अगला एक सप्ताह अफगानिस्तान के अनपेक्षित घटनाक्रम पर निगाह रखने का समय है. हर समस्या के दो पहलू हैं. अमेरिका आज खलनायक जैसा मुझे भी दिख रहा है. आपको भी दिख रहा होगा. अब अमेरिका की ओर से देखें तो प्रकट होता है कि जो उनके लिए संभव था, वह सब उन्होंने किया. अमेरिका ने 20 साल अफगानिस्तान में पश्चिमी मूल्यों की स्थापना में लगाये. आदर्श नगर बनाए. सुविधाएं विकसित की. आधुनिक शिक्षा की व्यवस्था की. महिलाओं को शिक्षित प्रशिक्षित किया. मानवाधिकार सिखाया. वह सब आज बराबर हो गया.

उनकी प्रशिक्षित सेकुलर अफगान सेनाएं सरकस के शेर साबित हुईं. हां, पाकिस्तान का तात्कालिक लक्ष्य पूरा हुआ, इसमें संदेह नहीं. अमेरिका तो अफगानों को हर तरह से सहयोग दे रहा था. अरबों रुपये लुटा दिये, अब वे उनके लिए अफगानी अस्मिता का गर्व कहां से ले आते ? यह तो अफगानों को स्वयं विकसित करना था. राष्ट्र निर्माण का कार्य तो अफगानों को करना था, यह अमेरिका का काम नहीं था. बाइडेन द्वारा यह सही बात कही गयी है.

बहरहाल, अब हमारे लिये क्या सबक है, यह देखना है. आप दूर इतिहास के परिप्रेक्ष्य में देखेंगे तो आपको एहसास होगा कि जिस तरह इन जुनूनी इस्लामी सेनाओं से आज उनसे बेहतर हथियारों की पांच गुना बड़ी अफगान सेना पराजित हुई, क्या वैसे ही अरब जेहादियों से कभी आठवीं शताब्दी में ईरानी सेनाएं पराजित नहीं हुई थी ? जिसका परिणाम ईरान के जोरोस्ट्रियन धर्म के सर्वनाश में हुआ था. क्या वैसे ही हम लोग इसी अफगानिस्तान गांधार कम्बोज मद्र में नहीं हारे थे. क्या इसी तरह हमारे राजा व सैनिक पंजाब में 500 साल तक लड़ने के बाद भी आखिरकार जुनूनी मजहबियों से पराजित नहीं हुए थे ?

कभी हमारी सभ्यता के गौरवपूर्ण भाग रहे अफगानिस्तान, पाकिस्तान में हमारा हिंदू बौद्ध धर्म कहां बिला गया ? बहुत से सवाल मस्तिष्क में लगातार चलने लग रहे हैं. एक ओर तालिबानी जुनून था और दूसरी ओर ताजिक हजारा उजबेक कबीलों को लेकर चल रही सेकुलर अफगान सेना थी जिसमें पश्तून भी बड़ी संख्या में थे. यह उद्देश्यहीन विभाजित सेना थी जो अपनी बरबादी के बीज स्वयं में ही लेकर चल रही थी. इस सेकुलर व सबकी साझा सेना ने मजहबी जुनून के सामने आज हथियार डाल दिये.

हम भी तो स्वार्थों, जातियों, क्षेत्रों, भाषाओं व जातीय विद्वेषों में बुरी तरह विभाजित हैं. वे सेनाएं बेहतर लड़ती हैं जिनके पीछे एकात्म समाज राष्ट्र की शक्ति होती है. तालिबान की विजय एक सबक है और उससे बड़ा सबक सेकुलर साझा सेनाओं की पराजय है. और इस पराजय में न जाने क्यों हमें हमारे व्यतीत इतिहास की त्रासदियों की एक झांकी भी दिखाई देती है.