क्या सिर्फ़ दोष सत्ता पक्ष पर डालकर हम अपने कर्तव्य बोध से मुक्त हो सकते हैं ?

by News Desk
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जब भी मैं, दिन प्रतिदिन लोकतांत्रिक ढाँचे को ध्वस्त होते देखता हूँ तो सोचता हूँ कि आख़िर हमसे चूक कहाँ हुई ?
क्या सिर्फ़ दोष सत्ता पक्ष पर डालकर हम अपने कर्तव्य बोध से मुक्त हो सकते हैं!? जवाब है, नहीं! दोषी हम सब है..एक स्वतंत्र मुल्क़ के एक स्वतंत्र नागरिक होने का कर्तव्य हमने निर्वाह नहीं किया…!

जब भी दोषियों की लिस्ट बनाई जाएगी, तब विपक्ष, सो कॉल्ड लिबरल ज़मात, दोषियों की लिस्ट में सबसे ऊपर होंगे!

जहाँ तक, 2014 के आम चुनाव का प्रश्न है…देश में भ्रष्टाचार, गिरती अर्थव्यवस्था, बेरोजगारी और बढ़ती महंगाई से देश नाराज़ था। देश परिवर्तन चाहता था…परिवर्तन हुआ भी लेक़िन ध्यान रहे कि जिसे मोदी सुनामी कहा गया वो दअरसल, एक सत्ता विरोधी लहर थी। देश ने कईं वर्षों के बाद एक पूर्ण बहुमत की सरकार को सत्ता सौंपी थी लेक़िन अग़र हम मत प्रतिशत देखें तो वो लगभग 30 से 33 के बीच था।

कहने का मतलब 70 प्रतिशत लोगों ने भाजपा और मोदी जी को नहीं चुना था। खैर, हमारे निर्वाचन पद्धति को देखें तो यहाँ मत प्रतिशत का कोई महत्व नहीं है बस 272 के जादुई आँकड़ा पार करना होता है। और भाजपा ने ये जादुई आँकड़ा सिर्फ़ हिंदी पट्टी के क्षेत्रों से हाँसिल किया था।

मोदी कैसे शक्तिशाली बनकर उभरे

बात करते हैं दोषियों की, कि आख़िर कैसे विपक्ष और लिबरल ज़मात ने भाजपा और मोदी को शक्तिशाली बनाया…सबसे पहले विपक्ष, मोदी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार होने पर ही विरोध करना शुरू कर दिया और विपक्ष का साथ इन लिबरल जमातों ने भी ख़ूब दिया…मुझे याद है मोदी के ख़िलाफ़ पूरे देश में एक हस्ताक्षर अभियान चलाया गया था | जिनमें विभिन्न क्षेत्र के तमाम बुद्धिजीवी वर्ग के लोग शामिल थे…जिस तरह से बनारस में मोदी को घेरा गया वो मेरी नज़र में आत्मघाती कदम था पूरे विपक्ष और लिबरल ज़मात के लिए….!

मोदी सरकार नई नई बनी थी लेक़िन इन लोगों ने सरकार को वक़्त देने की बजाय नित्य नए हमले करना जारी रखा…

जनता की नज़र में इन लोगों ने कभी देश का साथ दिया ही नहीं


सबसे पहले असहिष्णुता वाला नाटक किया गया, उसी समय आमिर खान को इतना डर लगने लगा था कि देश छोड़ना चाहते थे! अवार्ड वापसी वाला खेल भी हुआ…जेएनयू में जो भी हुआ वह मीडिया में था..आप उमर खालिद के लगाए नारे “भारत तेरे टुकड़े होंगे” के समर्थन में खड़े हो जाते हैं…कभी, सेना पर पत्थर फेंकने वालों की वक़ालत करते नज़र आते हैं। लश्कर कमांडर बुरहान वानी को जब भारतीय सेना के द्वारा मारा गया तब बुरहान वानी के लिए आपकी संवेदनाएँ जाग उठती है। फ़िर, आप मुग़ालते में रहते हैं कि देश आपको मान देगा..! जी नहीं.. देश आपको खारिज़ कर देगा!

इसमें कहीं से कोई दो मत नहीं है कि आज देश के लोकतांत्रिक ढाँचे को ध्वस्त कर दिया गया है लेक़िन गुनहगार सिर्फ़ भाजपा ही नहीं है, आप भी हैं…आपका ये सेलेक्टिवनेस जिम्मेवार है…आप भारत जैसे मुल्क़ में, जहाँ आस्था एक ईलाज़ का काम करती है, जहाँ लोग भगवान को इसलिए पूजते हैं भगवान सब ठीक कर देंगे..वहाँ, आप भगवान को गाली देते हैं…बहुसंख्यक समुदाय की आस्था का मज़ाक़ उड़ाते हैं….

यहाँ, तमाम तरह की बातें की जाती है लेक़िन अभी हाल में ही हुए बंगलुरु की घटना पर कितने बुद्धिजीवियों ने खेद जताया…? दअरसल, वो कहावत है न कि आप जो बोते हैं वही फ़सल आपके नसीब में आती है…

अब भी वक़्त है, देश के साथ रहिये, इलेक्शन जीतने के बदले जनता का दिल जीतने की कोशिश कीजिये…जनता मूर्ख नहीं है। जब जनता को लगने लगेगा कि भाजपा गलत कर रही है तो वो ख़ुद सत्ता आपको सौंप देगी….फ़िलहाल जनता की नज़रों में मोदी अभी हीरो की तरह हैं और मोदी को हीरो आपने बनाया है।

दीपक सिंह

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