ट्विटर ट्रेंड के मायने !

by News Desk
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इस वाकये को घटित हुए शताब्दियाँ बीत गयीं। वाकया क्या कहें,इतिहास का एक पूरा अध्याय ही कह लें। एक ऐसा अध्याय जहां से इतिहास ने करवट बदली और सब कुछ जैसे चलायमान था,एकदम से बदल गया। परिदृश्य बदल गये, वर्तमान को सीखने के नये संदर्भ उपस्थित हुए। बात उस जमाने की है जब भारतवर्ष के एक महान शिक्षक ने सत्तालोलुप घनानंद की अवहेलना से आहत होकर भरे दरबार में चुनौतीपूर्ण,ओजस्वी स्वरों में यह नसीहत दी थी- “शिक्षक को कभी सामान्य मत समझना। प्रलय और निर्माण उसकी गोद में खेलते हैं।” इसके कुछ ही वर्षो बाद उस महान शिक्षक चाणक्य ने घनानंद को पदच्युत कर चंद्रगुप्त को मगध का सम्राट बना दिया।


इस भूमिका की चर्चा इसलिए भी जरूरी है क्योंकि आज के तथाकथित राष्ट्रवादी बहुधा उस काल को अपनी उग्र राष्ट्रवादी भावनाओं की प्रेरणा भूमि बताते हैं, पर यह विडंबना ही है कि उसी दौर की शिक्षा और सीखों को इन्होंने सबसे अधिक विसरित भी किया है।यह राष्ट्र को होम कर,उसके भस्म को माथे में लगा राष्ट्रवादी बनने का दौर है।


छात्र और ट्विटर

आचार्य चाणक्य एक महान शिक्षक थे,तो निश्चित तौर से उन्होंने चंद्रगुप्त को एक आज्ञाकारी और योग्य शिष्य भी बनाया होगा। यह कहना विषयांतर नहीं होगा कि इतिहास, कालखंड के उस अध्याय को पुनः-सृजित करने में लग गया है। यह अकारथ नहीं है कि एक साथ इतने सारे चाणक्य और चंद्रगुप्तों की टोली टि्वटर पर उमड़ पड़ी है। पिछले दिनों से जो छात्र बेरोजगारी और अन्य समस्याओं पर अपने शिक्षकों के आह्वान पर ट्वीट पर ट्वीट दागे जा रहे हैं और कोरोना वायरस के दौर में सोशल मीडिया कैंपेनिंग के जरिए लगातार अपनी मांग सरकार और संबंधित विभाग के सामने रख रहे हैं, वह सोद्देश्य है। प्रतिरोध का यह तरीका नायाब है।


काबिलेगौर है कि शिक्षक-छात्र समूह किसी भी शिक्षित समाज की रीढ़ होता है। यह बुद्धिजीवी वर्ग का बाहरी आवरण तैयार करता है,जिसे मुख्यधारा मीडिया के गिरते प्रतिमानों द्वारा भरमाया नहीं जा सकता। क्योंकि नागरिक स्पेक्ट्रम का यह खंड अपने वाजिब अधिकारों के प्रति सतर्क और सचेत होता है। ये लोग सूचना को विश्लेषित कर अच्छे और बुरे के निष्कर्ष तक पहुंच सकते हैं। किसी भी परिवर्तन की सुगबुगाहट सबसे पहले यहीं पहुंचती है।

यह वर्ग देख पा रहा है कि उनका राष्ट्र विकास के रास्ते पर चलते हुए सहसा ही एक गहरी-अंधेरी और संकरी गुफा में प्रवेश कर चुका है, जहां उसे कोई सुनहरी किरण नहीं दीख पड़ती है। देश एक साथ कई मोर्चों पर जूझ रहा है और उसके संघर्ष में घनानंंदों की भूलों का प्रायश्चित सीधी-सादी जनता को करना पड़ रहा है।


वर्तमान परिस्थितियां व आधुनिक समाज

वर्तमान समय की परिस्थितियां हमारे लिए हर ओर से मुश्किलें खड़ी करती प्रतीत हो रही हैं। आधुनिक भारतीय समाज विघटन के कगार पर खड़ा है। वर्गों के बीच संवादहीनता की स्थिति है। मौकापरस्त पड़ोसियों की कलुषित मंशा,कोरोना वैश्विक महामारी तथा धर्मगत एवं जातिगत विभेदों के बढ़ते मामलों के बीच भयानक आर्थिक मंदी के पूर्वानुमान ने नागरिकों के इस प्रबुद्ध वर्ग को अपने भविष्य के प्रति संशय में डाल दिया है। धर्मांध कट्टरता अपने चरम पर है। एक राष्ट्रीयता के स्थान पर विभिन्न धार्मिक एवं राजनीतिक पहचान हमारे ऊपर हावी होने लगी हैं। राष्ट्र की विकास यात्राएं प्रतिगामी हो चली हैं। हम एक आधुनिक प्रगतिशील समाज से मध्यकालीन समाज की ओर प्रवाहमान हैं।

देखा जाए तो ये परिणाम अप्रत्याशित भी नहीं हैं क्योंकि जो राष्ट्र अपने निर्माताओं की थाती को पाले में बांट दें, बुद्धिजीवियों को अर्बन-नक्सल और असहमति को देशद्रोह का दर्जा दे दे, उसकी यह नियति निर्धारित ही है।


बहरहाल जब सरकार के किसी भी नीतिगत फैसले का विरोध आपको राष्ट्रद्रोही तथा धर्मद्रोही घोषित करने का पर्याप्त आधार हो सकती हों,ऐसे में अपनी बात को इतने सशक्त एवं प्रखंड ढंग से रखना अतिशय ही शिक्षक-छात्रों के आत्मिक साहस को प्रदर्शित करता है। एक अदद विपक्ष की गैरमौजूदगी में जब सरकार के साथ किसी मुद्दे पर वैचारिक मतभिन्नता,आप पर विधिवत अग्रेतर कार्रवाई की पूर्वपीठिका तैयार कर सकती हो, ऐसे में शिक्षकों और छात्रों का ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के माध्यमों से संवाद,एक नये सामान्य का आदर्श स्थापित करता है।

बहुत संभव है छात्रों का यह शुरुआती प्रयास अपने अंजाम तक ना पहुंचे, किंतु उनकी कोशिशें ज़ाया नहीं होंगी। निकट भविष्य में उनके इस टि्वटर-ट्रेंड-आंदोलन के राजनीतिक और सामाजिक निहितार्थ अवश्य निकाले जाएंगे। इतिहास गवाह है कि छात्र आंदोलन कभी निष्फल नहीं होते। सिर्फ़ इतना याद रहे- नंद का तात्पर्य कभी मगध नहीं रहा। हो भी नहीं सकता।

अंकित कुमार भगत

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