आज के समय में अतीत के मुक़ाबले काफ़ी बदलाव आ चुके हैं। आज हम हर 3 मिनट में इतना विकास कर रहें हैं जितना मानव जाती ने अपने उद्गम से लेकर 2000 ईसा पूर्व तक किया था। लेकिन इस विकास की दौड़ में हम खुशी को पीछे छोड़ने लगे हैं। लगने लगा है जैसे मानव जीवन का मूल सिद्धांत में मुस्कुराने की प्राथमिकता न बराबर हो चुकी है।

निराशा, अवसाद, डिप्रेशन, एंजाइटी, उत्कंठा जैसे शब्दों ने हमे घेर लिया है। आए दिन ये शब्द हमे सोशल मीडिया और टीवी पर प्रचलन में दिखाई पड़ते हैं। कभी टीवी पर छोटी छोटी खिड़कियों से बाहर कूद चिल्लाने को उत्सुक वक्ता, तो कभी फेसबुक जैसे ऐप्स पर लोगों का उपहास उड़ाते लोगों मुह से चुटकुले से सुनाई पड़ते यह शब्द हमे सुनाई पढ़ते रहते हैं।

क्या है देश के हालात

अचंभे की बात है कि इतनी अती ‘जागरूकता’ के बावजूद देश और दुनिया में मानसिक स्वास्थ्य कि स्तिथि बिगड़ती दिखाई दे रही है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो कि रिपोर्ट अनुसार 2019 में भारत में 1 लाख 39 हज़ार से अधिक आत्महत्या के मामले सामने आए, जिसमे 2018 के मुकाबले 3.4% कि बढ़त दर्ज हुई थी। बिगड़ता मानसिक स्वास्थ्य और बढ़ती दुखद घटनाएं हमें सोचने पर मजबूर करती हैं कि क्या हम सचमे इतने जागरूक हैं जितना हम मानते हैं?

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गौर करने कि बात है कि भारत जैसे देश, जहां पत्रिक सामाज का बोल बाला है, में अधिकतर आत्महत्या के मामले पुरुषों के थे। कुल मामलों में 70% से अधिक खुदकुशी कि घटनाओं में मरने वाले पुरुष थे। हालांकि इससे यह संकेत नहीं जाता कि महिलाओं कि परेशानियां कम हैं, लेकिन यह तथ्य आदमियों के बिगड़ते स्वास्थ व हालातों की ओर इशारा ज़रूर कर्ता है। यह संकेत है कि हमें समाज में आदमियों के बीच बढ़ते तनाव के मामलों पर ध्यान देना शुरू करना चाहिए।

क्या है मैनजाइटी (Manxiety)

आपमें से ज़्यादातर के लिए मैनजाइटी (Manxiety) एक नया शब्द होगा जिसके बारे में अपने शायद हि कभी सुना हो। मैनजाइटी अकसर विशेषज्ञों द्वारा मानसिक तनाव (anxiety) से जूझ रहे एकल व तलाकशुदा पुरुषों के लिए इस्तेमाल किया जाता है।

आज के समय में एक युवक में तानाव के लक्षण छोटी उम्र से हि दिखाई पढ़ने लगते हैं जिन्हें माता पिता और इंसान खुद मामूली मान कर नजरअंदाज कर देता है। अकसर बीस से पच्चीस साल की उम्र तक यह लक्षण अधिक दिखाई नहीं पढ़ते। दोस्तों, यौवन तथा मनोरंजक गतिविधियों के बीच ऐसी चेतावनियों को भुला दिया जाता है।

रूढ़ प्रारूप में मानी जाने वाली कई बातें इस तनाव में समय के साथ योगदान देती चलती है। पुरुषों की मर्द में बदलने की दौड़ और मर्दानगी को मापने के बिंदों को देखें तो लड़कों के लिए अपनी भावनाएं व्यक्त करना उनकी बहादुरी के खिलाफ एक अपराध से कम नहीं है।

समाज बिगाडता है हालात

लेकिन अधेड़ अवस्था आते आते नजरअंदाज किया गया तनाव हावी होने लगता है। भावनाएं व्यक्त करने में असमर्थ व्यक्ति निराशा, हताशा व अफ़साद का शिकार होने लगता है। अकसर ऐसी स्तिथि में व्यक्ति ख़ुद को अकेला व शक्तिहीन पाता है। साथ ही साथ काम का दबाव, परिवार की आशाएं और ज़िम्मेदारियां इंसान को अंधेरे में धकेलने का काम करती है। ऐसे में हमारा क्रूर समाज, खास कर की पुरुषों को, पागल और नक्कार साबित करने में कुछ यूं जुट जाता है मानो सामाज के विकास मे एक यही व्यक्ती बाधा बने हुए है।

हमारे समाज कि खासियत है एक पुरुष कि स्तिथि, स्वास्थ व मान सम्मान को उसकी लैंगिकता से जोड़ना। मानसिक रूप से अस्थिर व्यक्ती इस सामाज के रुरिवादी बुद्धिजीवियों के लिए एक नपुक्सक बनकर रह जाता है। सामाज कि नज़रों में समाज द्वारा मापा गया उसका पौरुष ही यह तय करता है कि उसके साथ कैसा व्यवहार होना चाहिए। ऐसे में किसी भी इंसान का लड़ पाना लगभग असंभव बन जाता है।

इसके अलावा रूढ़िवादी मानसिकता को एक तरफ रख उदार व लिबरल समाज़ कि और देखा जाय तो स्तिथि कुछ खास दिखाई नहीं पढ़ती। सालों से चले आ रहे महिलाओं के शोषण से निपटने के लिए चलाए अभियानों में पैतृक व्यवस्था का पुरुषों पर होने वाला दुष्प्रभाव अनदेखा रह गया है।

हालांकि तनाव कि इस बिगड़ती स्तिथि में पितृसत्तात्मकता का भाग कम नहीं है, लेकीन इस को भी नकारा नहीं जा सकता कि हम एक टकसाली को ख़तम करते करते दूसरी को जन्म देने कि ओर बढ़ रहे हैं।

क्या होना चाहिए अगला कदम

बायोमेड सेंट्रल साइकिएट्री द्वारा की गाई रिसर्च के मुताबिक़ अधिकतर पुरुष जिनमें आत्महत्या कि प्रवृत्ति देखी गई वह पारंपरिक पुंसत्व में विश्वास रखते हैं। दुसरी ओर जो लोग इन परंपराओं को त्यागते हैं उन्हें कई प्रकार के शोषण का सामना करना पड़ता है। इसमें हर प्रकार के व्यक्ती कि बराबर भागीदारी दर्ज की गाई है।

माजा स्टियावा कि रिपोर्ट कि माने तो पुरुषों में मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिए, लिंग-विशिष्ट सेवाओं की पेशकश की जानी चाहिए। लिंग की भूमिका के बारे में जागरूकता और मानसिक स्वास्थ्य उपचार पर इसके निहितार्थ स्कूली शिक्षा का अंग होना चाहिए। यह मानसिक स्वास्थ्य उपचार प्रथाओं के दैनिक कार्यान्वयन का एक अभिन्न अंग होना चाहिए।

हालांकि यह कहना गलत नहीं होगा कि दिल्ली अभी दूर है। लेकिन यह बात प्रत्यक्ष रूप से समने आ चुकी है कि अगर अभी सही कदम ना उठाए गए तो हमें एक से अधिक सीमाओं पर जंग लड़नी होगी।

लेख:
मोनीदीपा दत्ता

एडिटिंग एवं अनुवाद- सचिन शर्मा