दिल की किश्ती को कोई शहर मिला ही नहीं..
आसमाँ दूर था और कभी ज़मीं मिली ही नहीं…
हमने चाहा था थामना जिनका हाथ,
उस हमसफ़र से कभी हमनवाई मिली ही नहीं…

वो मुझसे पूछता है,कौन हूँ मैं उसके लिए,
मेरे गर्दिश-ए-सफर,अंजाम तो मिला ही नहीं..
जिनको माना था हमने ख़ुदा-ए-क़िस्मत,
हथेली पर लिखा नाम तकदीर में मिला ही नहीं…

क्यों भला हम धरें उन पर कोई तोहमत,
नसीब से ज्यादा किसी को तो मिला ही नहीं…
चाँद की ख्वाहिशें तो सभी करतें हैं,
और नादानों को सिला अब तक मिला ही नहीं…

तुम चमकते चाँद थे और मेरी चकोर की सी ख्वाहिशें,
कई बरसातें बीत गईं , वो अरदास मिला ही नहीं…
उनके दर पर ही “नीतू” अपना दम निकले,
दिल-ए-अरमाँ को मुहब्बत का दम मिला ही नहीं..

Writer : Neetu Jha