुराधर
निर्झर जल जैसे बहे
यह मन की सम्मति सुने
प्रीत है तोसे क्या कहें।
वर्तमान समय में रिश्तों की यथार्थ स्थिति को व्यक्त करती पंक्तियां निम्न है जो हृदय को छू जाती हैं-

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कहने को तो मेरे
अपने बहुत हैं
न जाने वक्त पर
कौन काम आएगा

तुम रेत सी मुट्ठी में थे
हाथों से फिसल जाओगे
करके जज़्बात का सौदा
पल भर में बदल जाओगे।

कोई बात नहीं समझता
कोई हालात नहीं समझता
अक्सर करीब रहने वाला ही
जज़्बात नहीं समझता।
एक प्रेमी की इच्छा को व्यक्त करती कवि की ये पंक्तियां आपको श्रृंगार रस में भिगो देंगी-


कैद कर लूं उन लम्हों को
जिनमें तुम्हारा साथ हो
तुम रहो नज़दीक चाहे
हाथों में ना हाथ हो
गुज़र ना जाये कहीं ये
चांदनी जो रात है
नजरों से कुछ बयां कर दो
पल दो पल की बात है।


ऐ शाम!
काश तेरा दीदार हो जाये
तू कितनी खूबसूरत है
तुझे देखूं और प्यार हो जाये
कवि प्रवीण ने एक परिंदा होने की ख्वाहिश को बहुत बखूबी से निम्न पंक्तियों में व्यक्त किया है-
पेट हमें सिर्फ भरना होता
हाय हाय न करना होता
तूफ़ानों में हम उड़ जाते
ज़िन्दा बचते या मर जाते
मर जाने को लेकर खुद के
ना इस कदर शर्मिंदा होता
काश! मैं एक परिंदा होता।।


क्षेत्रीय भाषा का पुट लिए कविता शीर्षक”काहे गरमाए जा रहें हैं” हर कविता से भिन्न अपनी अलग ही छाप छोड़ती है और मुस्कुराने पर विवश कर देती है-


कब से हम सुन रहे हैं
आप चिल्लाए जा रहे हैं
जरा होश में रहिए
काहे गरमाए जा रहे हैं
कानों में लकड़ी और जीभ पर
कील घुसाए जा रहे हैं
वेदना है आपकी नज़रों में
काहे गरमाए जा रहे हैं
प्रवीण कुमार मिश्र “प्रीत”की कविताओं में उनके कोमल मन में उठती भावना, संवेदना व्यथा का दर्शन होता है। “पूत के पांव पालने में दिखाई दे जाते हैं” ये उक्ति उन पर सटीक बैठती है।इतनी कम उम्र में उनके लेखन में जो परिपक्वता है वो निश्चित ही भविष्य में और निखरेगी। मैं उनके उज्जवल भविष्य की कामना करती हूं। द्वितीय काव्य संग्रह जल्दी ही प्रकाशित हो….
बहुत बहुत शुभकामनाएं..

समीक्षक- अलंकृता राय