गाँधी: मोहन से महात्मा तक

by shubham

‘मेरा निश्चित मत है कि निष्क्रिय प्रतिरोध कठोर से कठोर हृदय को भी पिघला सकता है। यह एक उत्तम और बड़ा ही कारगर उपचार है। यह परम शुद्ध शस्त्र है। यह दुर्बल मनुष्य का शस्त्र नही है। शारीरिक प्रतिरोध करने वाले की अपेक्षा निष्क्रिय प्रतिरोध करने वाले में कहीं ज्यादा साहस होना चाहिये।’

यूँ तो गाँधी के अनगिनत विचारों को समाज के सामने दर्पण के रूप में रखा जा सकता है। फिर भी वर्तमान समाज में ख़ासकर युवाओं में हिंसा-अहिंसा के कोण पर मुकम्मल तौर पर गाँधी-दृष्टि को समझने की आवश्यकता है। हाल के दिनों में देश में जगह-जगह पर सरकार की नीतियों के खिलाफ आन्दोलन हुए और वही आन्दोलन हिंसा का रूप लेते गए। क्या गाँधी ने ऐसे ही ‘भारत की कल्पना’ की थी ? उनकी आत्मा यह दृश्य देखकर कचोटती होगी जब वह हिंसक भीड़ में युवाओं के एक हाथ में अपनी तस्वीर और दूसरे हाथ में पत्थर लिए देखते होंगे। आज मोहनदास करमचंद गांधी की जयंती पर उनके विचारों को सिलसिलेवार ढंग से समझने को कोशिश करते हैं।

अहिंसा के पुजारी महात्मा

गाँधी अनेक दार्शनिकों के विचारों से प्रभावित थे। गाँधी जी को सर्वोदय की प्रेरणा रस्किन की किताब ‘अन टू दिस लास्ट’ से मिली थी। महात्मा हेनरी डेविड के ‘सविनय अवज्ञा’ से भी प्रभावित थे। अनेक ग्रन्थों का अध्ययन करने वाले गांधी जी बाईबिल के उस विचार से प्रभावित हुए जिसमें कहा गया था कि ‘ यदि कोई तुम्हारे एक गाल पर थप्पड़ मारे तो दूसरा गाल आगे कर दो।’

दक्षिण अफ्रीका में एक सफल आंदोलन के संचालन के बाद महात्मा गाँधी का भारतीय राजनीति में आगमन हुआ।
जिसने भारतीय राजनीति के स्वरूप को ही बदल दिया।
गांधी शुरू से ही कांग्रेस के बुर्जुआजी चरित्र से वाकिफ़ थे और कांग्रेस आंदोलन को जनांदोलन में परिवर्तित करना चाहते थे। गांधी ने सत्याग्रह के कई मापदंड निर्धारित किये थे, जिसमें एक सत्याग्रही सदैव अहिंसक, निष्ठावान और निडर रहते हुए अपने मार्ग को प्रशस्त करता है प्रमुख थे। उनका कहना था कि बुराई के विरुद्ध संघर्ष के दौरान सत्याग्रहियों में समस्त यातनाएं सहने करने की क्षमता होनी चाहिए। सत्याग्रह में हिंसा का कोई स्थान नही है।

गांधी के पंचतत्व इसी विचारधारा से प्रेरित थे। 1. अपृश्यता की समाप्ति 2. स्त्रियों के लिए समानता 3. हिन्दू- मुस्लिम एकता 4. मादक पदार्थों का परित्याग 5. चरखा काटना। गांधीजी ह्रदय परिवर्तन के सिद्धांत पर भी विश्वास रखते थे। उनका कहना है कि

‘जो बदलाव आप दूसरों में देखना चाहते हैं पहले स्वयं में लाइये’।

गाँधी की प्रेरणा

एक इंसान के रूप में हमारी महानता इसमें नहीं है कि हम इस दुनिया को बदलें, जितनी इसमें है कि हम अपने आप को बदल डालें। आवश्यकता है तो खुद को सही – गलत से दूर रख धैर्य और विवेक से विचार करने की।
लन्दन के वेस्टमिंस्टर एबी शहर में एक अंग्रेज पादरी की कब्र पर लिखीं कुछ पंक्तियां जो गाँधी जी के विचारों को और पुख्ता करती हैं –

” जब मैं जवान था तब मेरी कल्पनाओं की कोई सीमा नहीं थी, मैंने विश्व को बदल डालने का सपना देखा। जैसे-जैसे मेरी उम्र बढ़ी और बुद्धि आई मुझे लगा कि दुनिया नहीं बदलेगी और मैंने अपने लक्ष्य को छोटा कर लिया और दुनिया को बदलने की बजाय अपने देश को बदल डालने का फैसला किया। लेकिन यह भी एक दुरूह कार्य जैसा ही लगा जीवन के अंतिम दिनों में हताश होकर मैंने अंतिम प्रयास के रूप में खुद के परिवार को ही बदलने का फैसला किया, और उन लोगों को जो मेरे नजदीक थे, लेकिन मैं इनमें से किसी को भी बदल नहीं सका।

अब जबकि मैं अपनी मृत्युशैय्या पर हूं, मुझे अचानक यह महसूस हुआ कि अगर मैंने केवल खुद को बदल लिया होता तो अपनी प्रेरणा से अनेक परिवार को भी बदल डालता, और परिवार वालों के सहयोग और उत्साहवर्धन से मैं अपने देश को बदलने के लायक हो जाता और क्या पता मैं दुनिया को भी बदल देता।”

न्याय के प्रति विचार

किसी दीन- हीन की बात हो या बात हो गरीब के कल्याण की, अन्याय मिटाने या हिंसा ख़त्म करने की जितना भी योगदान दे सकते हैं जरूर दें। निष्कर्षतः अहिंसा के नियम को विशेष रूप से ध्यान में रख कर ही जीत सुनिश्चित की जा सकती है। गांधी जी का कथन है कि –

“उस आस्था का कोई मूल्य नहीं जिसे आचरण में न लाया जा सके। अगर आप न्याय के लिये लड़ रहे हैं तो ईश्वर सदैव आपके साथ है।”

स्त्रियों के सम्बंध में गाँधी के विचार

हाल के दिनों में देखा गया है कि स्त्रियों के अधिकार के लिए लड़ने वाले खुद ही उनके शोषण में लिप्त पाए जाते हैं। गौरतलब है कि सिर्फ नारी के समर्थन में आंदोलन कर देने मात्र से स्थिति नही बदलेगी उसके लिए हमें अपनी पितृसत्तात्मक सोच को बदलना होगा। समाज में पर्याप्त रूप से विछिप्त और कुंठित मानसिकता वालों की कमी नही है। आये दिन वो स्त्री के रहन-सहन से लेकर पहनावे तक पर सवाल उठाते हैं। आख़िर जब तक हम स्त्रियों के सम्बंध में अपनी दूषित मानसिकता नहीं बदलेंगे तब तक कैसे पुलिस उनके खिलाफ बढ़ती हिंसा और अपराधों को रोक पाएगी।

हम सबको सामाजिक बदलावों के लिए अपनी आदतों , विचारधारा और जीवनशैली की रूढ़िवादिताओं को बदलना होगा। तभी स्वस्थ समाज का सही ढंग से निर्माण किया जा सकेगा। स्त्री – पुरुष के समान सरोकारों को शामिल किए बिना विकास की भावना ही अपने आपमें सवालिया निशान खड़ा करती है। इसलिए तो एक कवि ने कहा गया है-

“एक दिन औरत का दिन होगा
एक दिन वह खिलाएगी दूध से सनी रोटियां
दुनिया के सारे बच्चों को
उसकी हँसी में होगी सिर्फ हँसी और कुछ नहीं होगा
वह स्थगित कर देगी सारे युद्ध, सारे धर्म
वह ऐतबार का पाठ पढ़ाएगी।”

वर्तमान में गाँधी

वर्तमान में गांधी के विचारों को अंतिम व्यक्ति तक पहुँचाने के लिये नीचे लिखी कहानी मील का पत्थर साबित हो सकती है.

“एक बार एक जंगल में आग लगी और एक चिड़िया बगल की नदी से जाती और अपनी चोंच में पानी भरकर जंगल में डालती। उसे ऐसा करते देख कर एक बंदर उस पर हंसा और पूछा कि क्यों मूर्खों वाला काम कर रही हो इससे जंगल की आग नहीं बुझने वाली। इस पर चिड़िया का जवाब हमें अपने जीवन व्यवहार में उतारने की जरूरत है। चिड़िया ने कहा कि – “मेरे द्वारा ऐसा करने से जंगल की आग भले ही ना बुझे पर जब भी जंगल का इतिहास लिखा जाएगा मेरा नाम आग लगाने वालों में नहीं आग बुझाने वालों में शुमार होगा।”

लेख: हर्षित दुबे

Related Posts