जनसंख्या नियम जो की प्रदेश सरकार द्वारा लाया गया है, ये एक प्रगतिशील राज्य की तरफ उत्तरप्रदेश को अग्रसर करेगा। इस बिल के ताहत लोक सेवक हैं या निजी व्यक्ति दोनो को इसके दायरे में रखे गए हैं।

अतः विधेयक की धारा 4 के अनुसार जो लोक सेवक दो बाल नीति अपनाते हैं और स्वैच्छिक नसबंदी करवाते हैं, उन्हें पूरी सेवा के दौरान 2 अतिरिक्त वेतन वृद्धि, भूखंड की खरीद के लिए सब्सिडी, सॉफ्ट लोन, करों में छूट आदि जैसे प्रोत्साहन प्राप्त होंगे। दूसरी ओर निजी व्यक्तियों के लिए प्रोत्साहन जैसे कि सॉफ्ट लोन, करों पर छूट, नियोक्ता योगदान कोष में 3% की वृद्धि।

इसके अतिरिक्त यदि लोक सेवक एक बच्चे की नीति अपनाता है तो उसे अन्य लाभ भी प्राप्त होंगे जैसे एकल बच्चे के प्रवेश को वरीयता, स्नातक स्तर तक मुफ्त शिक्षा, सरकारी नौकरियों में वरीयता के साथ-साथ उपर्युक्त लाभ।

अब अगर हम 2 बच्चे के मानदंड का पालन न करने के प्रतिबंधों के बारे में बात करते हैं तो वे उपरोक्त लाभों के लिए पात्र नहीं होंगे, सरकारी नौकरी आदि के लिए पात्र नहीं होंगे। 2 बच्चे के नियम के कुछ अपवाद हैं जैसे कि दूसरी गर्भावस्था से कई जन्म , केवल 2 व्यक्तियों के लिए दत्तक ग्रहण किया जाता है जिनके विवाह से 2 बच्चे पैदा होते हैं और तीसरे बच्चे को गोद लिया जाता है, पहले या दूसरे बच्चे की विकलांगता (किसी भी मामले में बच्चे की संख्या तीन से अधिक नहीं होनी चाहिए)।

विधेयक के समग्र विश्लेषण से पता चलता है कि मसौदे का मूल उद्देश्य लोगों को प्रोत्साहन के माध्यम से प्रेरित करके जनसंख्या पर अंकुश लगाना है। हालांकि मैं यह सुझाव दूंगा कि दो बच्चों के मानदंड का उल्लंघन करने वालों के लिए और अधिक सख्त दंडात्मक प्रतिबंध होने चाहिए। मूल रूप से यदि हम मसौदे के माध्यम से जाते हैं तो यह देखा जा सकता है कि दो बच्चों के मानदंड का पालन नहीं करने के लिए उल्लिखित प्रतिबंधों का समाज के उस वर्ग पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा जिसे हम उच्च मध्यम वर्ग या यहां तक ​​​​कि व्यावसायिक पृष्ठभूमि वाले परिवार भी कहते हैं जो मांग नहीं कर रहे हैं सरकारी नौकरियों।

इसलिए सरकार को इस तरह की खामियों पर अंकुश लगाना चाहिए ताकि विधायी मंशा और तैयार किए गए मसौदे के बीच उचित संबंध हो।

विश्लेषक : उज्ज्वल तिवारी ( Lawyer )