वाराणसी ज़िले के नैपूरा गाँव में पैदा हुए अनुराग उपाध्याय, भोपाल के माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय से सिनेमा की पढ़ाई करके आज पांच सालों से मुंबई में फ़िल्में बना रहे हैं। इनकी लघु फिल्म ‘म्ेमितं’ को कोलकाता के एक इंटरनेशनल फिल्म फ़ेस्टिवल में अवार्ड भी मिला। इनके द्वारा लिखी और निर्देशित इंडिपेंडेंट शॉर्ट फ़िल्म ‘‘पंखुड़ी’’ 2019 के दादा साहेब फ़ाल्के फ़िल्म फ़ेस्टिवल में चयनित हुई।

फ़िल्मों के लिए लिखने के साथ-साथ साहित्यिक लेखन में भी इनकी अच्छी पकड़ है। खण्डहर, नाटक शैली की इनकी पहली रचना है जिसे मुंबई में ‘संहिता मंच’ के अंतर्गत होने वाले नाटक-लेखन प्रतियोगिता में शीर्ष के दस नाटकों में शामिल किया गया। इस नाटक में खण्डहर को प्रकृति का संकेत दिया गया है, क्योंकि प्रकृति की ही तरह खण्डहर भी प्राचीन होता है। आज प्रकृति में इतने बदलाव हो चुके हैं कि उसका वास्तविक स्वरूप बचा ही नहीं है और जो बचा है, उसकी धरती वासियों को परवाह नहीं है।

विशेष: प्रकृति पर कवितायेँ

जैसे सभी धरती वासी प्रकृति पर निर्भर करते हैं। उसी तरह इस नाटक के चार मुख्य पात्र खण्डहर पर निर्भर करते हैं। जिस तरह प्रकृति में होने वाले परिवर्तन हम सभी मानवों को प्रभावित करते हैं। (क्षमता अनुसार किसी को कम, किसी को अधिक) ठीक उसी तरह इस खण्डहर में होने वाला परिवर्तन इस नाटक के पात्रों को प्रभावित करता है।

आपस में जोड़ता है किताब का ताना बाना

प्रकृति और उसके हर पदार्थ में एक अंतर्द्वद है। इस द्वंद्व की अभिव्यक्ति की सबकी अपनी-अपनी जुबानें हैं। कहीं चीख है कहीं ख़ामोशी। कभी चीख हमारे कानों तक नहीं पहुँचती तो कभी ख़ामोशी दिल को चीर देती है। कुछ है जो हमें बांधता है, बुलाता है और चमत्कृत भी करता है। ‘खण्डहर’ का ताना-बाना हमें जोड़ता है। स्नेह के एक नए फ़लक से हमारा परिचय कराता है। इसका श्रेय दौर-ए-हाज़िर के प्रतिभावान लेखक, निर्देशक अनुराग उपाध्याय को जाता है। इंक पब्लिकेशन से प्रकाशित यह कृति निःसंदेह उनकी यह नाट्यकृति संबंधों की स्याही में उजाले की उम्मीद है। असीम शुभकामनाएं अनुराग को ‘खण्डहर’ में चिराग कालजयी और सफल हो।

  • अभिनव अरुण
    वाराणसी