जब भी मैं सावरकर और गांधी के बारे में सोचता हूं तो महसूस करता हूं कि नैरेटिव में कितनी ताकत होती है। कई कमियों के बावजूद गांधी , महात्मा बन गए और कई अच्छाइयों के बावजूद सावरकर के पूरे जीवन का आंकलन एक माफीनामे का आधार पर कर दिया गया।

गांधी की सारी बुराइयों को महात्मत्व की पदवी तले छिपा दिया गया और सावरकर के माफीनामे को विचलन मानने की बजाए उनका अंतिम सत्य मान लिया गया। मैं बहुत डिटेल में तो नहीं जाऊंगा क्योंकि ये पोस्ट इतिहास की किताब नहीं है। लेकिन कुछ चीजों पर गौर करिए,
गांधी भी लॉ पढ़ने ब्रिटेन गए, सावरकर भी कानून की पढ़ाई करने ब्रिटेन गए। लेकिन गांधी के मन में ब्रिटिश शासन के खिलाफ गुस्सा तब पैदा हुआ, जब उन्हें ट्रेन के फर्स्ट क्लास अपार्टमेंट से बाहर फेंका गया। यानी गांधी की आंखें तब खुली जब उनका निजी अपमान हुआ। लेकिन सावरकर ने कानून की पढ़ाई के दौरान ही ब्रिटिश शासन के खिलाफ बगावत की अलख जगानी शुरू कर दी थी।

कब अरेस्ट हुए सावरकर

गांधी की तरह सावरकर को कभी निजी अपमान के पलों से गुजरना पड़ा हो। इसका जिक्र इतिहास में कहीं नहीं मिलता। यानी गांधी अपने निजी अपमान के बाद अंग्रेज शासन के खिलाफ हुए जबकि सावरकर शुरू से ही ब्रिटिश शासन के खिलाफ थे। 1910 में ही सावरकर को लंदन में अरेस्ट किया गया। बाद में भारत आने पर उन्हें कालापानी की डबल सज़ा दी गई।

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यानी सावरकर ने कुछ तो ऐसा किया, जिसे ब्रिटिश सरकार ने अपने खिलाफ माना और कालापानी की सज़ा दी, लेकिन सावरकर की सारी बातें भुलाकर उन्हें माफीनामे तक ही सीमित कर दिया गया और जो गर्मी के डर से सड़क पर विरोध करने तक नहीं उतरते ऐसे आर्मचेयर क्रिटिक्स ने सावरकर को कायर सावरकर घोषित कर दिया। अगर सावरकर के माफीनामे को सच भी मान लिया जाए तो मुझे नहीं पता कि क्या इससे देश को कितना नुकसान पहुंचा।

आजादी में गाँधी की भूमिका

अब आते हैं गांधी पर…आज़ादी के आंदोलन में गांधी का क्या रोल था? सब जानते हैं..इसलिए उसपर लिखने की जरूरत नहीं है | इसलिए उनके चंद स्याह पहलुओं का ही जिक्र करना चाहूंगा क्योंकि सबका जिक्र किया जाएगा तो पोस्ट लंबी हो जाएगी।

कम से कम मुझे तो गांधी के जीवन की सबसे घृणित चीज लगती है, वो हैं ब्रहचर्य के साथ उनके प्रयोग। इनके बारे में पढ़कर ही शरीर में अजीब तरह की जिगुप्सा पैदा हो जाती है। ये सोचकर ही घिन आती है कि कोई ऐसा कैसे कर सकता है। जो महिलाएं ब्रहचर्य के साथ प्रयोग में गांधी के करीब आईं। उनमें कुछ पागल हो गईं, कुछ पागल होकर मर गईं। मनु बेन के बारे में खुद पढ़िएगा।

व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी में नहीं बल्कि गूगल में खुद सर्च करके पढ़िएगा। किस तरह गांधी के ही करीब रहने वाले लोगों ने ब्रहचर्य के साथ उनके प्रयोगों का विरोध किया लेकिन फिर भी गांधी अपने फैसले पर डटे रहे..ये सब वेल डॉक्यूमेंटेड है।

भगत सिंह को फांसी की सज़ा और गोलमेज सम्मेल में वॉयसराय इरविन के साथ गांधी के समझौते के बारे में भी पढ़िएगा। गांधी जी के रोल पर सुभाष चंद्र बोस समेत उस समय के तमाम नेताओं का रिएक्शन पढ़िएगा। बस इतना समझ लीजिए कि भगत सिंह की फांसी की सज़ा माफ करने के लिए गांधी जी ने वैसे प्रयास नहीं किए, जैसे देश की जनता और कई नेता चाहते थे।

My Way or High Way

सुभाष चंद्र बोस से याद आया, 1939 में कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव हुआ। बोस ने गांधी के उम्मीदवार डॉक्टर पट्टाभि सीतारामैया को चुनाव लड़ाया | क्योंकि बोस की लोकप्रियता को देखते हुए नेहरू और अब्दुल कलाम आज़ाद ने चुनाव लड़ने से मना कर दिया था। गांधी की तमाम कोशिशों के बावजूद नेताजी बोस चुनाव जीत गए तो गांधी जी रूठकर वर्धा चले गए। बाद में गांधी जी का दिल रखने के लिए बोस ने इस्तीफा दे दिया। My Way or High Way की गांधी जी की इस तानाशाही प्रवृति को भी इग्नोर कर दिया गया।

चौराचौरी हत्याकांड के बाद भी जिस तरह गांधी ने असहयोग आंदोलन एकतरफा तौर पर वापस लिया, वो भी उनकी तानाशाही प्रवृति का ही द्योतक था। कुल मिलाकर फैसले लेने के मामले में गांधी जज, ज्यूरी और एक्जीक्यूशनर की भूमिका में होते थे। सामूहिक फैसलों पर उनका यकीन नहीं था। खुद ही फैसले लेते थे। यही वजह है कि जब गांधी कमज़ोर हुए तो उनकी बात ना नेहरू ने सुनी, ना जिन्ना ने। जिन्ना को दरकिनार कर नेहरू को प्रमोट करने का फैसला भी गांधी का थी। जो अलग पाकिस्तान की नींव की एक वजह बना।

गाँधी के प्रयोग

ब्रहचर्य के साथ प्रयोग के अलावा गांधी जी का जो एक सबसे विवादित पक्ष था, वो था मुस्लिम तुष्टिकरण। ये कहा जा सकता है कि भारत में मुस्लिम अपीजमेंट के जनक और पितामाह गांधी ही थे। भारत के इतिहास के सबसे भीषण नरसंहारों में से एक केरल के मोपला विद्रोह के वक्त जब हज़ारों हिदुओं को काट डाला गया था तब इस पर गांधी का क्या रवैया था ? आप यकीन नहीं करेंगे, मोहम्मद अली जिन्ना समेत कई मुस्लिम नेता भी जिस खिलाफत आंदोलन का विरोध कर रहे थे। गांधी ने उसका समर्थन किया। भगत सिंह की फांसी की सज़ा माफ करवाने के लिए गांधी ने महज औपचारिकता निभाई लेकिन आर्य समाजी स्वामी श्रद्धानंद के हत्यारे अब्दुल राशिद की सज़ा गांधी ने ना सिर्फ माफ करवाई बल्कि उसे अपना भाई भी कहा।

विधि का विधान देखिए अब्दुल राशिद ने जिस तरह स्वामी श्रद्धानंद की हत्या की थी। ठीक उसी तरह नाथूराम गोडसे ने गांधी की हत्या की। हैरानी नहीं कि नाथूराम गोडसे ने कोर्ट में सुनवाई के दौरान जो बयान दिया था। उसमें उन्होंने अब्दुल राशिद और स्वामी श्रद्धानंद वाली घटना का भी जिक्र किया था।

गाँधी के फैसले

कुल मिलाकर गांधी के कई फैसले ऐसे थे। जिनकी वजह से हज़ारों लोगों की जान गई। भले ही उनकी नीयत कुछ भी रही हो। अब आते ही उसी मूल सवाल पर सावरकर के माफीनामे से देश को क्या नुकसान हुआ और गांधी की गलतियों से देश को कितना नुकसान हुआ। लेकिन बात वही नैरेटिव की है।

गांधी आज महात्मा हैं और सावरकर कायर। हकीकत ये है कि गांधी के भी अच्छे और बुरे दोनों पहलू थे और सावरकर के भी। लेकिन सावरकर के विचलन (माफीनामे) को उनकी पूरी ज़िंदगी का निचोड़ बताने वाले गांधी के हिमालयन ब्लंडर्स को इग्नोर कर जाते हैं।

अब आप कहेंगे कि सारी दुनिया मूर्ख है क्या जो गांधी को पूजती है ? बिल्कुल नहीं..गांधी ने कई काम किए जो उन्हें महानता दिलाते हैं, लेकिन अगर उन्होंने महान काम किए तो ये भी सच है कि उनके कई काम ऐसे भी हैं जिनके दुष्परिणाम हम आज तक भुगत रहे हैं लेकिन उन पर चर्चा नहीं होती क्योंकि नेरेटिव बहुत तगड़ा होता है। ये नेरेटिव ही है जिसने 2008 में राष्ट्रपति बने ओबामा को 2009 में नोबेल पीस प्राइज दिलवा दिया। जबकि तब ओबामा को राष्ट्रपति बने कुछ ही महीने हुवे थे। बाकी ओबामा के कार्यकाल में अमेरिका ने कितनी शांति कायम की दुनिया में? अगर किसी को पता चले तो बता दीजिएगा ।

लेख: दीपक जोशी (टीवी जर्नलिस्ट)