महालक्ष्मी व्रत का समापन 10 सितंबर को

by News Desk
39 views

महालक्ष्मी व्रत में 16 की संख्या का बहुत महत्व है। इसमें उद्यापन करते समय, महालक्ष्मी के श्रृंगार की 16 वस्तुओं का दान करने से, 16 वरदान मिलते हैं। महालक्ष्मी व्रत की बहुत मान्यता है। अगर आप व्रत शुरु में नहीं रख पाये तो आखिरी दिन भी व्रत रखकर, महालक्ष्मी को अपने घऱ आमंत्रित कर सकते हैं। लेकिन जिन्होने पूरे 15 दिन व्रत रखा है, उन्हें उद्यापन ज़रूर करना चाहिये।

राधा अष्टमी से शुरु हुये, महालक्ष्मी व्रत में अनाज नहीं खाया जाता है। इसमें दूध और फलाहार किया जाता है। कई लोग 15 वर्ष के लिये महालक्ष्मी व्रत का संकल्प लेते हैं। जो लोग सिर्फ 15 दिन का व्रत करते हैं, उन्हें आश्विन कृष्ण अष्टमी को व्रत का उद्यापन करना चाहिये।

कैसे करें महालक्ष्मी व्रत का उद्यापन?
16 चुनरी
16 बिंदी
16 डिब्बी सिंदूर
16 रिबन
16 कंघा
16 शीशा
16 मीटर वस्त्र या 16 रुमाल
16 बिछिया
16 नाक की नथ
16 फल
16 मिठाई
16 मेवा
16 लौंग
16 इलायची

महालक्ष्मी मंत्र
“ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्षम्ये नमः”
उद्यापन के समय, बांस के 2 सूप या स्टील की थाली लें। इसमें ऊपर बताया गया सारा सामान रखें। फिर सारा सामान मां महालक्ष्मी को अर्पित करें। बाद में चंद्रमा को, जल का अर्ध्य देकर, पति-पत्नी मिलकर, महालक्ष्मी को अपने घर आने के लिए 3 बार आमंत्रित करें। इसके बाद एक थाली में, बिना लहसन प्याज का बना भोजन रख कर, महालक्ष्मी का भोग लगाये। फिर माता का भोग और 16 सामान वाली थाली, सुबह किसी ब्राह्मण को दान करें। पूरी रात महालक्ष्मी के मंत्र का जाप करने से भी महालक्ष्मी की जल्दी कृपा होगी।

महालक्ष्मी व्रत का महत्व

भाद्रपद शुक्ल अष्टमी को महालक्ष्मी व्रत होता है, इस दिन राधा अष्टमी यानी राधा जयंती भी मनाई जाती है। अष्टमी के दिन प्रारंभ होने वाला महालक्ष्मी व्रत अत्यंत महत्वपूर्ण होता है क्योंकि इस दिन दूर्वा अष्टमी व्रत भी होता है। दूर्वा अष्टमी को दूर्वा घास की पूजा की जाती है। महालक्ष्मी व्रत धन, ऐश्वर्य, समृद्धि और संपदा की प्रात्ति के लिए किया जाता है। इस दिन लोग धन-संपदा की देवी माता लक्ष्मी को प्रसन्न करने का प्रयास करते हैं।

महालक्ष्मी पूजा

जो लोग माता महालक्ष्मी का व्रत करते हैं, वे पहले दिन पूजा के समय हल्दी से रंगे 16 गांठ वाला रक्षासूत्र अपने हाथ में बांधते हैं। 16वें द‍िन व्रत का व‍िध‍िपूर्व उद्यापन क‍िया जाता है और उसे रक्षासूत्र को नदी या सरोवर
में व‍िसर्जित क‍िया जाता है। महालक्ष्‍मी की पूजा में हर द‍िन मां लक्ष्‍मी के इन आठ नामों का स्मरण करना चाहिए।
ऊं आद्यलक्ष्म्यै नम:, ऊं विद्यालक्ष्म्यै नम:, ऊं सौभाग्यलक्ष्म्यै नम:, ऊं अमृतलक्ष्म्यै नम:, ऊं कामलक्ष्म्यै नम:, ऊं सत्यलक्ष्म्यै नम:, ऊं भोगलक्ष्म्यै नम: और ऊं योगलक्ष्म्यै नम:

  • आचार्य पवन तिवारी

Related Posts