साबुन लगाने से कोई गोरा नहीं होता…ये बात जब तक हमारी समझ में आई तब तक हम दस साल के हो चुके थे। हमारे कई संगी साथी और तत्कालीन मित्र कई – कई दिन न नहाने और मुंह न धोने के बावजूद गोरे के गोरे थे। जबकि हम जस के तस।

ये बात करीब 54 साल पहले की है। काले तो हम आज भी नहीं हैं। जो लोग फिजिकली हमें नहीं जानते, उनकी जानकारी के लिए बता दें कि हमारा कलर कोयले से काफी खुला हुआ है।

ताज़ा समाचार यह है कि कोरोना के चक्कर में तीन महीने से हम साबुन लगाकर रगड़ – रगड़कर हाथ धो रहे हैं। प्रतिदिन 30-40 बार की दर से। न्यूनतम एक बार की दर से नहा भी लेते हैं। संक्षेप में कहा जाए तो आजकल नहाना – धोना ही प्रमुख कार्य रह गया है।

सच बात यह है कि अपने रंग को लेकर उम्मीद का दामन हमने अभी भी नहीं छोड़ा है। कौन जाने किस उम्र में नारायण मिल जाएं। खैर, नारायण तो नहीं मिले, अलबत्ता आज सुबह हमने देखा कि लगातार धोते – धोते दोनों हाथों की सारी रेखाएं घिस कर गायब हो गई हैं।

हाथ की रेखाओं में आदमी का मुकद्दर लिखा होता है। इस हिसाब से हमारा अगला – पिछला टोटल मुकद्दर कोरोना की भेंट चढ चुका था। सुबह से कई बार अपना सफाचट रेखा विहीन हाथ देख चुके थे। धन की रेखा तो दरकिनार पुराने पांच पैसे बराबर कोई बिंदु तक न बचा था हथेलियों पर। ये तो शुक्र है कि समय से सात फेरे ले लिए वरना कोरोना ने तो कुंवारा मारने का पूरा इंतजाम कर दिया था।

खैर, अपना सफाचट हाथ देखकर हमें खयाल आया कि यदि भगवान हाथों की रेखाएं न बनाते तो क्या होता। सबसे पहले तो हस्तरेखा विशेषज्ञों के पेट पर लात पड़ती। बेचारे ज्योतिषी… दूसरों का भविष्य बताकर अपना वर्तमान चलाने वालों के सामने गहरा संकट खड़ा हो जाता। यही क्यों, राहु – केतु, मंगल, शनि आदि डराने वाले ग्रहों की खुद साढ़े साती लग जाती। उनसे न कोई डरने वाला होता… न डराने वाला।

पुलिस के लिए भी नया संकट खड़ा हो जाता। अपराधियों के फिंगर प्रिंट्स की बात भी बेमानी हो जाती। चोर – उचक्के, गुंडे – बदमाश बेफिक्र क्राइम करते और कानून – व्यवस्था को अपना सफाचट अंगूठा दिखाकर हैरान किए रहते। काला अक्षर मिसेज बुफैलो बराबर लोगों की अलग परेशानी होती।

कागज़ों पर अंगूठा लगाने का कोई मतलब न रह जाता। हम जितनी बार अपना सफाचट हाथ देखते… किसी ताज़ा – ताज़ा गंजे हुए बच्चे की तरह दुखी हो जाते। कोरी स्लेट जैसे हाथ मुंह चिढ़ा रहे थे… एक ही ऑप्शन बचा था कि अपने हाथों पर अपनी तकदीर खुद लिख डालें… लेकिन वह केवल मुहावरे में संभव था, हकीकत में नहीं।

कमल किशोर सक्सेना
वरिष्ठ पत्रकार, दैनिक जागरण से सेवानिवृत्त। व्यंग्यकार, अनेक रचनाएं अख़बारों तथा पत्र – पत्रिकाओं में प्रकाशित। रेडियो और दूरदर्शन से भी कई हास्य नाटकों का प्रसारण। कुछ का मंचन भी। लखनऊ में निवास
संप्रति : स्वतंत्र लेखन