विदेशी कंपनियों को भारत में काम करना है, तो उन्हें भारत के नियमों और कानूनों को मानना पड़ेगा। उन्हें भारत की अंदरूनी राजनीति से पूर्णतः निरपेक्ष होना पड़ेगा और ऐसे लोगों की नियुक्तियों से भी बचना होगा, जो उनके यहाँ पदासीन होकर राजनीतिक एजेंडा चलाते हैं, चाहे वे भारतीय ही क्यों न हों। अगर ऐसे भारतीयों की दिलचस्पी भारत की राजनीति को प्रभावित करने में है, तो वे विदेशी कंपनियों की नौकरी छोड़कर यह काम करें।

इसलिए ट्विटर और व्हाट्सएप से सरकार की कुछ अपेक्षाएं गलत नहीं हैं। इसे भाजपा या विरोधी दलों के चश्मे से देखने की ज़रूरत नहीं है। इसे भारत के चश्मे से देखना होगा। अगर अभी देश में सोनिया गांधी की भी सरकार होती, तो मैं यही कहता।

आखिर एक सब्ज्युडिस मामले में ट्विटर ने किस अधिकार और हैसियत से manipulated media लिखा? व्हाट्सएप किस अधिकार और हैसियत से कह रहा है कि वह भारत की सुरक्षा और संप्रभुता से खिलवाड़ होने देगा, लेकिन अपने यूजर्स की प्राइवेसी से खिलवाड़ नहीं होने देगा? अगर कोई मैसेज देशहित के खिलाफ है तो सरकार को उसका ओरिजिन जानने का पूरा हक है। किसी भी व्यक्ति की प्राइवेसी देश की सुरक्षा और संप्रभुता से बड़ी नहीं हो सकती।

इन विदेशी कंपनियों को समझना होगा कि भारत उसकी पॉलिसी से नहीं चलेगा, बल्कि अपने ही नियम-कानूनों से चलेगा। यह स्व-संविधान संचालित दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है। इसलिए, इन कंपनियों को ग्लोबल पॉलिसी का ढोंग छोड़ना होगा, क्योंकि हर देश के अपने नियम, कानून और संविधान होते हैं, जो उनके लिए स्वाभाविक रूप से इन कंपनियों की कथित ग्लोबल पॉलिसी से ज़्यादा महत्वपूर्ण हैं।

इसलिए, अगर भारत सरकार देश की सुरक्षा और संप्रभुता सुनिश्चित करने के लिए अथवा किसी के भी खिलाफ एकतरफा कार्रवाई रोकने के लिए अथवा अदालतों में लंबित मामलों में एक तरह से फैसला सुना देने जैसी खतरनाक प्रवृत्ति को रोकने के लिए अथवा विदेशी कंपनियों को देश में सरकार बनाने-गिराने के खेल में शामिल होने से रोकने के लिए अथवा भारत के खिलाफ प्रोपगंडा करने से रोकने के लिए विदेशी सोशल मीडिया कंपनियों को भारत के नियमों और कानूनों के हिसाब से अपनी पॉलिसी तय करने के लिए बाध्य करती है, तो मैं इसे बिल्कुल भी गलत नहीं मानता हूं।

हां, ट्विटर से विवाद में भारत सरकार जिस तरह से “कू” को प्रमोट कर रही है, उसे मैं सही नहीं मानता, क्योंकि यह सरकारी नहीं, निजी प्लेटफॉर्म है। अगर मौजूदा सरकार, जो कि भाजपा-संचालित है, अपनी सारी शक्तियां लगाकर एक निजी प्लेटफॉर्म को प्रमोट करती है, तो कल को देश में यदि दूसरी पार्टी की सरकार सत्ता में आती है, तो वह उस प्लेटफॉर्म पर सहज नहीं हो पाएगी। इसलिए माना जा सकता है कि मौजूदा भाजपा सरकार ऐसे प्लेटफॉर्म तैयार करने में रूचि ले रही है जो उसकी पार्टी के तो काम आए, लेकिन दूसरी पार्टियों के लिए अभिव्यक्ति की मुसीबत बनी रहे। लोकतंत्र में यह ठीक नहीं है। इसलिए किसी भी सरकार को अपनी आधिकारिक अभिव्यक्ति के लिए हमेशा सरकारी माध्यमों को ही अपनाना चाहिए, न कि निजी माध्यमों को।

इसलिए सरकार चाहे अपनी आधिकारिक अभिव्यक्ति के लिए ट्विटर या फेसबुक आदि का इस्तेमाल करे, या “कू” को प्रमोट करे, यह सही नहीं है। आखिर लाखों करोड़ के निवेश से तैयार सरकारी मीडिया ढांचा यदि इतने काम का भी नहीं है कि सरकार उसके ज़रिए देश में अपनी बात रख सके, तो इस ढांचे को नष्ट कर देना चाहिए और कम से कम देश की जनता की गाढ़ी कमाई का पैसा इन सफेद हाथियों को पोसने पर ख़र्च नहीं किया जाना चाहिए। आखिर सरकार ट्विटर, फेसबुक, व्हाट्सएप या कू की तरह का एक सरकारी मीडिया क्यों नहीं तैयार कर सकती कि उसके मंत्री संसद में खड़े होकर एक प्राइवेट कंपनी का प्रचार करते हैं और एक प्लेटफॉर्म से झगड़े में दूसरे प्लेटफॉर्म पर प्रेस रिलीज़ जारी करते हैं? देखा जाए तो सरकार यहां पर पक्षपाती भी दिखती है और उसकी नीयत भी संदेह से परे दिखाई नहीं देती।

इस एक आपत्ति को छोड़कर, ट्विटर और व्हाट्सएप से जुड़े विवादों में मैं पूरी तरह से भारत सरकार के साथ खड़ा हूं। यद्यपि मीडिया की स्वतंत्रता का मैं पक्षधर हूं और रहूंगा, लेकिन देश की एकता, अखंडता और संप्रभुता की शर्त पर ऐसी कोई स्वतंत्रता व्यावहारिक नहीं है। भारतीय संविधान में नागरिकों को दी गई अभिव्यक्ति की आज़ादी सशर्त है, बिना शर्त नहीं।