कविता संग्रह इश्तिहार ए इश्क़ के जरिए अखिलेश कुमार एक बार फिर हमारे सामने हाजिर हैं. ये नर्म, नाजुक, खिलंदड़ नहीं हैं. स्याह , तल्ख, अक्खड़ और बेबाक कविताएं हैं. इसी के लिए वह जाने भी जाते हैं. ये उनके पहले कविता संग्रह कनॉट प्लेस पर बीड़ी पीती दिल्ली से आगे की बात करती हैं. चौंकाती हैं. बेचैनी से भर देती हैं. अंदर कुछ तिलमिलाने सा लगता है.

कविता संग्रह कनॉट प्लेस पर बीड़ी पीती दिल्ली, कहानी संग्रह पांचवें माले की नायिका, किस्त दर किस्त सवेरा और उपन्यास शादीराम घरजोड़े बटे जचगी के बाद अखिलेश का कविता संग्रह इश्तिहार ए इश्क़ तथाकथित सभ्य समाज की खांटी सच्चाई उघेड़ता है. कन्नौज और फर्रुखाबाद की साझा रिहाइश वाले अखिलेश अब कई साल से कानपुर में हैं. पेशे से पत्रकार हैं. इनकी ये नजर कविताओं में शिद्द्त से मौजूद है. निन्यानबे कविताओं का 200 रुपये मूल्य का ये संग्रह इंक पब्लिकेशन प्रयागराज ने छापा है. हर कविता पैनेपन के साथ बातें करती है. इन्हें पढ़ते वक्त आज के दौर की बेचारगी, आक्रोश और खतरनाक हो जाता है.

बकौल अखिलेश, जिंदगी से उठाई गई कविताएं अक्सर खतरनाक होती हैं. इस लिहाज से ये भी हैं. ये खतरे हमारी नस्लों को घेरने लगे हैं. इनके दायरे की जद रोज उतनी बढ़ जाती, जितनी हम सांस लेते हैं. और लेते रहेंगे.
फेसबुक समेत सोशल मीडिया के तमाम प्लेटफार्म पर अखिलेश खूब पढ़े जाते हैं. विमर्श भी पैदा करते रहे हैं. सोशल मीडिया पर ज्ञानेश वर्मा के हवाले से,” इस संग्रह की प्रत्येक रचना जबरदस्त है. बार -बार पढ़ने का मन होता है, और हर बार नई ताजगी महसूस होती है. हर एक शब्द छा जाता है मन पर…. शब्दों की बेहतरीन जादूगरी.” ये जादू इस संग्रह की जान है.

संग्रह की हर कविता नए सवाल खड़े करती है. बात चाहे प्रेम की हो, भूख, रोटी, इंकलाब, स्त्री विमर्श या जीवन के किसी मसले की, ये खुद से लड़ती हैं . खुदा को घिस कर आग पैदा करने की कोशिश करती हुई सी.