आजमगढ़ : राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (आरबीएसके) एवं मिरेकल फीट इंडिया द्वारा क्लबफुट (टेढ़े पंजे) का प्रशिक्षण कार्यक्रम शुक्रवार को जिला अस्पताल में किया गया जिसमें बच्चों में जन्म के समय पैर टेढ़े-मेढ़े होने पर इलाज के लिए पूर्ण जानकारी दी गई | मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ आई एन तिवारी ने कहा – आरबीएसके टीम द्वारा ब्लॉकों से जन्मजात टेढ़े-मेढ़े पैर वाले बच्चो को चिन्हित किया जाता है और उन्हें आंगनबाड़ी केंद्र द्वारा पंजीकृत कर उपचार के लिए सम्बंधित संस्था को जानकारी देकर नि:शुल्क उपचार किया जाता है। इसके बाद बच्चा अपने पैरों पर पुनः खड़ा हो सकता है |

आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों में जन्म से पैर अंदर की ओर मुड़ा होना। इलाज नहीं होने पर यह स्थिति दर्दनाक हो सकती है और बच्चों के बड़े होने पर उनका चलना मुश्किल हो जाता है। यह जन्म के समय एक या दोनों पैरों से प्रभावित हुए, बच्चों को चिन्हित कर उपचार से सही करने में मदद करती है। क्लबफुट को बिना सर्जरी के भी ठीक किया जाता है, लेकिन कभी-कभी बच्चे की पैरे स्थित के अनुसार सर्जरी की आवश्यकता होती है। ऐसे परिवारों को राहत देने के लिए राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के अंतर्गत “राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (आरबीएसके) में सहयोगी संस्था मिराकल फीट इंडिया जिला अस्पताल में क्लब फुट क्लीनिक का संचालन कर रही है। आरबीएसके की टीम ऐसे बच्चों से संपर्क कर सहयोगी संस्था को बताती है जिससे उन बच्चों का उपचार शुरू किया जा सके। यहाँ जीरो से पांच साल तक के बच्चों के लिए यह सुविधा उपलब्ध होती हैं। बच्चे दिव्यांगता का दंश न झेलें, इसको लेकर स्वास्थ्य विभाग द्वारा पूर्ण सहयोग किया जाता है |

आरबीएसके के नोडल अधिकारी डॉ वाई के राय ने बताया – क्लब फुट जन्म के समय से ही बच्चा अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो सकता है | उन बच्चों के पैरों के उपचार के लिये पोंसेटी तकनीकी के सहयोग से क्लब फुट का उपचार संभव है। इसमें धीरे-धीरे बच्चे के पैर को बेहतर स्थिति में लाना है और फिर इस पर एक प्लास्टर चढ़ा दिया जाता है, जिसे कास्ट कहा जाता है। यह हर सप्ताह 5 से 8 सप्ताह तक के लिए दोहराया जाता है। आखिरी कास्ट पूरा होने के बाद, अधिकांश बच्चों को अपने टखने (एचिलीस टेंडन) के पीछे के टेंडन को ढीला करने के लिए एक मामूली ऑपरेशन (टेनोटॉमी) की आवश्यकता होती है। यह बच्चे के पैर को और अधिक प्राकृतिक स्थिति में लाने में मदद करता है, जिससे पैर अपनी मूल स्थिति पर वापस न आ जाए।

मिरेकल फीट इंडिया के जिला कार्यक्रम समन्वय प्रिंस दुबे ने बताया – कभी-कभी इस प्रक्रिया के काम नहीं करने का मुख्य कारण यह होता है कि ब्रेसिज़ (विशेष प्रकार के जूते) लगातार उपयोग नहीं किये जाते हैं। यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि आपका बच्चा लंबे समय तक विशेष जूते और ब्रेसिज़ आमतौर पर तीन महीने के लिए पूरे समय और फिर पांच साल तक केवल रात में पहनाना होता है । आरबीएसके व मिरेकल फीट द्वारा जिले में अब तक 82 बच्चों का इलाज किया जा रहा है | कार्यक्रम में सी एम ओ सर तथा आर्थो डॉ पी बी प्रसाद, डॉ अभिषेक सिंह, डॉ राकेश मौजूद रहे । यह प्रशिक्षण डॉ सौरभ राय के नेतृत्व मे पुरा कराया गया ।

  • रिपोर्ट : शैलेंद्र शर्मा