घुमक्कड़ी- पहाड़ों की गोद में बसा मुक्तेश्वर धाम

by News Desk
101 views

“ईश्वर सत्य हैं
सत्य ही शिव हैं
शिव ही सुंदर हैं
जागो उठकर देखो, जीवन ज्योत उजागर हैं“
उपरोक्त पंक्तियाँ फ़िल्म “ सत्यम, शिवम्, सुंदरम” से ली गयी हैं- जिसमें देह की सुंदरता से कहीं बढ़कर मन की स्वच्छता को बताया गया है। जैसा कि रामबृक्ष बेनीपुरी जी ने कहा है- अमूमन हम सब कंगूरे की ईंट बनना चाहते हैं, नींव की ईंट बनना सुंदर नहीं हैं, क्यूँकि उसमें चँकाचौंध नहीं हैं, हमारे होने की प्रामाणिकता नहीं हैं | और यही तो आज का सच है- जो दिखता है, वो बिकता है। यह फ़िल्म एक और गहरी बात उजागर करती है, माना निर्देशक ने पूरी रचनात्मक स्वतंत्रा लेते हुए, अतिशयोक्ति अलंकार का प्रयोग कर बेहद दृढ़ता के साथ मानवीय भावनाओं की शक्ति को दिखाया है, कि कैसे एक सैलाब सब बहा ले जाता है अपने साथ जो महज़ रूपांतरण है किसी के आंसुओं का।

भारत- यही है। यह मेरी व्यक्तिगत सोच है- पर भारत इन सब से ही तो बना है, किसी की क़ुर्बानी से, किसी के प्यार से, किसी गाँव में बहती नदी में नहाते बच्चों से, उनके आँखों में पलते सपनों से, पश्चात्य संस्कृति महानगरों की नई पीढ़ी में पहुँच ज़रूर गयी है, पर अधिकांश भारत- मंदिर हैं, मस्जिद है, मन्नत माँगते लोग हैं, सपने देखती युवा पीढ़ी है, स्वावलंबी बुजुर्ग हैं, भावनाएँ है। अगर कोई मुझसे पुछे भारत क्या है- तो वो एक आदर्श है। हम उतने बुद्धिजीवी नहीं हैं, जितने हम द्रष्टगत हैं।

जितना मैं यह देश घूमती हूँ, मैं उतना ही महसूस करती हूँ कि वक़्त वो हिस्सा जो बिताया जा चुका है, बस महसूस किया जा सकता है | जिसका एक “aftertaste” है , सफ़ेद काली तस्वीरों जैसा, यादों जैसा, यह रंगीन नहीं है- बस खूबसूरत है।

दिल्ली से मुक्तेश्वर

क़रीब क़रीब दो साल पहले, क्यूँकि दिल्ली की गर्मी मुझे खा रही थी, मैंने सोचा पहाड़ों की ओर जाया जाए। चूंकि उत्तरांचलि हूँ तो पहले ख़्याल में अपना प्रदेश आता है और क्यूँकि शिव भक्त भी हूँ- तो मुक्तेश्वर धाम को ज़हन में आने में बहुत वक़्त नहीं लगा। मुक्तेश्वर धाम का नाम, यहाँ पर स्थित 350 साल पुराने शिव मंदिर की देन है। बहुत बड़ी जगह नहीं है- पर चीड़ के पेड़ देखकर मुझे जो ख़ुशी मिलती है वो प्रायः लोगों को शायद अच्छी नींद पूरी करके मिलती हो।

अभी कुछ महीने पहले, कोविड वाली विपत्ति से पहले दिल्ली में “music and mountains” में जाना हुआ था, वहाँ सजावट के लिए चीड़ के पेड़ का कोन, रखा था। बहुत मामूली बात होगी कुछ लोगों के लिए, पर जो तलाश ही रहे हो बहुत बेसब्री से ऐसा कोना जहाँ कुछ अपना सा लगे, उसके लिये मामूली बात नहीं थी। एक दो वेटर भी थे वहाँ, जिनकी हिंदी के पीछे झांकती पहाड़ी ने हमें बता दिया कि अब हम वहाँ दुबारा ज़रूर जाएँगे। ख़ैर, पहाड़ी रास्ते, ठंडी हवा और हर कुछ घंटे में मिलने वाली Maggie की दुकान। हर वो पहाड़ी जगह जहाँ हम हल्द्वानी से होकर जाते हैं, पुरानी HMT factory के पास वाले Maggi point की Maggi ज़रूर खा के जाना है, Maggi नेस्ले के बाद दूसरी यहीं बनाते हैं।

डराता हुआ मगर सुकून देता रास्ता

मुक्तेश्वर तक की सड़कें साफ़ हैं, बिना हिचकोले खाए, धीमी गति से गाड़ी चलायी जाए तो आप हंसी ख़ुशी अपने गंतव्य तक पहुँच जाएँगे। मुझे यह अनुदेश देने के लिए भारत सरकार ने नहीं कहा है, दरअसल बात यह है कि पहाड़ों में घूमना मुझे जितना पसंद है, वह रस्ता तय करना उतना ही डराता है, और डरें भी क्यूँ नहीं- “सावधानी हटी, दुर्घटना घटी”। बाक़ी खूबसूरत मिज़ाज रहता है मौसम का, कभी भीमताल में बारिश हो रही होगी तो आगे सुंदर सुनहरी धूप आपका स्वागत कर रही होगी। यह पहाड़ हैं साहब, यहाँ सब इनकी मर्ज़ी से होता है।

मैं बीच में iheart cafe भी रूकी थी, पर किसी टपरी पर चाय, पकोड़े खाइए, मौसम का मज़ा लेते हुए। सुनसान सड़के होती है पहाड़ों की, जब टूरिस्ट सीज़न नहीं होता, शांति में सराबोर ठंडी हवा के झोंकों से गुजरते हूए कहीं जाना हो तो शायद कोई पहुँचना नहीं चाहेगा जल्दी। पर अब जब पहुँच ही गए हैं तो, मैं “oak chalet” रुकी थी, आरामदायक जगह, हरियाली से घिरी हुई, मेन Road से नीचे, तो अलग से ट्रेक की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। मैंने तीन दिन वहीं गुज़ारे, पास में क़िलमोरा की एक दुकान, जहाँ पर स्थानीय महिलाओं द्वारा बनाई गई चीज़ें बेची जाती है | पहाड़ों में हमेशा से बुनाई एक बहुत ही प्रचलित शौक़ रहा है, तो अधिकांश काम आपको बुनाई का ही मिलेगा | अखरोट के स्क्रब भी है, यहाँ कुछ लेना ज़रूर बनता है।

मुक्तेश्वर धाम का खूबसरत नज़ारा

मेरे होटल से नीचे की तरफ एक डौल हाऊस था, जहाँ owner ने अपने बचपन खिलौने की प्रदर्शनी लगायी थी- क्यूँकि बचपन की यादें अनमोल होती हैं और वह ऐसे ही संजो के रखी जानी चाहिये। एक handmade chocolate की दुकान भी थी। “ यह जवानी है दीवानी” में ठीक ही कहा था- यादें मिठाई के डिब्बे की तरह होती है, एक बार खुला तो बस एक टुकड़ा नहीं खा पाओगे।

जैसे जैसे लिख रही हूँ, महसूस कर पा रही हूँ, वो चढ़ाई चढ़ कर मंदिर तक पहुँचना, वो घंटी की आवाज़। पहाड़ों के प्राचीन मंदिर नक़्क़ाशीदार नहीं होते, संकुचित से क्षेत्र में स्वयं से उत्पन्न हुए एक ढाँचा मात्र होते हैं जिन्हें बाद में एक रूप दे दिया जाता है, कई सालों से कई लोग यहाँ आए होंगे, हर एक जीवन खुद में एक ब्रम्हांड, कई भावनाएं, सोच की एक धारा और सब नतमस्तक हो जाते हैं, उस अनादि के सामने। मुक्तेश्वर में बर्फ़ कब पड़ती है या वहाँ rappelling होती है?

नहीं इनका उत्तर तो कहीं से मिल जाएगा और बर्फ़, खेल, गर्म कपड़े इन सबसे कहीं ज़्यादा होते हैं पहाड़, कहीं बहुत ऊँचे पर फिर भी सादगी ऐसी की 100 रूपये में कोई गाइड आपको पूरा इतिहास बता देगा, पर इतिहास के लिए मत जाइए, बर्फ़ लिए भी नहीं | जाइए क्यूँकि आपके अंदर एक शांति है, जो स्त्रोत ढूँढती है, उसकी खोज में जाइए, बाक़ी सब साथ हो चलेगा।

घुमक्कड़- यशस्वी बुधानी (आईआईएम लखनऊ से मैनेजमेंट स्टूडेंट, खाली वक़्त कविताओं के साथ गुज़ारना पसंद है)

Related Posts