मजबूर किसान ही मार भी खाए

by News Desk
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एक तस्वीर देखी । उसमें एक किसान और एक पुलिस का जवान आमने सामने है । पुलिस वाले की लाठी उठी हुई और किसान की देह उस लाठी के इंतज़ार में है । जवान को सरकारी आदेश मानना होता है लेकिन दिमाग तो उसी का तय करेगा कि लाठी से चोट कहाँ करनी है । उठी हुई लाठी के सामने कोई शौक से नहीं आता किसान तो कतई न आयें पर आना पड़ता है ।

अपने देश में कृषि की बात सार्वजनिक रूप से तब ही होती है जब बड़ी संख्या में किसानों की अत्महत्याएँ हो रही हो , अपनी मेहनत से तैयार फसल की उचित कीमत तय करवाने के लिए वे सड़क पर आ जाएँ । वरना उनकी उपस्थिती सार्वजनिक जीवन में है ही नहीं ।

वह तस्वीर हरियाणा के पीपली की है जहां शुरू में किसानों को प्रदर्शन की अनुमति नहीं मिली तो वे चक्का जाम कर रहे थे । सरकार ने किसानों पर लाठी चलवा दी । यह उसी दल की सरकार है जिसकी केंद्र में भी सरकार है । किसानों का यह प्रदर्शन केंद्र सरकार के उन तीन अध्यादेशों के खिलाफ़ है जिसके लागू होने के बाद पहले से ही अलाभकारी हो चली कृषि की और हालत खराब हो जाएगी । उन नियमों का सीधा असर किसानों पर पड़ना है ।

क्या है सरकार का नियम


केंद्र सरकार के नए नियमों के हिसाब से व्यापारी मंडी से बाहर भी फसल खरीद सकते हैं । जिन स्थानों पर फसल को मंडी में ले जाकर बेचने की व्यवस्था नहीं है वहाँ फसलों की कीमत व्यापारी तय करते हैं और निश्चित रूप से व्यापारी अपने लाभ की सोचते हैं किसानों की नहीं । जब हम व्यापारी की बात करते हैं तो घोड़े और खच्चरों पर अनाज लादकर जाने वालों की बात नहीं करते बल्कि उन बड़े व्यापारियों की बात करते हैं जिनके बड़े बड़े आउटलेट्स हैं । वे कीमतों को कभी किसानोन्मुख होने ही नहीं देंगे । न्यूनतम समर्थन मूल्य का जुआ उतर जाएगा और किसानों को हाड़ तोड़ मेहनत के बाद भी हानि ही उठानी पड़ेगी ।

सरकार अनाज , दाल, आलू , प्याज , खाद्य तेल आदि को आवश्यक वस्तुओं की कोटि से निकाल रही है । एक बार ये सब आवश्यक वस्तु की सूची से बाहर निकले कि इनके तय मात्रा से अधिक के भंडारण पर से पाबंदी हट जाएगी । कम कीमतों पर फसल खरीदकर जमा कर लेने के बाद बढ़ी हुई कीमतों पर उन्हें बेचा जाएगा । यह समझने के लिए कोई बहुत ज्यादा मशक्कत करने की जरूरत नहीं है ।

आज भी ऐसे भंडारण किए जाते हैं और जब कीमतें बढ़ती हैं और उनसे इक्का दुक्का विवाद होते हैं तो सरकारें गैरक़ानूनी भंडारण कुछ बयान दे देती हैं और एक – दो छापे पड़ जाते हैं । अब भंडारण गैरक़ानूनी नहीं रहेगा तो न तो सरकार को बयान देने की आवश्यकता है और न ही छापा मारने की । किसानों को कीमत कम मिलेगी और उपभोक्ताओं से वसूली गयी रकम सीधे व्यापार के बड़े खिलाड़ियों के हाथ में । सरकार बड़ी बड़ी बातें भले ही कर दे लेकिन वह किसानों के हित के लिए ईमानदार नहीं है ।

कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग और मुसीबतें


एक और बात है कॉन्ट्रैक्ट फ़ार्मिंग की । इस तरह की खेती में बड़ी बड़ी कंपनियाँ कूद रही हैं जो अपने आउटलेट्स के लिए या तो ख़ुद उत्पादन कर रही हैं या ठेके पर उत्पादन करवा रही है । इससे छोटी जोत वाले किसानों को न सिर्फ अपनी फसल औने पौने दामों पर बेचनी होगी बल्कि कृषि से उनकी बेदखली का रास्ता भी साफ हो जाएगा । दुखद यह है कि सरकार इस तरह की ठेके वाली खेती को और प्रोत्साहन देने का सोच रही है ।

कृषि क्षेत्र लंबे समय से संकट से गुज़र रहा है । इस शताब्दी की शुरुआत से ही किसानों की खराब हालत सामने आने लगी थी । बड़ी संख्या में किसानों की आत्महत्याओं को देखते हुए 2004 में सरकार ने एम एस स्वामीनाथन की अध्यक्षता में एक समिति गठित की थी । उस समिति ने साल 2004 से लेकर 2006 के बीच पाँच रिपोर्ट सरकार को सौंपी । उनमें से पाँचवीं रिपोर्ट में न्यूनतम समर्थन मूल्य को निर्धारित करने संबंधी एक सूत्र की बात की गयी थी ।

लागत की परिभाषा का मूल्यांकन

सी2 फॉर्मूला वहीं से आया । उसमें कहा गया कि न्यनतम समर्थन मूल्य औसत लागत से पचास प्रतिशत ज्यादा हो । यह सूत्र खेती में लागत की व्यापक परिभाषा तय करता है । इसके तहत लागत उस खास फसल में लगी पूंजी , पारिवारिक श्रम और जमीन सहित फसल के लिए उपयोग में लाये अन्य साधनों के किराए को जोड़कर तय होती है । इस लागत पर पचास प्रतिशत ज्यादा कीमत जोड़कर न्यूनतम समर्थन मूल्य तय होना किसानों के हित में है ।

सरकारें आती जाती हैं और इस बीच खूब सारे वादे कर लिए जाते हैं । राजनीतिक दल अपने चुनाव प्रचार के दौरान ज़ोर शोर से यह कहते पाये जाते हैं कि वे किसानों की लागत का डेढ़ गुना न्यूनतम समर्थन मूल्य के रूप में तय करेंगे लेकिन जब वादे पूरे करने का समय आता है तो ‘लागत’ की परिभाषा किसान आयोग की नहीं बल्कि व्यापारियों के हितों के अनुसार होती है । ऐसे में किसान या तो कर्ज में डूबकर आत्महत्या का रास्ता अपनाते रहेंगे नहीं तो पुलिसिया डंडे की मार खाकर भी सड़क पर टिके रहेंगे । नुकसान किसानों का ही है ।

आलोक रंजन

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