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कालजयी उपन्यास 'द नियोजित शिक्षक'
 

किसी ने सच ही कहा- "अगर किसी किताब की कहानी यह अहसास दिला दें कि इस कहानी के पात्र हमारे आस-पड़ोस और स्वयं से मेल लिए हैं, तो समझिए किताब और लेखक ने 'महानता' साबित कर दिए।" कुछ ऐसे ही बात उपजे मेरे मन में, जब मैंने तत्सम्यक् मनु रचित पुस्तक 'द नियोजित शिक्षक' को पढ़कर समाप्त किया। किताब की कहानी उनके नाम पर केंद्रित हैं, उस नाम के दर्द को समझने के लिए मुझे चार सौ से अधिक पन्नों का रसपान करना पड़ा, और अब जब किताब को पूर्णतः पढ़ चुका हूँ, तो मेरे मन में यह बातें चलने लगी- क्या नियोजित शिक्षकों के साथ सरकार सही ढंग से पेश आ रहे हैं ?


मेरे दिमाग में यह बात भी आ रही है कि लेखक ने रोचक तरीके से शिक्षकों के दर्द को उपन्यासनुमा आकर दिए और हम पाठकों के सामने पेश कर दिए, साथ ही यह निर्णय लेना हमपर ही छोड़ दिए कि शिक्षकों को सम्मान कब दिया जाएगा ?
किताब की कई शोधपरक जानकारियों ने मुझे अचंभित किया और सोचने पर मजबूर भी किया कि मुंशी प्रेमचंद एक समय में कविता भी लिखते थे। हिंदी और ग्रामीण भाषा में लिखा गया यह उपन्यास इतने कम समय में 'कालजयी' कृति बन गयी है, सचमुच काबिलेतारीफ हैं।


✍ कन्हैया यादव(उत्तरप्रदेश)

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