प्रकृति के लिए वरदान है पीपल बाबा का फार्मूला

by News Desk
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कैसे जल संरक्षण किया जाता है? कैसे बढ़ते जंगलों में water tanker के न पहुँच पाने पर पौधों को पानी पिलाया जाता है? कैसे पेड़ों की नर्सरी तैयार की जाती है? पेड़ों के बीच बने ऐसे आश्रम जिनमें घनघोर बारिश में भी एक बूँद पानी नहीं टपकता? विदेशी चिड़ियाओं के लिए घोंसले का निर्माण विधि काफ़ी दिलचश्प है | नीलगाय आदि न आएं इसके लिए रंगीन बरसाती से भरे बोतलों को सीमा पर लगाकर जंगल की रक्षा कैसे की जाती है? time मिले तो 51, 000 पेड़ो वाले जंगल को देखने के लिए सोरखा village जरूर आएं | नॉएडा सैक्टर 115 के सोरखा गाँव, ग्रेटर नॉएडा के नामचा और लखनऊ के रहीमाबाद जल संरक्षण की एक अनोखी विधि के तहत पीपल बाबा नें बड़े तालाब का विकास किया है | यहाँ पर प्राकृतिक तालाब निर्माण की विधि और अवस्थाओं को करीब से जाननें का अवसर मिलता है | कैसे जल जल संरक्षण किया जाता है? कैसे बढ़ते जंगलों में water tanker के न पहुँच पाने पर पौधों को पानी पिलाया जाता है? पीपल बाबा के द्वारा पेश किया गया यह अनोखा उदहारण देश में जलस्तर को बढानें के लिए काफी महत्वपूर्ण है |

पीपल बाबा कहते हैं कि जिस दिन से जंगल लगाने का कार्य शुरू होता है उसी दिन से इन जंगलों के सबसे ढलान वाली ऐसी जगह पर तालाब बनाने की प्रक्रिया की शुरुआत हो जाती है जहाँ पर चारों तरफ से पानी आकर रुके और इस तालाब के एंट्री पॉइंट्स पर अम्ब्रेला पोम (अम्ब्रेला पोम पूरे विश्व में पाया जाता है लेकिन जापानी लोग इसका खूब उपयोग करते हैं |) के पौधे लगाए जाते हैं इन पौधों की जड़ो से होकर गुजरने पर यह जल शुद्ध हो जाता है | 3-4 सालों में वर्षा जल प्राप्त करते हुए ये तालाब सालों साल पानी से भरे रहने लगते हैं इसका कारण हर साल हो रहे जलसंचयन की वजह से जमीन का जलस्तर काफ़ी ऊँचे उठ जाता है | और भूमिगत जल से ये तालाब हमेशा स्वतः चार्ज होते रहते हैं | तालाब बनाने की प्रक्रिया finishing, water pit, composting और हैंडपम्प लगाने के साथ-साथ ही शुरू होती है | पूरे जगल में पानी के लिए मात्र एक तालाब सबसे ज्यादे ढलान वाली जगह पर जहाँ पर gradients ज्यादे होते हैं, बनाया जाता है | तालाब के 10% हिस्से पर जलकुम्भी लगाई जाती है इससे मिट्टी तालाब में आने से रुक जाता है (लेकिन जलकुम्भी के ज्यादे हो जाने पर तालाब में कार्बन डाई ऑक्साइड बढ़ जाता है इसलिए समय समय पर जलकुम्भी को साफ किया जाता है ) तालाब के सभी किनारों पर घास और पेड़ भी लगाए जाते हैं ये मिट्टी को जकड़ कर रखते हैं और तालाब में मिट्टी को जाने से रोकते भी हैं यहाँ पर मुख्य बात यह है कि पीपल बाबा तालाब के एंट्री पॉइंट्स पर अम्ब्रेला पोम नामक घास लगाती यह यह घास वाटर फ़िल्टर का काम करती है | गौरतलब है कि अम्ब्रेला- पोम नामक घास पूरी दुनियां में पायी जाती है लेकिन जापान में इसका प्रयोग तालाब के जल के शुद्दिकरण के लिए खूब किया जाता है | शुरुवाती समय में हैंडपम्प और water टैंकर से पौधों को पानी पिलाया जाता है लेकिन धीमे धीमे जैसे जैसे पेड़ बड़े होने लगते हैं वैसे वैसे water टैंकर जंगलों के बीच नहीं आ पाते तब तक (2-3सालों में ) तालाब तैयार हो जाते हैं | प्रख्यात पर्यावरण कर्मी पीपल बाबा ने गिरते जलस्तर और पानी के टैंकरो की अनुपलब्धता के बीच जंगलों के बीच पेड़ पौधों को पानी पिलाने के लिए जलसंरक्षण की अनूठी तकनीकी अपनायी हैं | पीपल बाबा ने जलसंरक्षण के लिए जंगलों के बीच हर ढलान वाली जगह के सबसे निचले विन्दु पर तालाब और जंगलों के बीच ढेर साडी जगहों पर छोटे छोटे गड्ढे बनाया है |

| जिसमें आसानी से पानी जमा होता रहता है 3-4 साल में जलस्तर काफ़ी ऊपर आ जाता है गर्मियों में ये छोटे गड्ढे तो सूख जाते हैं लेकिन तालाबों में लबालब पानी भरा रहता है | जंगलों के बीच जगह- जगह पर छोटे गड्ढ़े इसलिए खोदे जाते हैं क्यूकि दूर तालाब और नल से पानी लाने में समय कम लगे |

मानसून का मौसम चल रहा है | इस मौसम में होने वाले झमाझम बारिश पेड़ पौधों से लेकर जीव जंतुओं सबके लिए अनुकूल होता है | इस मौसम में पृथ्वी के सभी जंतुओं और वनस्पतियों का खूब विकास होता है | इस मौसम में अगर हम थोड़ी सक्रियता बरतें तो इसका फायदा सालों साल उठाया जा सकता है जी हाँ बरसात के मौसम में अगर हम जल संरक्षण का काम करें तो भूमिगत जल को ऊपर उठाया जा सकता है साथ ही साथ सालों साल जल की कमी को दूर किया जा सकता है | लेकिन हर साल गिर रहे जलस्तर के बीच इंसान मोटर , समर्सिबल पंप, और इंजन लगाकर जमीन से पानी खींचकर अपना काम चला रहे हैं | जलसंचयन के लिए कार्य न होने की वजह से बर्षा का जल नालियों के रास्ते नदियों में होते हुए समुद्र में विलीन हो जाता है | वर्षा जल संरक्षण और वर्षा जल संचयन की तमाम तकनीकियां पूरी दुनियां में उयलब्ध हैं लेकिन इन तकनीकियों का प्रयोग करने वालों की संख्या काफ़ी कम है | ऐसे प्रयोगों को बड़े स्तर पर बढ़ावा दिए जाने की जरूरत है

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